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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३१७ एतत्ते कथितं सर्वं यन्मां त्वं परिपृष्टवान् । तापत्रयचिकित्सार्थं किमन्यत्कथयामि ते ॥८२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४७॥ अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः नारद उवाच श्रुतं मया महाभाग तापत्रयचिकित्सितम् । तथापि मे मनो भ्रांतं नैव स्थितिं लभतेऽञ्जसा ॥१॥ आत्मन्यतिक्रमं ब्रह्मन्दुर्जनाचरितं कथम् । सोढुं शक्येत मनुजैस्तन्ममाख्याहि मानद ॥२॥ सूत उवाच तच्छ्रुत्वा नारदेनोक्तं ब्रह्मपुत्रः सनंदनः । उवाच हर्षसंयुक्तः स्मरन्भरतचेष्टितम् ॥३॥ सनंदन उवाच अत्र ते कथयिष्यामि इतिहास पुरातनम् । यं श्रुत्वा त्वन्मनो भ्रांतमास्थानं लभते भृशम् ॥४॥ आसीत्पुरा मुनिश्रेष्ठ भरतो नाम भूपतिः । आर्षभो यस्य नाम्नेदं भारतं खण्डमुच्यते ॥५॥ को नष्ट करने वाली सिद्धिमती भूमिका प्राप्त की । इस प्रकार त्रिताप को नष्ट करने वाली योग विद्या के लिए तुमने जो उपाय पूछा था, वह सब मैंने बता दिया । अब और क्या कहूँ ॥८१-८२॥ श्रीनारदीयमहापुराण के पूर्वभाग में संतालीसवां अध्याय समाप्त ॥४७॥ अध्याय ४८ ज्ञान-चर्चा-प्रसंग में राजा भरत का उपाख्यान नारद बोले- महाभाग ! त्रिताप को दूर करने वाले योग-रहस्य को तो सुना फिर भी मेरा मन भ्रम में ही पड़ा हुआ है, किसी प्रकार पूर्णरूप से शान्ति नहीं मिल रही है ॥१॥ ब्रह्मन् ! मानद ! अब यह बताने का कष्ट करें कि दुष्टों के विपरीत आचरण को मनुष्य किस प्रकार सह सकता है ॥२॥ सूत बोले-नारद के प्रश्न को सुनकर ब्रह्म-पुत्र सनन्दन प्रसन्न होकर राजा भरत के चरित्र का स्मरण करते हुए बोले ॥३॥ इस विषय में तुमको एक प्राचीन इतिहास सुना रहा हूँ जिसको सुनकर तुम्हारा भ्रान्त मन भली-भाँति शान्ति प्राप्त करेगा ॥४॥ मुनिश्रेष्ठ ! प्राचीन काल में ऋषभ-पुत्र भरत नाम का एक राजा था, जिसके नाम

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३१८ | नारदीयपुराणम् स राजा प्राप्तराज्यस्तु पितृपैतामहं क्रमात् । पालयामास धर्मेण पितृवद्रञ्जयन् प्रजाः ॥६॥ ईजे च विविधैर्यज्ञैर्भगवन्तमधोक्षजम् । सर्वदेवात्मकं ध्यायन्नानाकर्मसु तन्मतिः ॥७॥ ततः समुत्पाद्य सुतान्विरक्तो विषयेषु सः । मुक्त्वा राज्यं ययौ विद्वान्पुलस्त्यपुलहाश्रमम् ॥८॥ शालग्रामं महाक्षेत्रं मुमुक्षुजनसेवितम् । तत्रासौ तापसो भूत्वा विष्णोराराधनं मुने ॥६॥ चकार भक्तिभावेन यथालब्धसपर्यया । नित्यं प्रातः समाप्लुत्य निर्मलेऽम्भसि नारद ॥१०॥ उपतिष्ठेद्रविं भक्त्या गृणन्ब्रह्माक्षरं परम् । अथाश्रमे समागत्य वासुदेवं जगत्पतिम् ॥११॥ समाहृतैः स्वयं द्रव्यैः समित्कुशमृदादिभिः । फलैः पुष्पैस्तथा पत्रैस्तुलस्याः स्वच्छवारिभिः ॥१२॥ पूजयत्प्रयतो भूत्वा भक्तिप्रसरसंप्लुतः । स चैकदा महाभागः स्नात्वा प्रातः समाहितः ॥१३॥ चक्रनद्यां जपंस्तस्थौ मुहूर्तत्रयमंबुनि । अथाजगाम तत्तीरं जलं पातुं विपासिता ॥१४॥ आसन्नप्रसवा भ्रान्त्वैकैव हरिणी वनात् । ततः समभवत्तत्र पीतप्राये जले तया ॥१५॥ सिंहस्य नादः सुमहान् सर्वप्राणिभयंकरः । ततः सा सिंहसन्नादादुत्प्लुता निम्नगातटम् ॥१६॥ अत्युच्चारोहणेनास्या नद्यां गर्भः पपात ह । तमुह्यमानं वेगेन वीचिमालापरिलुतम् ॥१७॥ जग्राह भरतो गर्भोत्पतितं मृगपोतकम् । गर्भप्रच्युतिदुःखेन प्रोत्तुङ्गाक्रमणेन च ॥१८॥ मुनीन्द्र सा तु हरिणी निपपात ममार च । हरिणीं तां विलोक्याथ विपन्नां नृपतापसः ॥१६॥ मृगपोतं समागृह्य स्वमाश्रममुपागतः । चकारानुदिनं चासौ मृगपोतस्य वै नृपः ॥२०॥


से यह देश भारतखण्ड कहलाता है ॥५॥ उस राजा ने कुल-परम्परा से राज्य को प्राप्त कर धर्मपूर्वक अपने पूर्वजों की भांति प्रजा का पालन किया और प्रजा को सन्तुष्ट रखा ॥६॥ अपने शासन-काल में उसने विविध यज्ञों से इन्द्रियातीत भगवान् विष्णु की पूजा की। सर्वदा सब देवों के आत्मा भगवान् का ध्यान करते हुए उसने भिन्न कर्मों को किया ॥७॥ तदनन्तर वह पुत्रों को उत्पन्न कर विषयों से विरक्त हो अपने राज्य को त्याग कर वह विद्वान् पुलस्त्य और पुलह ऋषि के आश्रम में गया ॥८॥ वहाँ शालग्राम नामक एक महाक्षेत्र था जहाँ अन्य मुमुक्षुजन भी योग-साधना किया करते थे। मुने ! वहाँ तपस्वी बन कर यथा प्राप्त सामग्री से भक्ति-पूर्वक उसने विष्णु की आराधना प्रारम्भ की ॥९॥ नारद ! नित्यप्रति वह जल में डुबकी लगाकर स्नान करता तथा भक्ति- पूर्वक ब्रह्म नाम का उच्चारण करता हुआ सूर्योपस्थान करता था ॥१०॥ इसके अनन्तर आश्रम में आकर स्वयं लाई हुई समिधा, कुश, मृत्तिका, फल, पुष्प, तुलसी पत्र और स्वच्छ जल से भक्ति-भावना में तन्मय होकर एकाग्र भाव से जगत्पति वासुदेव की पूजा करता था ॥११-१२॥ एक दिन जब उस महाभाग ने प्रातःकाल चक्र नदी के जल में स्नान किया और उस जल में ही एकनिष्ठ होकर तीन मुहूर्त तक भगवान् का जप किया ॥१३॥ उसी समय उस नदी के तट पर एक प्यासी हुई आसन्नप्रसवा हरिणी वन से आई । जब वह जल पी चुकी तो उसी समय सब प्राणियों को डराने वाला सिंहनाद सुनाई पड़ा ॥१४-१५॥ सिंह की गर्जना सुनकर वह नदी तट उसके पार जाने के लिए उछली। अधिक ऊँचाई से कूदने के कारण उसका गर्भ नदी में ही गिर पड़ा ॥१६॥ गर्भ से गिरा हुआ वह मृगशावक नदी की धारा में पड़कर वेग से बह चला। मुनि भरत ने उसको उठा लिया ॥१७॥ मुनीन्द्र ! गर्भपात की पीड़ा और ऊँचो भूमि पर छलांग मारने के कारण वह हरिणी गिर पड़ी और मर गई ॥१८॥ नृप तपस्वी वह भरत हरिणी को इस प्रकार मरते देखकर उस मृगशावक को लेकर आश्रम में चला आया ॥१९॥ वह राजा प्रति दिन उस मृग की देखभाल करता था। मुने ! इस प्रकार राजा द्वारा

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३१६ पोषणं पुष्यमाणश्च स तेन ववृधे मुने । चचाराश्रमपर्यन्तं तृणानि गहनेषु सः ॥२०॥ दूरं गत्वा च शार्दूलत्रासाद्भयाद्ययौ पुनः । प्रातर्गत्वातिदूरं च सायमायात्याश्रमम् ॥२१॥ पुनश्च भरतस्याभूदाश्रमस्योटजांतरे । तस्य तस्मिन्मृगे दूरसमीपपरिवर्तिनि ॥२२॥ आसीच्चेतः समासक्तं न तथा ह्यच्युते मुने । विमुक्तराज्यतनयः प्रोज्झिताशेषबांधवः ॥२४॥ ममत्वं स चकारोच्चैस्तस्मिन्हरिणपोतके । किं वृकैर्भक्षितो व्याघ्रैः किं सिंहेन निपातितः ॥