भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३७ स्वराणां च विशेषेण ग्रामरागा इति स्मृताः । विशतिर्मध्यमग्रामे षड्जग्रामे चतुर्दश ॥३३॥ तानान्पंचदशेच्छंति गांधारे सामगायिनाम् । नदी विशाला सुमुखी चित्रा चित्रवतो मुखा ॥३४॥ बला चाप्यथ विज्ञेया देवानां सप्त मूर्च्छनाः । आप्यायिनी विश्वभृता चंद्रा हेमा कपर्दिनी ॥३५॥ मैत्रीच बार्हती चैव पितृणां सप्त मूर्च्छनाः । षड्जे तूत्तरमंद्रा स्यादृषभे चाभिरुहता ॥३६॥ अश्वक्रांता तु गांधारे तृतीया मूर्च्छना स्मृता । मध्यमे खलु सौवीरा हृषिका पंचमे स्वरे ॥३८॥ धैवते चापि विज्ञेया मूर्च्छना तूत्तरा मता । निषादे रजनीं विद्यादृषीणां सप्त मूर्च्छनाः ॥३६॥ उपजीवंति गंधर्वा देवानां सप्त मूर्च्छनाः । पितॄणां मूर्च्छनाः सप्त तथा यक्षा न संशयः ॥४०॥ ऋषीणां मूर्च्छनाः सप्त यास्त्वामा लौकिकाः स्मृताः । षड्जः प्रीणाति वै देवानृषीन्प्रीणाति चर्षभः ॥४१॥ पितॄन् प्रीणाति गांधारो गंधर्वा मध्यमः स्वरः । देवान्पितॄनृषींश्चैव स्वरः प्रीणाति पंचमः ॥४२॥ यक्षान्निषादः प्रीणाति भूतग्रामं च धैवतः । गानस्य तु दशविधा गुणवृत्तिस्तु तद्यथा ॥४३॥ रक्तं पूर्णमलंकृतं प्रसन्नं व्यक्तं विक्रष्टं श्लक्ष्णं समं सुकुमारं मधुरमिति गुणास्तत्र रक्तं नाम वेणुवीणास्वराणामेकीभावं रक्तमित्युच्यते पूर्ण नाम स्वरश्रुतिपूरणाच्छंदः पादाक्षरं संयोगात्पूर्णमित्युच्यते अलंकृतं नामोरसि शिरसि कंठयुक्तमित्यलंकृतं प्रसन्नं नामापगतागद्गदनिर्विशंकं प्रसन्नमित्युच्यते व्यक्तं नाम पदपदार्थप्रकृतिविकारगमनोप- कृतद्धितसमासधातुनिपातोपसर्गस्वरलिंगं वृत्तिवार्तिकविभक्त्यर्थवचनानां सम्यगुपपादनं व्यक्तमित्युच्यते विक्रष्टं नामोच्चैरुच्चारितं व्यक्तपदाक्षरं विक्रष्टमित्युच्यते श्लक्ष्णं नामाद्रुतमविलंबितमुच्चनीचप्लुतसमाहारहेलतालोपनयादिभि- कहे गए हैं। साम गाने वाले व्यक्ति मध्यम ग्राम में बीस, षड्ज में चौदह और गान्धार में पन्द्रह तान का प्रयोग करना चाहते हैं ॥३३-३४३॥ नंदी, विशाला, सुमुखी, चित्रा, चित्रवती, मुखा और बला ये देवों की सात मूर्च्छनायें मानी गई हैं ॥३५ ॥ आप्यायनी, विश्वभृता, चन्द्रा, हेमा, कपर्दिनी, मैत्री और बार्हती ये पितरों की सात मूर्च्छनायें हैं ॥३६ ॥ षड्ज में उत्तरमन्द्रा, ऋषभ में अभिरूढ़ता और गान्धार में अश्वक्रान्ता नाम की तीसरी मूर्च्छना है ॥३७ ॥ मध्यम में सौवीरा, पंचम स्वर में हृषीका और धैवत में उत्तरा नाम की मूच्छेना होती है । निषाद में रजनी नाम की मूर्च्छना समझनी चाहिए । इस प्रकार ऋषियों की ये सात मूर्च्छनायें हैं ॥३८-३९॥ गन्धर्व देवों की सात मूर्च्छनाओं को प्रयोग में लाते हैं और यक्ष पितरों की सात मूर्च्छनाओं को, इसमें सन्देह नहीं ॥४०॥ ऋषियों की जो सात मूर्च्छनायें हैं, उनका प्रयोग लौकिक गायक करते हैं। षड्ज देवों को प्रसन्न करता, ऋषभ ऋषियों को और गान्धार पितरों को, मध्यम स्वर गन्धर्वों को प्रसन्न करता है। पंचम स्वर देव-पितर और ऋषियों को प्रसन्न करता है ॥४१-४२॥ निषाद यक्षों को और धैवत सब प्राणियों को श्रुतिसुखद जान पड़ता है। गान की दस प्रकार की गुण- वृत्ति होतो है ॥४३॥ उसका जैसा रूप है सुनो - रक्त-वर्ण, पूर्णअलंकृत, प्रसन्न, व्यक्त, विकृष्ट, श्लक्ष्ण, सम, सुकुमार और मधुर ये दस गुण हैं। वेणुवीणा, और पुरुष के स्वरों का एकीभाव हो जाने से रक्त कहा जाता है। स्वर और श्रुति को पूर्ण करने से, छन्द एवं पादाक्षरों के संयोग से द्वितीय को पूर्ण कहा जाता है। उर, शिर और कण्ठ को अलंकृत करने के कारण तृतीय को अलंकृत कहते हैं। प्रसन्न उसको कहते हैं जो कंठ के गद्गद्भाव से रहित और निर्विशंक हो । पद, पदार्थ, प्रकृति, विकार, आगमन, कृत, तद्धित, समास, धातु, निपात, उपसर्ग, स्वर, तिङन्त, वृत्ति, वार्तिक, विभक्त्यर्थ और वचन, का भली-भाँति विचारपूर्वक उपपादनपूर्वक गान करने को व्यक्त कहते हैं। स्पष्टरूप से पदों और अक्षरों का उच्चारण करते हुए गान करने को विकृष्ट कहते हैं । द्रुत और विलम्बित दोषों से रहित उच्च-नीच, प्लुत, समाहार, हेल, ताल और उपनय आदि का उपपादान से ४३ ना० पु०