भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 1008 में से

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३२४ नारदीयपुराणम् शिबिकादारुसंघातो स्वनामस्थितिसंस्थितः । अन्विष्यतां नृपश्रेष्ठानन्ददा शिविका त्वया ॥८६॥ एवं छत्रं शलाकाभ्यः पृथग्भावो विमृश्यताम् । क्व जातं छत्रमित्येष न्यायस्त्वयि तथा मयि ॥८७॥ पुमान्स्त्री गौरजा वाजी कुंजरो विहगस्तरुः । देहेषु लोकसंज्ञेयं विज्ञेया कर्महेतुषु ॥८८॥ पुमान्न देवो न नरो न पशुर्न च पादपः । शरीराकृतिभेदास्तु भूपते कर्मयोनयः ॥८९॥ वस्तु राजेति यल्लोके यच्च राजभटात्मकम् । तथान्यच्च नृपेत्थं तन्न सत्यं कल्पनामयम् ॥९०॥ यस्तु कालांतरेणापि नाशसंज्ञामुपैति वै । परिणामादिसंभूतं तद्वस्तु नृप तच्च किम् ॥९१॥ त्वं राजा सर्वलोकस्य पितुः पुत्रो रिपो रिपुः । पत्न्याः पतिः पिता सूनोः कस्त्वं भूप वदाम्यहम् ॥९२॥ त्वं किमेतच्छिरः किं नु शिरस्तव तथोदरम् । किमु पादादिकं त्वेतन्नैवं किं ते महीपते ॥९३॥ समस्तावयवेभ्यस्त्वं पृथग्भूतो व्यवस्थितः । कोऽहमित्यत्र निपुणं भूत्वा चिंतय पार्थिव ॥९४॥ एवं व्यवस्थिते तत्त्वे मयाहमिति भावितुम् । पृथक्चरणनिष्पाद्यं शक्यं तु नृपते कथम् ॥९५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वि० पा० अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४८॥ आश्रय लेकर स्थित है। नृपश्रेष्ठ ! इसलिए तुम दारु-समूह से अलग आनन्ददायक पालकी ढूँढ़ो। इसी प्रकार शलाकादि से पृथक् छत्र भी ढूँढ़ो। छत्र कहाँ गया, यह प्रश्न तुम्हारे और मेरे लिए भी समान है ॥८५-८७॥ पुरुष, स्त्री, गौ, बकरी, अश्व, हाथी, पक्षी और वृक्ष आदि संज्ञायें कर्म के द्वारा प्राप्त शरीर की ही हैं ॥८८॥ भूप ! वस्तुतः पुरुष, मनुष्य, पशु और वृक्ष आदि संज्ञायें केवल शरीर और आकृति के भेद के कारण हैं, जो कि कर्म के कारण है ॥८९॥ इस लोक में राजा, राजसेवक तथा अन्य जो संज्ञायें हैं ये सब केवल कल्पना ही हैं सत्य नहीं ॥९०॥ जो कालान्तर में नष्ट हो जाते और पुनः नवीन संज्ञा (नाम) प्राप्त करते हैं। नृप ! परिणाम आदि के कारण नयी संज्ञा नहीं प्राप्त करती वही परमार्थ वस्तु है। वह क्या है इसको तो देखो । तुम अखिल लोक के राजा हो, किसी पिता के पुत्र हो, किसी शत्रु के शत्रु हो, किसी पत्नी के पति और किसी पुत्र के पिता हो, अब तुम को बता रहा हूँ कि तुम कौन हो। तुम क्या यह शिर हो ? नहीं, शिर तो तुम्हारा है और उदर भी तुम्हारा ही है। महीपते ! क्या ये पैर, हाथ आदि तुम्हारे नहीं हैं ? वस्तुतः तुम इन समस्त शरीरावयवों से पृथक् स्थित हो। पार्थिव ! तुम कौन हो, इस विषय को सावधान हो कर विचारो। इस प्रकार रहस्यमय होने के कारण 'मैं कौन हूँ' इस विषय में मैं 'चरण आदि शरीर अवयवों से पृथक हूँ' ऐसा कहना कैसे सरल कहा जा सकता है ॥९१-९५॥ श्रीनारदीय महापुराण के पूर्वार्द्ध में अड़तालीसवां अध्याय समाप्त ॥४८॥

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