२५॥ चिरायमाणे निष्क्रांते तस्यासीदिति मानसम् । प्रीतिप्रसन्नवदनः पार्श्वस्थे चाभवन्मृगे ॥२६॥ समाधिभंगस्तस्यासीन्ममत्वाकृष्टचेतसः । कालेन गच्छता सोऽथ कालं चक्रे महीपतिः ॥२७॥ पितेव साश्रं पुत्रेण मृगपोतेन वीक्षितः । मृगमेव तदाद्राक्षीत्त्यजत्प्राणानसावपि ॥२८॥ मृगो बभूव स मुने तादृशीं भावनां गतः । जातिस्मरत्वादुद्विग्नः संसारस्य द्विजोत्तम ॥२९॥ विहाय मातरं भूयः शालग्राममुपाययौ । शुष्कैस्तृणैस्तथा पर्णैः स कुर्वन्नात्मपोषणम् ॥३०॥ मृगत्वहेतुभूतस्य कर्मणो निष्कृतिं ययौ । तत्र चोत्सृष्टदेहोऽसौ जज्ञे जातिस्मरो द्विजः ॥३१॥ सदाचारवतां शुद्धे योगिनां प्रवरे कुले । सर्वविज्ञानसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥३२॥ अपश्यत्स मुनिश्रेष्ठः स्वात्मानं प्रकृतेः परम् । आत्मनोऽधिगतज्ञानाद्देवादीनि महामुने ॥३३॥ सर्वभूतान्यभेदेन ददर्श स महामतिः । न पपाठ गुरुप्रोक्तं कृतोपनयनः श्रुतम् ॥३४॥


पालन-पोषण प्राप्त कर वह मृग बढ़ने लगा ॥२० १/२॥ धीरे-धीरे वह आश्रम में इधर-उधर घूमने लगा और घास चरने लगा । जब कभी वह गहन वन में दूर जाता था तब सिंह के भय से फिर लौट आता था ॥२१ १/२॥ प्रातः- काल जंगल में बहुत दूर चरने के लिए चला जाता था, परन्तु सायंकाल आश्रम में लौट आता था और मुनि भरत की कुटिया में विश्राम करता था ॥२२ १/२॥ मुनिवर ! उस मुनि का उस मृग के प्रति चाहे वह समीप रहता था या दूर इतनी अधिक आसक्ति हो गई कि भगवान् की ओर भी इतनी आसक्ति न रही ॥२३ १/२॥ राज्य, पुत्र और सब बन्धु-बान्धवों को छोड़ने वाले उस मुनि की उस हरिण के प्रति अत्यधिक ममता हो गई ॥२४ १/२॥ उसके बाहर जाने पर यदि लौटने में विलम्ब होता था तो मुनि के मन में चिन्ता होती थी कि कहीं मृग को भेड़िये ने तो नहीं मार डाला, बाघ ने कहीं अपना आहार तो नहीं बना डाला अथवा सिंह ने उसको अपना भक्ष्य तो नहीं बना डाला । मृग जब उसकी बगल में बैठा रहता तब तो वह प्रसन्न मुख रहता था ॥२५-२६॥ मृग की ममता से खिंच जाने पर मुनि की समाधि भी भग्न हो जाती थी । धीरे-धीरे समय बीतता गया और उस महीपति का अन्तिम समय आ गया ॥२७॥ मृत्यु के समय जिस प्रकार पुत्र पिता को आंसुओं से युक्त होकर देखता है उसी प्रकार उस मृग-पोत ने मुनि को देखा । मुनि ने भी ममतावश मृत्यु के समय भी मृग को ही देखा ॥२८॥ मुने ! वैसी मृगमय भावना होने के कारण वह जन्मान्तर में मृग ही हुआ । द्विजोत्तम ! उस योनि में भी पूर्व जन्म का ज्ञान होने के कारण वह संसार से उद्विग्न रहता था ॥२९॥ अन्त में वह अपनी माता को छोड़कर शालग्राम के समीप रहने लगा और सूखी पत्तियों और घास को खाकर जीवन बिताने लगा ॥३०॥ इस प्रकार उसके मृग- योनि के कारणीभूत कर्मों का भोग द्वारा नाश हो गया । उस मृग शरीर को छोड़ने के बाद वह जन्मान्तर में सदाचारी और शुद्ध योगी कुल में जातिस्मर (पूर्व जन्म का ज्ञान रखने वाला) ब्राह्मण हुआ ॥३१ १/२॥ वह सब शास्त्रों का मर्मज्ञ, सर्वविज्ञानविद् मुनि श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने को प्रकृति (संसार) से परे समझता था ॥३२ १/२॥ महामुने ! वह अध्यात्म ज्ञान के कारण देवता और सब प्राणियों में समान भाव रखता था ॥३३ १/२॥ यज्ञोपवीत होने पर जब गुरुजी उसको शास्त्र पढ़ाते थे तब भी उस पाठ को नहीं पढ़ता था । उसने न तो किसी कर्म का अनुष्ठान ही किया और न तो शास्त्रों का अध्ययन ही ॥३४ १/२॥ बहुत कुछ कहने पर जड़ की भाँति कुछ बोल

