बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३२१ किमेतदित्याह समं गम्यतां शिबिकावहाः । पुनस्तथैव शिबिकां विलोक्य विषमां हसन् ॥५०॥ नृपः किमेतदित्याह भवद्भिर्गम्यतेऽन्यथा । भूपतेर्वदतस्तस्य श्रुत्वेत्थं बहुशो वचः । शिबिकावाहकाः प्रोचुरयं यातीत्यसत्वरम् ॥५१॥ राजोवाच किं श्रांतोऽस्यल्पमध्वानं त्वयोढा शिबिका मम । किमायासासहो न त्वं पीवा नासि निरीक्ष्यसे ॥५२॥ ब्राह्मण उवाच नाहं पीवा न चैवोढा शिबिका भवतो मया । न श्रांतोऽस्मि न चायासो वोढान्योऽस्ति महीपते ॥५३॥ राजोवाच प्रत्यक्षं दृश्यते पीवा त्वद्यपि शिबिका त्वयि । श्रमश्च भारोद्वहने भवत्येव हि देहिनाम् ॥५४॥ ब्राह्मण उवाच प्रत्यक्षं भवता भूप यद्दृष्टं मम तद्वद । बलवानबलश्चेति वाच्यं पश्चाद्विशेषणम् ॥५५॥ त्वयोढा शिबिका चेति त्वय्यद्यापि च संस्थिता । मिथ्या तदप्यत्र भवान् शृणोतु वचनं मम ॥५६॥ भूमौ पादयुगे चाथ जंघे पादद्वये स्थिते । ऊरू जंघाद्वयावस्थौ तदाधारं तथोदरम् ॥५७॥ वक्षःस्थलं तथा बाहू स्कंधौ चोदरसंस्थितौ । स्कंधाश्रितेयं शिबिका ममाधारोऽत्र किंकृतः ॥५८॥ शिबिकायां स्थितं चेदं देहं त्वदुपलक्षितम् । तत्र त्वमहमप्येतद्युच्यते चेदमन्यथा ॥५९॥
देखकर राजा हँसता हुआ बोला--क्यों, क्या बात है ? तुम लोग क्यों समगति से नहीं चलते ? राजा के बार- बार वैसा कहने पर जड़ भरत की ओर संकेत करके कहारों ने कहा--यह धीरे-धीरे चलता है ॥४६-५१॥ राजा बोला--क्यों थक गए हो क्या ? अरे ! अभी तो थोड़ी ही दूर पालकी आई है ? क्या तुम परिश्रम से थक जाते हो ? देखने में तो मोटे दिखाई दे रहे हो ?॥५२॥ ब्राह्मण बोला-न तो मैं मोटा हूँ और न मैंने तुम्हारी पालकी ढोई, न थका हुआ हूँ और न मुझे कोई खेद ही है । महीपते ! पालकी को ढोने वाला तो कोई दूसरा ही है ॥५३॥ राजा ने कहा- स्पष्टतः तुम मोटे दिखाई देते हो, पालकी भी अब तक तुम्हारे कन्धे पर पड़ी हुई है और बोझा ढोने में प्राणी को श्रम होता ही है ॥५४॥ ब्राह्मण बोला-भूप, तुमने जो कुछ प्रत्यक्ष देखा है वह कहो, पीछे बली और दुर्बल विशेषण लगाना ॥५५॥ तुमने जो अभी कहा कि मैंने पालकी ढोई है और अब तक पालकी मेरे कन्धे पर है, यह सब मिथ्या है। कैसे ? इसके लिए भी मेरी बातें सुनो ॥५६॥ ये दोनों पैर भूमि पर हैं, दोनों जंघे पैर पर स्थित हैं, कटि और नितम्ब जंघे पर अवलम्बित हैं, कटि भी उदर का आधार है, उदर छाती का, दोनों भुजायें और कन्धे उदर के ही सहारे पर हैं । शिविका कन्धे पर है, तो इसमें मैं किसका आधार हूँ ? ॥५७-५८॥ पालकी में स्थित तुम्हारा शरीर है ऐसा जो समझते हो यह भी भ्रम ही है । उस पालकी में तुम हो, मैं हूँ, यह कहना भी अनुपयुक्त है । पार्थिव ! मैं, तुम आदि का जो व्यवहार यहाँ किया जा रहा है वह भी मिथ्या ही है । पार्थिव ! मैं, तुम और ४१-ना० पु०