बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३५ नारद उवाच अंगानां लक्षणं ब्रूहि वेदानां चापि विस्तरात् । त्वमस्मासु महाविज्ञः सांगेष्वेतेषु मानद ॥१३॥ सनंदन उवाच प्रश्नभारोऽयमतुलस्त्वया मम कृतो द्विज । संक्षेपात्कथयिष्यामि सारमेषां सुनिश्चितम् ॥१४॥ स्वरः प्रधानः शिक्षायां कीत्तितो मुनिभिर्द्विजैः । वेदानां वेदविद्भिस्तु तच्छृणुष्व वदामि ते ॥१५॥ आर्चिकं गाथिकं चैव सामिकं च स्वरान्तरम् । कृतान्ते स्वरशास्त्राणां प्रयोक्तव्यं विशेषतः ॥१६॥ एकांतरः स्वरो ह्यृप्सु गाथासु द्वयन्तरः स्वरः । सामसु त्र्यन्तरं विद्यादेतावत्स्वरतोऽन्तरम् ॥१७॥ ऋक्सामयजुरंगानि ये यज्ञेषु प्रयुंजते । अविज्ञानाद्धि शिक्षायास्तेषां भवति विस्वरः ॥१८॥ मंत्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । ॥१९॥ स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेंद्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् उरः कंठः शिरश्चैव स्थानानि त्रीणि वाङ्मये । सवनान्याहुरेतानि साम वाप्यर्द्धतोऽन्तरम् ॥२०॥ नारद बोले-मानद ! आप सम्पूर्ण सांगोपाङ्ग वेदों के महान् पंडित हैं। इसलिये विस्तारपूर्वक अंगों और वेदों के लक्षण कहिये ॥१३॥ सनंदन बोले-द्विज ! तुमने तो बहुत बड़ा प्रश्न किया । इसलिए इनको संक्षेप में सिद्धान्त रूप से कह रहा हूँ ॥१४॥ वेदज्ञ ब्राह्मण मुनियों ने शिक्षा में स्वर की प्रधानता बताई है, उसको सुनो, मैं तुमसे कह रहा हूँ ॥१५॥ स्वर शास्त्रों के निश्चय के अनुसार विशेष रूप से आर्चिक (ऋक्-सम्बन्धी), गाथिक (गाथा-सम्बन्धी) और सामिक (साम-सम्बन्धी) स्वर व्यवधान का प्रयोग करना चाहिए। ऋचाओं में एक का अन्तर देकर स्वर होता है। गाथाओं में दो के व्यवधान से और साम-मन्त्रों में तीन के व्यवधान से स्वर होता है। स्वरों का इतना ही व्यवधान सर्वत्र जानना चाहिए ।१६-१७॥ ऋक्, साम और यजुर्वेद के अंगभूत जो याज्य, स्तोत्र, करण और मन्त्र आदि याज्ञिकों द्वारा यज्ञों में प्रयुक्त होते हैं, शिक्षा शास्त्र का ज्ञान न होने से उनमें विस्वर (विरुद्ध स्वर का उच्चारण) हो जाता है। स्वर और वर्ण से हीन मन्त्र और उसका मिथ्या प्रयोग जो कि यथार्थ अर्थ को न कहे यजमान का उसी प्रकार नाश कर देता है जिस प्रकार इन्द्र-शत्रु (वृत्र) का इन्द्रशत्रु शब्द के अशुद्ध स्वर प्रयोग के अपराध से नाश हो गया १ ॥१८-१९॥ वाङ्मय में उर, कण्ठ और शिर शब्दोच्चारण के तीन मूल स्थान माने जाते हैं। इनको ही सवन कहते हैं। अर्थात् वक्षः स्थान में नीच स्वर से जो शब्दोच्चारण होता है, उसे प्रातः सवन कहते हैं; कण्ठस्थान में मध्यम स्वर से किये हुए शब्दोच्चारण का नाम माध्यन्दिन सवन है तथा मस्तक रूप स्थान में उच्च स्वर से जो शब्दोच्चारण होता है, उसे तृतीय सवन कहते हैं। अधरोत्तर भेद से सप्त- १. तैत्तिरीय शाखा की कृष्णयजुः संहिता के द्वितीय काण्ड में पञ्चम प्रपाठक के द्वितीय अनुवाक की प्रथम पञ्चशती में मन्त्र आया है--'स्वाहेन्द्रशत्रुर्वर्धस्व' । पौराणिक गाथा के अनुसार त्वष्टा प्रजापति ने 'इन्द्र के शत्रु वृत्र के अभ्युदय के लिए इस मंत्र' का उच्चारण किया था। 'इन्द्रस्य शत्रुः' इस विग्रह के अनुसार षष्ठी समास में समासान्त प्रयुक्त अन्तोदात्त का उच्चारण अभीष्ट था; परन्तु प्रयोग में पूर्वपदप्रकृतिस्वर- आद्युदात्त बोला गया; अतः वह बहुव्रीहि के अर्थ का प्रकाशक हो गया। इसलिए 'इन्द्र है शत्रु (संहारक) जिसका वह' ऐसा अर्थ निकलने के कारण वृत्तासुर ही इन्द्र के हाथ से मारा गया।