३२० नारदीयपुराणम्

न ददर्श च कर्माणि शास्त्राणि जगृहे न च । उक्तोऽपि बहुशः किञ्चिज्जडं वाक्यमभाषत ॥३५॥ तदप्यसंस्कारगुणं ग्राम्यभावोक्तिसंवृतम् । अपध्वस्तवपुः सोऽपि मलिनाम्बरधृङ् मुने ॥३६॥ विलग्नदंतांतरः सर्वैः परिभूतः स नागरैः । संमानेन परां हानि योगर्द्धेः कुरुते यतः ॥३७॥ जनेनावमतो योगी योगसिद्धिं च विंदति । तस्माच्चरेत वै योगी सतां धर्ममदूषयन् ॥३८॥ जना यथावमन्येयुर्गच्छेयुर्नैव संगतिम् । हिरण्यगर्भबचनं विचितयेत्थं महामतिः ॥३९॥ आत्मानं दर्शयामास जडोन्मत्ताकृतिं जने । भुंक्ते कुलमाषवटकान् शाकं वन्यफलं कणान् ॥४०॥ यद्यदाप्नोति स बह्नत्ति वै कालसंभवम् । पितर्युपरते सोऽथ भ्रातृभ्रातृव्यबांधवैः ॥४१॥ कारितः क्षेत्रकर्मादि कदन्नाहारपोधितः । सरूक्षपीनावयवो जडकारी च कर्मणि ॥४२॥ सर्वलोकोपकरणं बभूवाहारवेतनः । तं तादृशमसंस्कारं विप्रानुकृतिविचेष्टितम् ॥४३॥ क्षत्ता सौवीरराजस्य विष्टियोग्यममन्यत । स राजा शिविकारूढो गंतुं कृतमतिर्द्विज ॥४४॥ बभूवेक्षुमतीतीरे कपिलेश्वेराश्रमम् । श्रेयः किमत्र संसारे दुःखप्राये नृणामिति ॥४५॥ प्रष्टुं तं मोक्षधर्मज्ञं कपिलाख्यं महामुनिम् । उवाह शिविकामस्य क्षत्तृर्वचनचोदितः ॥४६॥ नृणां विष्टिगृहीतानामन्येषां सोऽपि मध्यमः । गृहीतो विष्टिना विप्र सर्वज्ञानैकभाजनम् ॥४७॥ जातिस्मरोऽसौ पापस्य क्षयकाम उवाह ताम् । ययौ जडप्रतिस्तत्र युगमात्रावलोकनम् ॥४८॥ कुर्वन्मतिमतां श्रेष्ठस्ते त्वन्ये त्वरितं ययुः । विलोक्य नृपतिः सोऽथ विषमं शिविकागतम् ॥४६॥


देता था सो भी शुद्ध वाक्य नहीं; प्रत्युत ग्रामीणों की भाँति ग्राम्य भाषा का ही प्रयोग करता था । मुने ! वह सदा मैले-कुचैले कपड़े पहन कर लँगड़े-लूले की भाँति बना रहता था ॥३५-३६॥ नागरिक प्रायः उसका अपमान करते थे । यहाँ तक कि मारकर लोगों ने उसके दाँत तोड़ दिये । चूंकि सम्मान से योग सिद्धि में बाधा पड़ती है और लोक से अपमानित योगी सिद्धि प्राप्त करता है। अतएव योगी सज्जनों द्वारा आदृत धर्म की रक्षा करता हुआ आचरण करे ॥३७-३८॥ लोग जितना ही अधिक उसका अपमान करेंगे और उसकी संगति से बचेंगे उतना ही उसका कल्याण होगा । महामति वह योगी भरत ब्रह्मा के इस आदेश का चिन्तन कर लोक में अपने को मूर्ख जड़ की भाँति रखता था ॥३९॥ स्वयं उड़द की रोटी, शाक और जंगली फलों और मोटे अन्न को खाता था। जो कुछ भोजन के समय मिल जाता था उसी को बहुत मानकर खा लेता था । पिता के मर जाने पर उसके भाई- बन्धुओं ने कदन्न खिला-खिलाकर उससे खेती का काम भली-भाँति कराया। रूखे और पुष्ट अंगों वाले बेचारे भरत से, जिसको इच्छा होती थी वही केवल भोजन मात्र देकर अपना काम कराता था ॥४०-४२॥ एक दिन सौवीरराज के सारथि ने उस विप्र के समान आकृति और चेष्टा करने वाले मैले-कुचैले भरत को डोली ढोने (कहार) के योग्य समझा । द्विज ! उस राजा ने सोचा कि डोली पर चढ़कर इक्षुमती के तीर पर कपिल मुनि के श्रेष्ठ आश्रम में चलना चाहिए। इस दुःखमय संसार में मनुष्य का कल्याण कैसे हो सकता है, इसी प्रश्न को पूछने के लिए महामुनि कपिल के पास जाना चाहता था । सारथि की आज्ञा के अनुसार वह ब्राह्मण डोली ढोने लगा ॥४३-४६॥ विना मजदूरी के काम करने वाले कहारों के साथ वह सर्वज्ञ ब्राह्मण भी पकड़ा गया। पूर्व जन्म का ज्ञानी वह ब्राह्मण अपने पापों के क्षय के लिए उस कर्म को उचित समझकर पालकी ढोने लगा । बुद्धिमानों में श्रेष्ठ वह ब्राह्मण पालकी के डंडे तक आगे की भूमि देखता हुआ मन्द गति से चलता था । अन्य लोग तेजी से चल रहे थे ॥४७-४८॥ पालकी की चाल में कुछ विषमता देखकर राजा ने कहा--यह क्या, ऐ कहारो, सीधी चाल से चलो। फिर पालकी की गति में वैसी ही विषमता

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३२१ किमेतदित्याह समं गम्यतां शिबिकावहाः । पुनस्तथैव शिबिकां विलोक्य विषमां हसन् ॥५०॥ नृपः किमेतदित्याह भवद्भिर्गम्यतेऽन्यथा । भूपतेर्वदतस्तस्य श्रुत्वेत्थं बहुशो वचः । शिबिकावाहकाः प्रोचुरयं यातीत्यसत्वरम् ॥५१॥ राजोवाच किं श्रांतोऽस्यल्पमध्वानं त्वयोढा शिबिका मम । किमायासासहो न त्वं पीवा नासि निरीक्ष्यसे ॥५२॥ ब्राह्मण उवाच नाहं पीवा न चैवोढा शिबिका भवतो मया । न श्रांतोऽस्मि न चायासो वोढान्योऽस्ति महीपते ॥५३॥ राजोवाच प्रत्यक्षं दृश्यते पीवा त्वद्यपि शिबिका त्वयि । श्रमश्च भारोद्वहने भवत्येव हि देहिनाम् ॥५४॥ ब्राह्मण उवाच प्रत्यक्षं भवता भूप यद्दृष्टं मम तद्वद । बलवानबलश्चेति वाच्यं पश्चाद्विशेषणम् ॥५५॥ त्वयोढा शिबिका चेति त्वय्यद्यापि च संस्थिता । मिथ्या तदप्यत्र भवान् शृणोतु वचनं मम ॥५६॥ भूमौ पादयुगे चाथ जंघे पादद्वये स्थिते । ऊरू जंघाद्वयावस्थौ तदाधारं तथोदरम् ॥५७॥ वक्षःस्थलं तथा बाहू स्कंधौ चोदरसंस्थितौ । स्कंधाश्रितेयं शिबिका ममाधारोऽत्र किंकृतः ॥५८॥ शिबिकायां स्थितं चेदं देहं त्वदुपलक्षितम् । तत्र त्वमहमप्येतद्युच्यते चेदमन्यथा ॥५९॥

देखकर राजा हँसता हुआ बोला--क्यों, क्या बात है ? तुम लोग क्यों समगति से नहीं चलते ? राजा के बार- बार वैसा कहने पर जड़ भरत की ओर संकेत करके कहारों ने कहा--यह धीरे-धीरे चलता है ॥४६-५१॥ राजा बोला--क्यों थक गए हो क्या ? अरे ! अभी तो थोड़ी ही दूर पालकी आई है ? क्या तुम परिश्रम से थक जाते हो ? देखने में तो मोटे दिखाई दे रहे हो ?॥५२॥ ब्राह्मण बोला-न तो मैं मोटा हूँ और न मैंने तुम्हारी पालकी ढोई, न थका हुआ हूँ और न मुझे कोई खेद ही है । महीपते ! पालकी को ढोने वाला तो कोई दूसरा ही है ॥५३॥ राजा ने कहा- स्पष्टतः तुम मोटे दिखाई देते हो, पालकी भी अब तक तुम्हारे कन्धे पर पड़ी हुई है और बोझा ढोने में प्राणी को श्रम होता ही है ॥५४॥ ब्राह्मण बोला-भूप, तुमने जो कुछ प्रत्यक्ष देखा है वह कहो, पीछे बली और दुर्बल विशेषण लगाना ॥५५॥ तुमने जो अभी कहा कि मैंने पालकी ढोई है और अब तक पालकी मेरे कन्धे पर है, यह सब मिथ्या है। कैसे ? इसके लिए भी मेरी बातें सुनो ॥