भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

३३४ नारदीयपुराणम् नारद उवाच भगवन्सर्वमाख्यातं यत्पृष्टं भवतो मया । तथापि नात्मा प्रीयेत शृण्वन्हरिकथां मुहुः ॥२॥ श्रूयते व्यासपुत्रस्तु शुकः परमधर्मवित् । सिद्धिं सुमहतीं प्राप्तो निर्विण्णोऽवांतरं बहिः ॥३॥ ब्रह्मन्पुंसस्तु विज्ञानं महतां सेवनं विना । न जायते कथं प्राप्तो ज्ञानं व्यासात्मजः शिशुः ॥४॥ तस्य जन्मरहस्यं मे कर्मचाप्यस्य शृण्वते । समाख्याहि महाभाग मोक्षशास्त्रार्थविद्भवान् ॥५॥ सनंदन उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि शुकोत्पत्तिं समासतः । यां श्रुत्वा ब्रह्मतत्त्वज्ञो जायते मानवो मुने ॥६॥ न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बंधुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥७॥ नारद उवाच अनूचानः कथं ब्रह्मन्पुमान्भवति मानद । तन्मे कर्म समाचक्ष्व श्रोतुं कौतूहलं मम ॥८॥ सनंदन उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि ह्यनूचानस्य लक्षणम् । यज्ज्ञात्वा सांगवेदानामभिज्ञो जायते नरः ॥६॥ शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं ज्यौतिषं तथा । छंदःशास्त्रं षडेतानि वेदांगानि विदुर्बुधाः ॥१०॥ ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः । वेदाश्चत्वार एवैते प्रोक्ता धर्मनिरूपणे ॥११॥ सांगान्वेदान्गुरोर्यस्तु समधीते द्विजोत्तमः । सोऽनूचानः प्रभवति नान्यथा ग्रंथकोटिभिः ॥१२॥ भगवन् ! मैंने जो कुछ आपसे पूछा, उसको आपने बता दिया; परन्तु इतनी अधिक हरि-कथा को बार-बार सुनकर भी मुझे प्रसन्नता नहीं हो रही है ॥२॥ सुना जाता है कि परम धर्मज्ञ व्यास-पुत्र शुक ने बिना किसी प्रकार के बाह्य और आभ्यन्तर साधना के ही परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी ॥३॥ भगवन् ! पुरुष को बिना महात्माओं की सेवा के विज्ञान की प्राप्ति नहीं होती; किन्तु व्यास पुत्र शिशु शुक ने कैसे अनायास प्राप्त कर लिया ॥४॥ उनके जन्म के रहस्य और कर्म को कहिए महाभाग ! आप मोक्ष शास्त्र के ज्ञाता हैं। कृपाकर मुझ श्रोता को सुनाइए ॥५॥ सनन्दन बोले- विप्र ! सुनो, मैं तुमको संक्षेप में शुकोत्पत्ति को सुना रहा हूँ। मुने ! जिस कथा को सुनकर मानव ब्रह्म तत्त्व का ज्ञाता हो जाता है ॥६॥ न तो वयोवृद्ध होने से, न केश पकने से, न तो धन, और परिवार द्वारा महत्ता प्राप्त की जाती है। वस्तुतः ऋषियों ने कहा है कि जो अनूचान है वही महान् है ॥७॥ नारद बोले- सम्मान देने वाले ! मनुष्य अनूचान कैसे होता है, उसके कर्म को बतलाइए, मुझे सुनने के लिए कौतूहल हो रहा है ॥८॥ सनंदन बोले- नारद, सुनो, मैं अनूचान का लक्षण बता रहा हूँ जिसको जानकर मनुष्य अंग-सहित सब वेदों को जान जाता है ॥६॥ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द शास्त्र इन्हीं को विद्वानों ने वेदांग कहा है ॥१०॥ धर्म निरूपण में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, ये चार वेद ही प्रमाण कहे गये हैं। जो उत्तम ब्राह्मण गुरु से अंग सहित वेदों का अध्ययन करता है, उसको अनूचान कहते हैं अन्यथा करोड़ों ग्रन्थों के पढ़ने से द्विज अनूचान नहीं हो सकता ॥११-१२॥