बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२० नारदीयपुराणम्
न ददर्श च कर्माणि शास्त्राणि जगृहे न च । उक्तोऽपि बहुशः किञ्चिज्जडं वाक्यमभाषत ॥३५॥ तदप्यसंस्कारगुणं ग्राम्यभावोक्तिसंवृतम् । अपध्वस्तवपुः सोऽपि मलिनाम्बरधृङ् मुने ॥३६॥ विलग्नदंतांतरः सर्वैः परिभूतः स नागरैः । संमानेन परां हानि योगर्द्धेः कुरुते यतः ॥३७॥ जनेनावमतो योगी योगसिद्धिं च विंदति । तस्माच्चरेत वै योगी सतां धर्ममदूषयन् ॥३८॥ जना यथावमन्येयुर्गच्छेयुर्नैव संगतिम् । हिरण्यगर्भबचनं विचितयेत्थं महामतिः ॥३९॥ आत्मानं दर्शयामास जडोन्मत्ताकृतिं जने । भुंक्ते कुलमाषवटकान् शाकं वन्यफलं कणान् ॥४०॥ यद्यदाप्नोति स बह्नत्ति वै कालसंभवम् । पितर्युपरते सोऽथ भ्रातृभ्रातृव्यबांधवैः ॥४१॥ कारितः क्षेत्रकर्मादि कदन्नाहारपोधितः । सरूक्षपीनावयवो जडकारी च कर्मणि ॥४२॥ सर्वलोकोपकरणं बभूवाहारवेतनः । तं तादृशमसंस्कारं विप्रानुकृतिविचेष्टितम् ॥४३॥ क्षत्ता सौवीरराजस्य विष्टियोग्यममन्यत । स राजा शिविकारूढो गंतुं कृतमतिर्द्विज ॥४४॥ बभूवेक्षुमतीतीरे कपिलेश्वेराश्रमम् । श्रेयः किमत्र संसारे दुःखप्राये नृणामिति ॥४५॥ प्रष्टुं तं मोक्षधर्मज्ञं कपिलाख्यं महामुनिम् । उवाह शिविकामस्य क्षत्तृर्वचनचोदितः ॥४६॥ नृणां विष्टिगृहीतानामन्येषां सोऽपि मध्यमः । गृहीतो विष्टिना विप्र सर्वज्ञानैकभाजनम् ॥४७॥ जातिस्मरोऽसौ पापस्य क्षयकाम उवाह ताम् । ययौ जडप्रतिस्तत्र युगमात्रावलोकनम् ॥४८॥ कुर्वन्मतिमतां श्रेष्ठस्ते त्वन्ये त्वरितं ययुः । विलोक्य नृपतिः सोऽथ विषमं शिविकागतम् ॥४६॥
देता था सो भी शुद्ध वाक्य नहीं; प्रत्युत ग्रामीणों की भाँति ग्राम्य भाषा का ही प्रयोग करता था । मुने ! वह सदा मैले-कुचैले कपड़े पहन कर लँगड़े-लूले की भाँति बना रहता था ॥३५-३६॥ नागरिक प्रायः उसका अपमान करते थे । यहाँ तक कि मारकर लोगों ने उसके दाँत तोड़ दिये । चूंकि सम्मान से योग सिद्धि में बाधा पड़ती है और लोक से अपमानित योगी सिद्धि प्राप्त करता है। अतएव योगी सज्जनों द्वारा आदृत धर्म की रक्षा करता हुआ आचरण करे ॥३७-३८॥ लोग जितना ही अधिक उसका अपमान करेंगे और उसकी संगति से बचेंगे उतना ही उसका कल्याण होगा । महामति वह योगी भरत ब्रह्मा के इस आदेश का चिन्तन कर लोक में अपने को मूर्ख जड़ की भाँति रखता था ॥३९॥ स्वयं उड़द की रोटी, शाक और जंगली फलों और मोटे अन्न को खाता था। जो कुछ भोजन के समय मिल जाता था उसी को बहुत मानकर खा लेता था । पिता के मर जाने पर उसके भाई- बन्धुओं ने कदन्न खिला-खिलाकर उससे खेती का काम भली-भाँति कराया। रूखे और पुष्ट अंगों वाले बेचारे भरत से, जिसको इच्छा होती थी वही केवल भोजन मात्र देकर अपना काम कराता था ॥४०-४२॥ एक दिन सौवीरराज के सारथि ने उस विप्र के समान आकृति और चेष्टा करने वाले मैले-कुचैले भरत को डोली ढोने (कहार) के योग्य समझा । द्विज ! उस राजा ने सोचा कि डोली पर चढ़कर इक्षुमती के तीर पर कपिल मुनि के श्रेष्ठ आश्रम में चलना चाहिए। इस दुःखमय संसार में मनुष्य का कल्याण कैसे हो सकता है, इसी प्रश्न को पूछने के लिए महामुनि कपिल के पास जाना चाहता था । सारथि की आज्ञा के अनुसार वह ब्राह्मण डोली ढोने लगा ॥४३-४६॥ विना मजदूरी के काम करने वाले कहारों के साथ वह सर्वज्ञ ब्राह्मण भी पकड़ा गया। पूर्व जन्म का ज्ञानी वह ब्राह्मण अपने पापों के क्षय के लिए उस कर्म को उचित समझकर पालकी ढोने लगा । बुद्धिमानों में श्रेष्ठ वह ब्राह्मण पालकी के डंडे तक आगे की भूमि देखता हुआ मन्द गति से चलता था । अन्य लोग तेजी से चल रहे थे ॥४७-४८॥ पालकी की चाल में कुछ विषमता देखकर राजा ने कहा--यह क्या, ऐ कहारो, सीधी चाल से चलो। फिर पालकी की गति में वैसी ही विषमता