५६॥ ये दोनों पैर भूमि पर हैं, दोनों जंघे पैर पर स्थित हैं, कटि और नितम्ब जंघे पर अवलम्बित हैं, कटि भी उदर का आधार है, उदर छाती का, दोनों भुजायें और कन्धे उदर के ही सहारे पर हैं । शिविका कन्धे पर है, तो इसमें मैं किसका आधार हूँ ? ॥५७-५८॥ पालकी में स्थित तुम्हारा शरीर है ऐसा जो समझते हो यह भी भ्रम ही है । उस पालकी में तुम हो, मैं हूँ, यह कहना भी अनुपयुक्त है । पार्थिव ! मैं, तुम आदि का जो व्यवहार यहाँ किया जा रहा है वह भी मिथ्या ही है । पार्थिव ! मैं, तुम और ४१-ना० पु०

३२२ नारदीयपुराणम् अहं त्वं च तथान्ये च भूतैरुह्याश्च पार्थिव। गुणप्रवाहपतितो भूतवर्गोऽपि यात्ययम् ॥६०॥ कर्मवश्या गुणाश्चैते सत्त्वाद्याः पृथिवीपते। अविद्यासंचितं कर्म तच्चाशेषेषु जंतुषु ॥६१॥ आत्मा शुद्धोऽक्षरः शांतो निर्गुणः प्रकृते परः। प्रवृद्ध्यपचयौ न स्त एकस्याखिलजन्तुषु ॥६२॥ यदा नोपचयस्तस्य नचैवापचयो नृप। तदापि बालिशोऽसि त्वं कया युक्त्या त्वयेरितम् ॥६३॥ भूपादजंघाकट्यूरुजठरादिषु संस्थिता। शिविकेयं यदा स्कंधे तदा भारः समस्त्वया ॥६४॥ तथान्यजंतुभिर्भूप शिविकोढा न केवलम्। शैलद्रुमगृहोत्थोऽपि पृथिवीसंभवोऽपि च ॥६५॥ यथा पुंसः पृथग्भावः प्राकृतैः करणैर्नृप। सोढव्यः सुमहान्भारः कतमो नृप ते मया ॥६६॥ यद्द्रव्यो शिबिका चेयं तद्द्रव्यो भूतसंग्रहः। भवतो मेऽखिलस्यास्य समत्वेनोपबृंहितः ॥६७॥ सनंदन उवाच एवमुक्त्वाऽभवन्मौनी स वहञ्शिबिकां द्विजः। सोऽपि राजाऽवतीर्योर्व्यां तत्पादौ जगृहे त्वरन् ॥६८॥ राजोवाच भो भो विसृज्य शिबिकां प्रसादं कुरु मे द्विज। कथ्यतां को भवानत्र जालरूपधरः स्थितः ॥६९॥ यो भवान्यदपत्यं वा यदागमनकारणम्। तत्सर्वं कथ्यतां विद्वन्मह्यं शुश्रूषवे त्वया ॥७०॥ ब्राह्मण उवाच श्रूयतां कोऽहमित्येतद्वक्तुं भूप न शक्यते। उपयोगनिमित्तं च सर्वत्रागमनक्रिया ॥७१॥ सुखदुःखोपभोगौ तु तौ देहाद्युपपादकौ। धर्माधर्मोद्भवौ भोक्तुं जंतुर्देहादिमृच्छति ॥७२॥ दूसरे सभी प्राणी सभी भूतों (पंच महाभूतों) द्वारा ढोये जाते हैं। पृथिवीपते ! यह भूत-समूह भी गुण-प्रवाह के वश में होकर कार्यसंचालन करता है ॥५६-६०॥ सत्त्व आदि गुण-प्रवाह भी कर्म के वश में रहते हैं। अविद्या-संचित कर्म अशेष जन्तुओं में रहता है ॥६१॥ आत्मा शुद्ध, अक्षर, शान्त, निर्गुण और प्रकृति से परे है। वह एक ही सम्पूर्ण जीवों में व्याप्त है। उसकी वृद्धि अथवा ह्रास कभी नहीं होता ॥६२॥ नृप ! जब उस आत्मा में ह्रास और वृद्धि नहीं होती, तब तुमने किस युक्ति से ऐसा कहा है कि तुम मोटे हो ॥६३॥ यदि क्रमशः पृथ्वी, पैर, जंघा, ऊरु, कटि तथा उदर आदि अंगों पर स्थित हुए कंधे के ऊपर रखी हुई यह शिविका मेरे लिए भार रूप हो सकती है तो उसी प्रकार तुम्हारे लिए भी तो हो सकती है ॥६४॥ राजन् ! इस युक्ति से तो अन्य समस्त जीवों ने भी न केवल पालकी उठा रखी है, बल्कि सम्पूर्ण पर्वत, वृक्ष, गृह और पृथ्वी आदि का भार भी अपने ऊपर ले रखा है। राजन् ! जिस द्रव्य से यह पालकी बनी हुई है, उसी से यह तुम्हारा, मेरा अथवा अन्य सबका शरीर भी बना है, जिसमें सबने ममता बढ़ा रखी है ॥