बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०८ नारदीयपुराणम् तथैवाधिजनोऽप्यर्थैर्योजितोऽभिसतैर्मया । यथाहं मर्त्यलोकस्य मया सर्वं विचेष्टितम् ॥६५॥ अनिष्पन्नक्रियं चेतस्तथा न मम किं यथा । इत्थं तु चिंतयन्नेव सस्मार स महीपतिः ॥६६॥ खांडिक्याय न दत्तेति मया वै गुरुदक्षिणा । स जगाम ततो भूयो रथमारुह्य पार्थिवः ॥६७॥ स्वायंभुवः स्थितो यत्र खांडिक्योऽरण्यदुर्गमम् । खांडिक्योऽपि पुनर्द्दष्ट्वा तमायान्तं धृतायुधः ॥६८॥ तस्थौ हंतुं कृतमतिस्तमाह स पुनर्नृपः । अहं तु नापकाराय प्राप्तः खांडिक्य मा क्रुधः ॥६९॥ गुरोर्निष्कृतिदानाय मामवेहि समागतम् । निष्पादितो मया यागः सम्यक् त्वदुपदेशतः ॥७०॥ सोऽहं ते दातुमिच्छामि वृणीष्व गुरुदक्षिणाम् । इत्युक्तो मंत्रयामास स भूयो मंत्रिभिः सह ॥७१॥ गुरोर्निष्कृतिकामोऽयं किमयं प्रार्थ्यतां मया । तमूचुर्मंत्रिणो राज्यमशेषं याच्यतामयम् ॥७२॥ कृतिभिः प्रार्थ्यते राज्यमनायासितसैनिकैः । प्रहस्य तानाह नृपः स खांडिक्यो महीपतिः ॥७३॥ स्वल्पकालं महीराज्यं मादृशैः प्रार्थ्यते कथम् । एतमेतद्भवंतोऽत्र स्वार्थसाधनमंत्रिणः ॥७४॥ परमार्थः कथं कोऽत्र यूयं नात्र विचक्षणाः । इत्युक्त्वा समुपैत्यैनं स तु केशिध्वजं नृपम् ॥७५॥ उवाच किमवश्यं त्वं दास्यसि गुरुदक्षिणाम् । बाढमित्येव तेनोक्तः खांडिक्यस्तमथाब्रवीत् ॥७६॥ भवानध्यात्मविज्ञानपरमार्थविचक्षणः । यदि चेद्दीयते मह्यं भवता गुरुनिष्क्रयः ॥७७॥ तत्क्लेशप्रशमायालं यत्कर्म तदुदीरय साथ ही याचकों को उनकी इच्छा के अनुसार दान भी दिया। मैंने जिस प्रकार मर्त्यलोक की विधियाँ होती हैं उनको पूरा कर दिया, परन्तु फिर भी मेरे चित्त में कुछ कार्य सिद्ध न होने के समान असंतोष क्यों हो रहा है ॥६३-६४½॥ इस प्रकार वह विचार कर ही रहा था कि उस भूपाल को यह स्मरण हो गया कि ओह! मैंने खाण्डिक्य को अब तक गुरु दक्षिणा नहीं दी ॥६५½॥ फिर वह भूपाल रथ पर आरूढ़ होकर उस दुर्गम वन में गया, जहाँ स्वायंभुव खाण्डक्य रहता था। पुनः उसको वन की ओर आते देखकर खाण्डक्य ने धनुष उठा लिया और उसको मारने के अभिप्राय से तैयार हो गया ॥६६-६७½॥ यह देखकर राजा ने उससे कहा- खाण्डक्य, क्रोध मत करो, मैं तुम्हारे किसी अपकार की इच्छा से नहीं आया हूँ। गुरुदक्षिणा देने के लिए मैं आया हूँ, ऐसा समझो। तुम्हारे उपदेश के अनुसार मैंने अपने यज्ञ को विधिपूर्वक समाप्त किया है। अतः मैं गुरुदक्षिणा देना चाहता हूँ, माँगो ॥६८-६९½॥ यह सुनकर खाण्डक्य ने फिर मन्त्रियों से मन्त्रणा की कि यह गुरु का ऋण चुकाने के अभिप्राय से यहाँ आया हुआ है। कहो, क्या माँगा जाय । मन्त्रियों ने राजा से कहा कि इससे सम्पूर्ण राज्य माँगा जाय। जो नीतिपटु होते हैं वे बिना सैनिक सहायता के राज्य पाना चाहते हैं ॥७०-७१½॥ महामति वह नृपति खांडिक्य अदूरदर्शी मंत्रियों की मन्त्रणा सुनकर हँसता हुआ बोला-'क्षण स्थायी पृथ्वी का राज्य मेरे समान विवेकी व्यक्ति कैसे माँग सकता है। आप लोग ऐसे ही केवल स्वार्थ-साधन करने का उपदेश देने वाले मन्त्री हैं। यहाँ परमार्थ क्या है इस बात को जानने में आप कुशल नहीं हैं ॥७२-७३½॥ यह कह कर वह केशिध्वज राजा के पास आया और कहा- 'तुम मुझे अवश्य गुरुदक्षिणा देना चाहते हो क्या?" 'अवश्य" केशिध्वज ने कहा- यह निश्चय सुनकर खाण्डिक्य ने कहा ॥७४-७५॥ आप अध्यात्म विज्ञान के परमार्थ जानने वाले विद्वान् हैं। यदि आप मुझको गुरुदक्षिणा देना चाहते हैं तो सांसारिक दुःखों से मुक्ति दिलाने वाले जो कर्म हैं उनको कहिए ॥७६½॥