बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३२ नारदोयपुराणम् ऋभुरुवाच त्वं राजेव द्विजश्रेष्ठ स्थितोऽहं गजवद्यदि। तदेवं त्वं समाचक्ष्व कतमस्त्वमहं तथा ॥८२॥ ब्राह्मण उवाच इत्युक्तः सत्वरस्तस्य चरणावभिवंद्य सः। निदाघः प्राह भगवन्नाचार्यस्त्वमृभुर्मम ॥८३॥ नान्यस्याद्वैतसंस्कारसंस्कृतं मानसं तथा। यथाचार्यस्य तेन त्वां मन्ये प्राप्तमहं गुरुम् ॥८४॥ ऋभुरुवाच तवोपदेशदानाय पूर्वशुश्रूषणात्तव। गुरुस्नेहादृभुर्नाम निदाघं समुपागतः ॥८५॥ तदेतदुपदिष्टं ते संक्षेपेण महामते। परमार्थसारभूतं यत्तदद्वैतमशेषतः ॥८६॥ ब्राह्मण उवाच एवमुक्त्वा ददौ विद्यां निदाघं स ऋभुर्गुरुः। निदाघोऽप्युपदेशेन तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥८७॥ सर्वभूतान्यभेदेन ददृशे स तदात्मनः। तथा ब्रह्मतनौ मुक्तिमवाप परमां द्विजः ॥८८॥ तथा त्वमपि धर्मज्ञ तुल्यात्मरिपुबांधवः। भव सर्वगतं ज्ञानमात्मानमवनीपते ॥८९॥ सितनीलादिभेदेन यथैकं दृश्यते नभः। भ्रांत दृष्टिभिरात्मापि तथैकः सन्पृथक् पृथक् ॥९०॥ ऋभु बोले—द्विजश्रेष्ठ ! तुम यदि राजा के समान हो और मैं गज के समान हूँ तो बताओ कि तुम कौन हो और मैं कौन हूँ ॥८२॥ ब्राह्मण बोला—यह सुनकर वह शीघ्र ही गुरु के चरणों की वन्दना कर बोला, भगवन् ! आप निश्चय ही मेरे गुरु ऋभुदेव हैं, क्योंकि आचार्य को छोड़कर दूसरे की ऐसी अद्वैत भावना से परिष्कृत बुद्धि नहीं है। इसलिए मुझे विश्वास है कि आज मैं अपने गुरु को पा गया हूँ ॥८३-८४॥ ऋभु ने कहा—तुम्हारी पूर्व की शुश्रूषा से प्रसन्न होकर मैं (ऋभु) तुम (निदाघ) को उपदेश देने के लिए वात्सल्य से आकृष्ट हो यहाँ आया हूँ। इसलिए महामते ! जो सम्पूर्ण तत्त्वों का सार अद्वैत तत्त्व है उसको इस प्रकार संक्षेप में पूर्णरूप से सुना दिया है ॥८५-८६॥ ब्राह्मण बोला—इस प्रकार गुरु ऋभु ने अपने शिष्य निदाघ को परम अद्वैत विद्या का उपदेश दिया। निदाघ भी गुरु के उस उपदेश से अद्वैत परायण हो गया। उस समय से वह अपने और इतर सब प्राणियों को अभेद भावना से देखने लगा। इस प्रकार उसने ब्राह्मण के शरीर में परम मुक्ति प्राप्त कर ली ॥८७-८८॥ धर्मज्ञ ! इसलिए तुम भी शत्रु और बन्धुओं में समान दृष्टि रखने वाले समदर्शी बनो। भूमिपते ! अपने को सबके रूप में देखने वाला आत्मज्ञानी बनो ॥८९॥ जिस प्रकार एक ही नभ श्वेत, नील आदि भेद से अनेक दिखाई पड़ता है उसी प्रकार भ्रान्तदृष्टि व्यक्ति एक आत्मा को पृथक्-पृथक् रूपों में देखता है ॥९०॥ यहाँ जो कुछ दिखाई देता है वह समस्त अच्युत से अतिरिक्त और कुछ नहीं। वह, मैं और तुम यह सब केवल मायातीत आत्मा की ही विभूति है ॥९१॥