बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३० नारदीयपुराणम् तदेतद्भवता ज्ञात्वा मिष्टामिष्टविचारि यत् । तन्मनः शमनालंबि कार्यं प्राप्यं हि मुक्तये ॥६३॥ इत्याकर्ण्य वचस्तस्य परमार्थाश्रितं नृप । प्रणिपत्य महाभागो निदाघो वाक्यमब्रवीत् ॥६४॥ प्रसीद महितार्थाय कथ्यतां यस्त्वमागतः । नष्टो मोहस्तवाकर्ण्य वचांस्येतानि मे द्विज ॥६५॥ ऋभुरुवाच ऋभुरस्मि तवाचार्यः प्रज्ञादानाय ते द्विज । इहागतोऽहं दास्यामि परमार्थं सुबोधितम् ॥६६॥ एक एवमिदं विद्धि न भेदि सकलं जगत् । वासुदेवाभिधेयस्य स्वरूपं परमात्मनः ॥६७॥ ब्राह्मण उवाच तथेत्युक्त्वा निदाघेन प्रणिपातपुरःसरम् । पूजितः परया भक्त्यानिच्छतः प्रययौ विभुः ॥६८॥ पुनर्वर्षसहस्रांते समायातो नरेश्वर । निदाघज्ञानदानाय तदेव नगरं गुरुः ॥६९॥ नगरस्य बहिः सोऽथ निदाघं दृष्टवान् मुनिम् । महाबलपरीवारे पुरं विशति पार्थिवे ॥७०॥ दूरस्थितं महाभागे जनसंमर्दवर्जकम् । क्षुत्क्षामकण्ठमायांतमरण्यात्ससमित्कुशम् ॥७१॥ दृष्ट्वा निदाघं स ऋभुरुपागत्याभिवाद्य च । उवाच कस्मादेकांते स्थीयते भवता द्विज ॥७२॥ निदाघ उवाच भो विप्र जनसंमर्द्दो महानेष जनेश्वरे । प्रविवक्षौ पुरे रम्ये तेनात्र स्थीयते मया ॥७३॥ जानकर अपने मन को स्थिर कीजिए और मुक्ति के उपायों को प्राप्त कीजिए ॥६३॥ नृप ! ऋभु की इस परमार्थ से भरी हुई वाणी को सुनकर महाभाग निदाघ उनके चरणों पर गिर पड़ा और बोला ॥६४॥ द्विज ! प्रसन्न होइए, मेरे कल्याण के लिए आप बतलाइए कि आप कौन हैं, जो यहाँ आये हुए हैं ? आपकी इन बातों को सुनकर मेरा सारा मोह नष्ट हो गया ॥६५॥ ऋभु बोले--मैं तुम्हारा आचार्य ऋभु हूँ। द्विज ! तुमको ज्ञान दान करने के लिए यहाँ आया हूँ। तुमको उचित और स्पष्ट परमार्थ ज्ञान दूंगा ॥६६॥ यह समस्त संसार परमात्मा वासुदेव का रूप है, एक है, और अभिन्न है ॥६७॥ ब्राह्मण बोला--निदाघ ने गुरु का उपदेश स्वीकार किया और अत्यन्त निष्ठा से गुरु का चरणवन्दन कर उनकी पूजा की। ऋभु गुरु भी उसकी पूजा से प्रसन्न होकर चले गए ॥६८॥ फिर एक हजार वर्ष बीत जाने पर गुरु जी इसी नगर में अपने शिष्य को ज्ञान देने के लिए आये ॥६९॥ उस समय उन्होंने नगर के बाहर मुनि निदाघ को बैठे हुए देखा। उसी समय राजा भी अपने सैनिकों और राजपुरुषों के साथ नगर में प्रवेश कर रहा था। मुनि निदाघ अरण्य से समिधा और कुश लिए हुए आ रहा था। भूख-प्यास से उसका कण्ठ सूख गया था और भीड़ से बचने के लिए वह दूर खड़ा था ॥७०-७१॥ ऋभु उसको देखकर समीप आये और अभिवादन कर पूछा--"द्विज ! आप यहाँ एकान्त में क्यों बैठे हैं ?" ॥७२॥ निदाघ बोला--विप्र ! आज नरेश्वर इस रम्य पुर में समारोह के साथ प्रवेश कर रहे हैं जिससे अधिक भीड़ हो गई है इसीलिए मैं यहाँ बैठा हूँ ॥७३॥