बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३०६ केशिध्वज उवाच न प्रार्थितं त्वया कस्मान्मम राज्यमकंटकम् ।॥७८॥ राज्यलाभाद्धि नास्त्यन्यत्क्षत्रियाणामतिप्रियम् । खांडिक्य उवाच केशिध्वज निबोध त्वं मया न प्रार्थितं यतः । राज्यमेतदशेषेण यन्न गृह्नन्ति पंडिताः । क्षत्रियाणामयं धर्मो यत्प्रजापरिपालनम् ॥७९॥ वधश्च धर्मयुद्धेन स्वराज्यपरिपन्थिनाम् । यत्राशक्तस्य मे दोषो नैवास्त्यपकृते त्वया ॥८०॥ बंधायैव भवत्येषा ह्यविद्या चाक्रमोज्झिता । जन्मोपभोगलिप्सार्थमियं राज्यस्पृहा मम ॥८१॥ अन्येषां दोषजानेव धर्ममेवानुरुध्यते । न याच्ञा क्षत्रबंधूनां धर्मावैतत्सतां मतम् ॥८२॥ अतो न याचितं राज्यमविद्यांतर्गतं तव । राज्यं गृह्णन्त्यविद्वांसो ममत्वाकृष्टचेतसः ॥८३॥ अहम्मानमहापालमदमत्ता न मादृशाः ॥ केशिध्वज उवाच ॥८४॥ अहं च विद्यया मृत्युं तर्तुकामः करोमि वै राज्यं यज्ञांश्च विविधान्भोगे पुण्यक्षयं तथा । तदिदं ते मनो दिष्ट्या विवेकैश्वर्यतां गतम् ॥८५॥ श्रूयतां चाप्यविद्यायाः स्वरूपं कुलर्नंदन । अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या ह्यस्वे स्वविषया मतिः ॥८६॥ अविद्यातरुसंभूतं बीजमेतद्विद्वधा स्थितम् । पंचभूतात्मके देहे देही मोहतमोवृतः ॥८७॥ केशिध्वज बोला--तुमने मुझसे अंकटक राज्य क्यों नहीं माँगा ? राज्य-प्राप्ति के अतिरिक्त क्षत्रियों के लिए कोई अति प्रिय वस्तु नहीं है ॥७७॥ खांडिक्य ने कहा--केशिध्वज ! मैंने तुम्हारा सम्पूर्ण राज्य क्यों नहीं माँगा, इसका कारण सुनो । विद्वान् पुरुष राज्य की इच्छा नहीं करते । प्रजा का पालन करना और धर्मयुद्ध से अपने राज्य के शत्रुओं का वध करना क्षत्रियों का धर्म है । मैं इस कर्तव्य के पालन में असमर्थ हो गया था, इसलिए यदि आपने मेरे राज्य का अपहरण कर लिया है तो इसमें कोई दोष की बात नहीं है ॥७८-८०॥ यह राजकार्य अविद्या है, जो केवल बन्धन में ही डालने वाली है । मेरी राज्याकांक्षा केवल जन्म के उपभोग की लिप्सा होगी, कल्याण का कारण नहीं ॥८१॥ दूसरों का दोष-दर्शन धर्म में बाधा पहुँचाता है। माँगना क्षत्रियों का नहीं, प्रत्युत क्षत्रबन्धुओं (धर्मभ्रष्ट क्षत्रियों) का कार्य है, ऐसा सज्जन लोग कहते हैं ॥८२॥ यही कारण है कि अविद्या की श्रेणी में आने वाले तुम्हारे राज्य की याचना मैंने नहीं की। वे अज्ञानी व्यक्ति राज्य का लोभ करते हैं जिनका चित्त मोह के वशीभूत हो जाता है और जो अहंकार और मान के नशे में मतवाले होते हैं; मेरे जैसे राज्य का लोभ नहीं करते हैं ॥८३३॥ केशिध्वज ने कहा--मैं विद्या के द्वारा मृत्यु से पिण्ड छुड़ाने के लिए राज्य और विविध कर्म करता हूँ । यज्ञों को करता हूँ । भोग करने से सब पुण्यों का क्षय हो जाता है । तुम्हारा मन निष्कलुष होकर परमविवेकी बन गया है । कुलन्दन ! अविद्या की परिभाषा सुनो ॥८४-८५३॥ अविद्या रूपी वृक्ष की उत्पत्ति का जो बीज है, यह दो प्रकार का है--अनात्मा में आत्मबुद्धि और जो अपना नहीं है उसे अपना मानना (अर्थात् अहंता और ममता) । इस पाँच भौतिक शरीर में आत्मा मोह के अन्धकार से ढका रहता है। मूर्ख अज्ञानवश 'मैं यह हूँ' ऐसी उच्च