भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 355

३३६ नारदीयपुराणम् उरः सप्तविदारं स्यात्तथा कंठस्तथा शिरः । न च शक्तोऽसि व्यक्तस्तु तथा प्रावचनो विधिः ॥२१॥ कठकालापवृत्तेषु तैत्तिराह्वरकेषु च । ऋग्वेदे सामवेदे च वक्तव्यः प्रथमः स्वरः ॥२२॥ ऋग्वेदस्तु द्वितीयेन तृतीयेन च वर्तते । उच्चमध्यमसंघातः स्वरो भवति पार्थिवः ॥२३॥ तृतीये प्रथमकृष्टौ कुर्वन्त्याह्वरकान् स्वरान् । द्वितीयाद्यास्तु मद्रान्तांस्तैत्तिरीयाश्चतुःस्वरान् ॥२४॥ प्रथमश्च द्वितीयश्च तृतीयोऽथ चतुर्थकः । मंद्रः कृष्टो मुनीश्वर एतान्कुर्वंति सामगाः ॥२५॥ द्वितीयप्रथमावेतौ नांडिमाल्लविनौ स्वरौ । तथा शातपथावेतौ स्वरौ वाजसनेयिनाम् ॥२६॥ एते विशेषतः प्रोक्ताः स्वरा वै सार्ववैदिकाः । इत्येतच्चरितं सर्वं स्वराणां सार्ववैदिकम् ॥२७॥ सामवेदे तु वक्ष्यामि स्वराणां चरितं यथा । अल्पग्रंथं प्रभूतार्थं सामवेदांगमुत्तमम् ॥२८॥ तानरागस्वरग्राममूर्च्छनानां तु लक्षणम् । पवित्रं पावनं पुण्यं यथा तुभ्यं प्रकीर्तितम् ॥२६॥ शिक्षामानुद्विजातीनामृग्यजुः सामलक्षणम् । सप्त स्वरास्त्रयो ग्रामा मूर्च्छनास्त्वेकविंशतिः ॥३०॥ ताना एकोनपंचाशदित्येतत्स्वरमंडलम् । षड्जश्च ऋषभश्चैव गांधारो मध्यमस्तथा ॥३१॥ पंचमो धैवतश्चैव निषादः सप्तमः स्वरः । षड्जमध्यमगांधारास्त्रयो ग्रामाः प्रकीर्तिताः ॥३२॥ भूल्लो काज्जायते षड्जो भुवर्लोकाच्च मध्यमः । स्वर्गाच्चाच्चैव गांधारो ग्रामस्थानानि त्रीणि हि ॥३३॥

स्वरात्मक साम के भी पूर्वोक्त तीन ही स्थान हैं। उरोभाग, कण्ठ तथा सिर—ये सातों स्वरों के विचरण-स्थान हैं। किन्तु उरःस्थल में मन्द्र और अतिस्वार की अभिव्यक्ति न होने से उसे सातों स्वरों का विचरणस्थल नहीं कहा जा सकता, तथापि अध्ययनाध्यापन के लिए वैसा विधान किया गया है। (ठीक अभिव्यक्ति न होने पर भी उपांशु या मानस प्रयोग में वर्ण तथा स्वर का सूक्ष्म उच्चारण होता है) ॥२०-२१॥ कठ, कालाप, तैत्तिरीय तथा आह्नरक शाखाओं में और ऋग्वेद एवं सामवेद में प्रथम स्वर का प्रयोग करना चाहिए ॥२२॥ ऋग्वेद द्वितीय और तृतीय स्वर से भी परिगीत होता है। उच्च और मध्यम का संघात पार्थिव (लौकिक) स्वर होता है ॥२३॥ आह्नरक शाखा वाले तृतीय तथा प्रथम में उच्चारित स्वरों का प्रयोग करते हैं। तैत्तिरीय शाखा वाले द्वितीय से लेकर पञ्चम तक चार स्वरों का उच्चारण करते हैं। सामगान करने वाले विद्वान् प्रथम (षड्ज), द्वितीय (ऋषभ), तृतीय (गान्धार), चतुर्थ (मध्यम), मन्द्र (पञ्चम), कृष्ट (धैवत) तथा अतिस्वार (निषाद)—इन सातों स्वरों का प्रयोग करते हैं। द्वितीय और प्रथम—ये ताण्डी (ताण्ड्यपञ्चविंशादि ब्राह्मण के अध्येता कौथुम आदि शाखा वाले) तथा भाल्लवी (छन्दोग शाखा वाले) विद्वानों के स्वर हैं। शतपथ ब्राह्मण में आये हुए ये दोनों स्वर वाजसनेयी शाखा वालों के द्वारा भी प्रयुक्त होते हैं। ये सब वेदों में प्रयुक्त होने वाले स्वर विशेष रूप से बताए गए हैं। इस प्रकार सार्ववैदिक स्वर-संचार कहा गया है ॥२४-२७॥ अब सामवेद में स्वरों का जैसा प्रयोग होता है उसको कह रहा हूँ। सामवेद को थोड़े शब्दों में अत्यधिक अर्थ को व्यक्त करने वाला उत्तम वेद समझना चाहिए ॥२८॥ तान, राग, स्वर, ग्राम और मूर्च्छना का लक्षण पवित्र, पावन और पुण्यदायक है जैसा कि मैंने तुमसे पहले कहा था। द्विजाति के लिये ही ऋक्, यजु और साम संबन्धी शिक्षा कही गई है ॥२६३॥ सात स्वर, तीन ग्राम और मूर्च्छना इक्कीस प्रकार की होती है, तान उनचास प्रकार के होते हैं; इनकी स्वर-मण्डल कहा गया है। षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद ये सात स्वर हैं। षड्ज, मध्यम और गान्धार ये तीन ग्राम हैं ॥३०-३२॥ भूःलोक से षड्ज उत्पन्न होता है, भुवःलोक से मध्यम और स्वर्ग एवं मेघलोक से गान्धार उत्पन्न होता है। तीन ग्राम-स्थान हैं। स्वरों के विशेष रूप से ग्राम राग