६५-६७॥ सनन्दन बोले-यह कह कर वह ब्राह्मण मौन हो गया और शिविका को पूर्व की भाँति ढोने लगा। उस राजा ने भी पृथ्वी पर उतर कर शीघ्र ही उस ब्राह्मण के पैर पकड़ लिये ॥६८॥ राजा ने कहा-हे द्विज ! पालकी को छोड़ दीजिए और मेरे ऊपर कृपा कीजिए। कहिए आप कौन हैं जो इस कपट वेश में छिपे हुए हैं ॥६९॥ आप कौन हैं आपके पिता का नाम क्या है, आप किसलिए इधर-उधर घूम रहे हैं ? विद्वन् ! आप इन सब बातों का उत्तर मुझ सेवक को दीजिए ॥७०॥ ब्राह्मण बोला--भूप ! सुनो। मैं कौन हूँ, यह कह नहीं सकता। सर्वत्र सबका आगमन किसी प्रयोजन से ही होता है ॥७१॥ सुख-दुःख का उपभोग ही शरीर धारण करने का कारण है। जीव धर्म और अधर्म के

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३२३ सर्वस्यैव हि भूपाल जंतोः सर्वत्र कारणम् । धर्माधर्मौ यतस्तस्मात्कारणं पृच्छ्यते कुतः ॥७३॥ राजोवाच धर्माधर्मौ न संदेहः सर्वकार्येषु कारणम् । उपभोगनिमित्तं च देहाद्देहांतरागमः ॥७४॥ यत्त्वेतद्भवता प्रोक्तं कोऽहमित्येतदात्मनः । वस्तुं न शक्यते श्रोतुं तन्ममेच्छा प्रवर्तते ॥७५॥ योऽस्ति योऽहमिति ब्रह्मन्कथं वक्तुं न शक्यते । आत्मन्येव न दोषाय शब्दोऽहमिति यो द्विज ॥७६॥ ब्राह्मण उवाच शब्दोऽहमिति दोषाय नात्मन्येवं तथैव तत् । अनात्मन्यात्मविज्ञानं शब्दो वा श्रुतिलक्षणः ॥७७॥ जिह्वा ब्रवीत्यहमिति दंतौष्ठतालुकं नृप । एतेनाहं यतः सर्वे वाङ्निष्पादनहेतवः ॥७८॥ किं हेतुभिर्वदत्येषा वागेवाहमिति स्वयम् । तथापि वागहमेतद्वक्तुमित्थं न युज्यते ॥७६॥ पिंडः पृथग्यतः पुंसः शिरः पाण्यादिलक्षणः । ततोऽहमिति कुर्वैनां संज्ञां राजन्करोम्यहम् ॥८०॥ यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि मत्तः पार्थिवसत्तम । न देहोऽहमयं चान्ये वक्तुमेवमपीष्यते ॥८१॥ यदा समस्तदेहेषु पुमानेको व्यवस्थितः । तदा हि को भवान्कोऽहमित्येतद्विफलं वचः ॥८२॥ त्वं राजा शिविका चेयं वयं वाहाः पुरःसराः । अयं च भवतो लोको न सदेतन्नृपोच्यते ॥८३॥ वृक्षाद्दारु ततश्चेयं शिविका त्वदधिष्ठिता । क्व वृक्षसंज्ञा वै तस्या दारुसंज्ञाथवा नृप ॥८४॥ वृक्षारूढो महाराजो नायं वदति ते जनः । न च दारुणि सर्वस्त्वां ब्रवीति शिविकागतम् ॥८५॥ उत्पन्न सुख-दुःख के भोग के लिए शरीर प्राप्त करता है ॥७२॥ भूपाल ! सब जन्तुओं की उत्पत्ति के कारण धर्म और अधर्म ही हैं। तो फिर कारण क्यों पूछ रहे हो ? ॥७३॥ राजा बोला—निस्सन्देह धर्म और अधर्म सब कार्यों के कारण हैं और केवल उपभोग ही जन्मान्तर प्राप्त करने का कारण है ॥७४॥ आपने अभी जो यह कहा है कि 'मैं कौन हूँ यह नहीं कह सकता' सो इसको सुनने की इच्छा प्रबल रूप से हो रही है ॥७५॥ ब्रह्मन् ! जो आपका परिचय है, उसको कहने में आप क्यों नहीं समर्थ हो रहे हैं ? द्विज ! अपने विषय में मैं ऐसा हूँ, यह कहने से कुछ दोष नहीं होता ॥७६॥ ब्राह्मण बोला—अहम् (मैं) शब्द का प्रयोग आत्मा के विषय में करने से कुछ दोष नहीं, परन्तु अनात्मा में आत्मविज्ञान हो जाने के कारण अमात्मक ज्ञान हो जाने से 'मैं' शब्द का प्रयोग भ्रान्ति है। नृप ! जीभ 'मैं' ऐसा कहती है, परन्तु दाँत, ओठ और तालु सब शब्दोच्चारण में सहायक हैं। तो क्या वाणी अपने को 'मैं' ऐसा कहती है ? तथापि मैं वाणी हूँ, यह कहना सर्वथा अनुचित है ॥