बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३२३ सर्वस्यैव हि भूपाल जंतोः सर्वत्र कारणम् । धर्माधर्मौ यतस्तस्मात्कारणं पृच्छ्यते कुतः ॥७३॥ राजोवाच धर्माधर्मौ न संदेहः सर्वकार्येषु कारणम् । उपभोगनिमित्तं च देहाद्देहांतरागमः ॥७४॥ यत्त्वेतद्भवता प्रोक्तं कोऽहमित्येतदात्मनः । वस्तुं न शक्यते श्रोतुं तन्ममेच्छा प्रवर्तते ॥७५॥ योऽस्ति योऽहमिति ब्रह्मन्कथं वक्तुं न शक्यते । आत्मन्येव न दोषाय शब्दोऽहमिति यो द्विज ॥७६॥ ब्राह्मण उवाच शब्दोऽहमिति दोषाय नात्मन्येवं तथैव तत् । अनात्मन्यात्मविज्ञानं शब्दो वा श्रुतिलक्षणः ॥७७॥ जिह्वा ब्रवीत्यहमिति दंतौष्ठतालुकं नृप । एतेनाहं यतः सर्वे वाङ्निष्पादनहेतवः ॥७८॥ किं हेतुभिर्वदत्येषा वागेवाहमिति स्वयम् । तथापि वागहमेतद्वक्तुमित्थं न युज्यते ॥७६॥ पिंडः पृथग्यतः पुंसः शिरः पाण्यादिलक्षणः । ततोऽहमिति कुर्वैनां संज्ञां राजन्करोम्यहम् ॥८०॥ यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि मत्तः पार्थिवसत्तम । न देहोऽहमयं चान्ये वक्तुमेवमपीष्यते ॥८१॥ यदा समस्तदेहेषु पुमानेको व्यवस्थितः । तदा हि को भवान्कोऽहमित्येतद्विफलं वचः ॥८२॥ त्वं राजा शिविका चेयं वयं वाहाः पुरःसराः । अयं च भवतो लोको न सदेतन्नृपोच्यते ॥८३॥ वृक्षाद्दारु ततश्चेयं शिविका त्वदधिष्ठिता । क्व वृक्षसंज्ञा वै तस्या दारुसंज्ञाथवा नृप ॥८४॥ वृक्षारूढो महाराजो नायं वदति ते जनः । न च दारुणि सर्वस्त्वां ब्रवीति शिविकागतम् ॥८५॥ उत्पन्न सुख-दुःख के भोग के लिए शरीर प्राप्त करता है ॥७२॥ भूपाल ! सब जन्तुओं की उत्पत्ति के कारण धर्म और अधर्म ही हैं। तो फिर कारण क्यों पूछ रहे हो ? ॥७३॥ राजा बोला—निस्सन्देह धर्म और अधर्म सब कार्यों के कारण हैं और केवल उपभोग ही जन्मान्तर प्राप्त करने का कारण है ॥७४॥ आपने अभी जो यह कहा है कि 'मैं कौन हूँ यह नहीं कह सकता' सो इसको सुनने की इच्छा प्रबल रूप से हो रही है ॥७५॥ ब्रह्मन् ! जो आपका परिचय है, उसको कहने में आप क्यों नहीं समर्थ हो रहे हैं ? द्विज ! अपने विषय में मैं ऐसा हूँ, यह कहने से कुछ दोष नहीं होता ॥७६॥ ब्राह्मण बोला—अहम् (मैं) शब्द का प्रयोग आत्मा के विषय में करने से कुछ दोष नहीं, परन्तु अनात्मा में आत्मविज्ञान हो जाने के कारण अमात्मक ज्ञान हो जाने से 'मैं' शब्द का प्रयोग भ्रान्ति है। नृप ! जीभ 'मैं' ऐसा कहती है, परन्तु दाँत, ओठ और तालु सब शब्दोच्चारण में सहायक हैं। तो क्या वाणी अपने को 'मैं' ऐसा कहती है ? तथापि मैं वाणी हूँ, यह कहना सर्वथा अनुचित है ॥७७-७९॥ इसके अतिरिक्त 'अहम्' ऐसा कहना सर्वथा अनु- चित है, क्योंकि शिर, हाथ आदि से युक्त शरीर-पिंड से मनुष्य का आत्मा सर्वथा पृथक है, राजन् ! तो मैं 'मैं' शब्द का प्रयोग किसके लिए करू । यदि मुझसे अतिरिक्त कोई और भी सजातीय आत्मा हो तो भी 'यह मैं हूँ और यह अन्य है'—ऐसा कहना उचित हो सकता था। जब समस्त शरीर में एक ही पुरुष विराजमान है तब आप कौन हैं, मैं कौन हूँ, इस विषय में कुछ कहना व्यर्थ होगा ॥८०-८२॥ तुम राजा हो, यह पालकी है, हम सभी इसके ढोने वाले हैं, यह राज्य आपका है, ये सब बातें सत्य नहीं कही जा सकती हैं ॥८३॥ वृक्ष से लकड़ी आई, उसकी पालकी बनी जिस पर तुम बैठे हो। नृप ! तुम्हीं बताओ कि इसका नाम वृक्ष रखना ठीक होगा या लकड़ी ॥८४॥ महाराज वृक्ष पर बैठे हैं ऐसा तुम्हारे सेवक नहीं कहते हैं और न तो शिविका में बैठने के कारण तुमको लकड़ी पर बैठा हुआ ही कहा जाता है। शिविका दारु का समूह है और अपने लिए एक विशेष नाम का