बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३०७ येषां मत्वा वृथा चोग्राः प्रहिताः शितसायकाः । स त्वामहं हनिष्यामि न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ॥५२॥ आतताय्यसि दुर्बुद्धे मम राज्यहरो रिपुः । केशिध्वज उवाच खांडिक्य संशयं प्रष्टुं भवन्तमहमागतः ॥५३॥ न त्वां हंतुं विचार्यैतत्कोपं बाणं च मुञ्च वा । ततः स मंत्रिभिः सार्द्धमेकांते सपुरोहितः ॥५४॥ मंत्रयामास खांडिक्यः सर्वैरेव महामतिः । तमूचुर्मंत्रिणो वध्यो रिपुरेष वशंगतः ॥५५॥ हतेऽत्र पृथिवी सर्वा तव वश्या भविष्यति । खांडिक्यश्चाह तान्सर्वानेवमेव न संशयः ॥५६॥ हते तु पृथिवी सर्वा मम वश्या भविष्यति । परलोकजयस्तस्य पृथिवी सकला मम ॥५७॥ न हन्मि चेल्लोकजयो मम तस्य वसुंधरा । परलोकजयोऽनंतः स्वल्पकालो महीजयः ॥५८॥ तस्मान्नैनं हनिष्येऽहं यत्पृच्छति वदामि तत् । ततस्तमभ्युपेत्याह खांडिक्यो जनको रिपुम् ॥५९॥ प्रष्टव्यं यत्तवधा सर्वं तत्पृच्छ त्वं वदाम्यहम् । ततः प्राह यथावृत्तं होमधेनुवधं मुने ॥६०॥ ततश्च तं स पप्रच्छ प्रायश्चित्तं हि तद्व्रतम् । स चाचष्ट यथान्यायं मुने केशिध्वजाय तत् ॥६१॥ प्रायश्चित्तमशेषं हि यद्वै तत्र विधीयते । विदितार्थः स तेनैवमनुज्ञातो महात्मना ॥६२॥ यागभूमिमुपागत्य चक्रे सर्वां क्रियां क्रमात् । क्रमेण विधिवद्यागं नीत्वा सोऽवभृथाप्लुतः ॥६३॥ कृतकृत्यस्ततो भूत्वा चिंतयामास पार्थिवः । पूजिता ऋत्विजः सर्वे सदस्या मानिता मया ॥६४॥ होता है क्या ? जिनको जानकर भी तुम व्यर्थ में उनके ऊपर अपने तीखे बाणों को फेंकते हो । आज तुम्हारा शत्रु मैं तुमको अवश्य मारूँगा, मेरे जीते जी तुम आज बच नहीं सकोगे । दुर्बुद्धे ! तुम मेरे राज्य के छीनने वाले आततायी शत्रु हो ॥४९-५१½॥ केशिध्वज बोला-खाण्डिक्य ! तुमसे कुछ अपनी शंकाओं का समाधान पूछने के लिए आया हूँ, तुमको मारने के लिए नहीं । अतएव यह जानकर तुम शान्त हो जाओ । अपने बाण को धनुष से उतार दो । यह सुनकर महामति खाण्डिक्य ने एकान्त में अपने सब मंत्रियों और पुरोहितों से परामर्श किया ॥५२-५३॥ मन्त्रियों ने कहा कि यह शत्रु इस समय वश में आया हुआ है, अतः इसका वध अवश्य करना चाहिए। इसको मार देने पर सारा राज्य तुम्हारे अधिकार में आ जायगा ॥५४½॥ खाण्डिक्य ने कहा-इसमें कोई सन्देह नहीं कि ऐसा करने से सारा राज्य मेरे अधिकार में आ जायगा । उसकी हत्या करने से पृथ्वी तो मेरे वश में हो जायगी, परन्तु वस्तुतः परलोक-विजयी वही होगा ॥५५-५६॥ यदि नहीं मारता तो परलोक विजय का श्रेय मुझको प्राप्त होगा और उसके अधिकार में केवल पृथ्वी रहेगी। परलोक-जय अनन्त काल तक रहेगा, परन्तु लौकिक विजय क्षण भर ही ॥५७॥ इसलिए इसका वध नहीं करूँगा । यह जो कुछ पूछ रहा है, उसका उत्तर अवश्य दूंगा। इतना निश्चय करने के बाद जनक खाण्डिक्य अपने शत्रु के पास आया और कहा-तुमको जो कुछ पूछना हो पूछो, मैं बताऊंगा ॥५८॥ मुने ! ऐसा आश्वासन पाकर उसने होमधेनु के वध की कथा कह दी। इसके बाद उसने उसके लिए प्रायश्चित्त व्रत पूछा । मुने ! उसने न्यायानुुकूल प्रायश्चित्त की विधि बता दी और उससे सम्बन्ध रखने वाली अन्य शेष क्रियाओं को भी बता दिया ॥५९-६०½॥ उस महात्मा से इस प्रकार सब तत्त्व को जानकर वह उसकी आज्ञा लेकर यज्ञ भूमि में आया और क्रमशः सारी विधियां समाप्त कीं। क्रमशः सारी याज्ञिक क्रियाओं के करने के अनन्तर उसने अवभृथ-स्नान किया ॥६१-६२॥ सब कार्यों से निवृत्त होकर वह राजा सोचने लगा, मैंने सब ऋत्विजों की पूजा की सदस्यों का सम्मान भी किया,