भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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३२२ नारदीयपुराणम् अहं त्वं च तथान्ये च भूतैरुह्याश्च पार्थिव। गुणप्रवाहपतितो भूतवर्गोऽपि यात्ययम् ॥६०॥ कर्मवश्या गुणाश्चैते सत्त्वाद्याः पृथिवीपते। अविद्यासंचितं कर्म तच्चाशेषेषु जंतुषु ॥६१॥ आत्मा शुद्धोऽक्षरः शांतो निर्गुणः प्रकृते परः। प्रवृद्ध्यपचयौ न स्त एकस्याखिलजन्तुषु ॥६२॥ यदा नोपचयस्तस्य नचैवापचयो नृप। तदापि बालिशोऽसि त्वं कया युक्त्या त्वयेरितम् ॥६३॥ भूपादजंघाकट्यूरुजठरादिषु संस्थिता। शिविकेयं यदा स्कंधे तदा भारः समस्त्वया ॥६४॥ तथान्यजंतुभिर्भूप शिविकोढा न केवलम्। शैलद्रुमगृहोत्थोऽपि पृथिवीसंभवोऽपि च ॥६५॥ यथा पुंसः पृथग्भावः प्राकृतैः करणैर्नृप। सोढव्यः सुमहान्भारः कतमो नृप ते मया ॥६६॥ यद्द्रव्यो शिबिका चेयं तद्द्रव्यो भूतसंग्रहः। भवतो मेऽखिलस्यास्य समत्वेनोपबृंहितः ॥६७॥ सनंदन उवाच एवमुक्त्वाऽभवन्मौनी स वहञ्शिबिकां द्विजः। सोऽपि राजाऽवतीर्योर्व्यां तत्पादौ जगृहे त्वरन् ॥६८॥ राजोवाच भो भो विसृज्य शिबिकां प्रसादं कुरु मे द्विज। कथ्यतां को भवानत्र जालरूपधरः स्थितः ॥६९॥ यो भवान्यदपत्यं वा यदागमनकारणम्। तत्सर्वं कथ्यतां विद्वन्मह्यं शुश्रूषवे त्वया ॥७०॥ ब्राह्मण उवाच श्रूयतां कोऽहमित्येतद्वक्तुं भूप न शक्यते। उपयोगनिमित्तं च सर्वत्रागमनक्रिया ॥७१॥ सुखदुःखोपभोगौ तु तौ देहाद्युपपादकौ। धर्माधर्मोद्भवौ भोक्तुं जंतुर्देहादिमृच्छति ॥७२॥ दूसरे सभी प्राणी सभी भूतों (पंच महाभूतों) द्वारा ढोये जाते हैं। पृथिवीपते ! यह भूत-समूह भी गुण-प्रवाह के वश में होकर कार्यसंचालन करता है ॥५६-६०॥ सत्त्व आदि गुण-प्रवाह भी कर्म के वश में रहते हैं। अविद्या-संचित कर्म अशेष जन्तुओं में रहता है ॥६१॥ आत्मा शुद्ध, अक्षर, शान्त, निर्गुण और प्रकृति से परे है। वह एक ही सम्पूर्ण जीवों में व्याप्त है। उसकी वृद्धि अथवा ह्रास कभी नहीं होता ॥६२॥ नृप ! जब उस आत्मा में ह्रास और वृद्धि नहीं होती, तब तुमने किस युक्ति से ऐसा कहा है कि तुम मोटे हो ॥६३॥ यदि क्रमशः पृथ्वी, पैर, जंघा, ऊरु, कटि तथा उदर आदि अंगों पर स्थित हुए कंधे के ऊपर रखी हुई यह शिविका मेरे लिए भार रूप हो सकती है तो उसी प्रकार तुम्हारे लिए भी तो हो सकती है ॥६४॥ राजन् ! इस युक्ति से तो अन्य समस्त जीवों ने भी न केवल पालकी उठा रखी है, बल्कि सम्पूर्ण पर्वत, वृक्ष, गृह और पृथ्वी आदि का भार भी अपने ऊपर ले रखा है। राजन् ! जिस द्रव्य से यह पालकी बनी हुई है, उसी से यह तुम्हारा, मेरा अथवा अन्य सबका शरीर भी बना है, जिसमें सबने ममता बढ़ा रखी है ॥६५-६७॥ सनन्दन बोले-यह कह कर वह ब्राह्मण मौन हो गया और शिविका को पूर्व की भाँति ढोने लगा। उस राजा ने भी पृथ्वी पर उतर कर शीघ्र ही उस ब्राह्मण के पैर पकड़ लिये ॥६८॥ राजा ने कहा-हे द्विज ! पालकी को छोड़ दीजिए और मेरे ऊपर कृपा कीजिए। कहिए आप कौन हैं जो इस कपट वेश में छिपे हुए हैं ॥६९॥ आप कौन हैं आपके पिता का नाम क्या है, आप किसलिए इधर-उधर घूम रहे हैं ? विद्वन् ! आप इन सब बातों का उत्तर मुझ सेवक को दीजिए ॥७०॥ ब्राह्मण बोला--भूप ! सुनो। मैं कौन हूँ, यह कह नहीं सकता। सर्वत्र सबका आगमन किसी प्रयोजन से ही होता है ॥७१॥ सुख-दुःख का उपभोग ही शरीर धारण करने का कारण है। जीव धर्म और अधर्म के