७७-७९॥ इसके अतिरिक्त 'अहम्' ऐसा कहना सर्वथा अनु- चित है, क्योंकि शिर, हाथ आदि से युक्त शरीर-पिंड से मनुष्य का आत्मा सर्वथा पृथक है, राजन् ! तो मैं 'मैं' शब्द का प्रयोग किसके लिए करू । यदि मुझसे अतिरिक्त कोई और भी सजातीय आत्मा हो तो भी 'यह मैं हूँ और यह अन्य है'—ऐसा कहना उचित हो सकता था। जब समस्त शरीर में एक ही पुरुष विराजमान है तब आप कौन हैं, मैं कौन हूँ, इस विषय में कुछ कहना व्यर्थ होगा ॥८०-८२॥ तुम राजा हो, यह पालकी है, हम सभी इसके ढोने वाले हैं, यह राज्य आपका है, ये सब बातें सत्य नहीं कही जा सकती हैं ॥८३॥ वृक्ष से लकड़ी आई, उसकी पालकी बनी जिस पर तुम बैठे हो। नृप ! तुम्हीं बताओ कि इसका नाम वृक्ष रखना ठीक होगा या लकड़ी ॥८४॥ महाराज वृक्ष पर बैठे हैं ऐसा तुम्हारे सेवक नहीं कहते हैं और न तो शिविका में बैठने के कारण तुमको लकड़ी पर बैठा हुआ ही कहा जाता है। शिविका दारु का समूह है और अपने लिए एक विशेष नाम का

३२४ नारदीयपुराणम् शिबिकादारुसंघातो स्वनामस्थितिसंस्थितः । अन्विष्यतां नृपश्रेष्ठानन्ददा शिविका त्वया ॥८६॥ एवं छत्रं शलाकाभ्यः पृथग्भावो विमृश्यताम् । क्व जातं छत्रमित्येष न्यायस्त्वयि तथा मयि ॥८७॥ पुमान्स्त्री गौरजा वाजी कुंजरो विहगस्तरुः । देहेषु लोकसंज्ञेयं विज्ञेया कर्महेतुषु ॥८८॥ पुमान्न देवो न नरो न पशुर्न च पादपः । शरीराकृतिभेदास्तु भूपते कर्मयोनयः ॥८९॥ वस्तु राजेति यल्लोके यच्च राजभटात्मकम् । तथान्यच्च नृपेत्थं तन्न सत्यं कल्पनामयम् ॥९०॥ यस्तु कालांतरेणापि नाशसंज्ञामुपैति वै । परिणामादिसंभूतं तद्वस्तु नृप तच्च किम् ॥९१॥ त्वं राजा सर्वलोकस्य पितुः पुत्रो रिपो रिपुः । पत्न्याः पतिः पिता सूनोः कस्त्वं भूप वदाम्यहम् ॥९२॥ त्वं किमेतच्छिरः किं नु शिरस्तव तथोदरम् । किमु पादादिकं त्वेतन्नैवं किं ते महीपते ॥९३॥ समस्तावयवेभ्यस्त्वं पृथग्भूतो व्यवस्थितः । कोऽहमित्यत्र निपुणं भूत्वा चिंतय पार्थिव ॥९४॥ एवं व्यवस्थिते तत्त्वे मयाहमिति भावितुम् । पृथक्चरणनिष्पाद्यं शक्यं तु नृपते कथम् ॥९५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वि० पा० अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४८॥ आश्रय लेकर स्थित है। नृपश्रेष्ठ ! इसलिए तुम दारु-समूह से अलग आनन्ददायक पालकी ढूँढ़ो। इसी प्रकार शलाकादि से पृथक् छत्र भी ढूँढ़ो। छत्र कहाँ गया, यह प्रश्न तुम्हारे और मेरे लिए भी समान है ॥८५-८७॥ पुरुष, स्त्री, गौ, बकरी, अश्व, हाथी, पक्षी और वृक्ष आदि संज्ञायें कर्म के द्वारा प्राप्त शरीर की ही हैं ॥८८॥ भूप ! वस्तुतः पुरुष, मनुष्य, पशु और वृक्ष आदि संज्ञायें केवल शरीर और आकृति के भेद के कारण हैं, जो कि कर्म के कारण है ॥८९॥ इस लोक में राजा, राजसेवक तथा अन्य जो संज्ञायें हैं ये सब केवल कल्पना ही हैं सत्य नहीं ॥९०॥ जो कालान्तर में नष्ट हो जाते और पुनः नवीन संज्ञा (नाम) प्राप्त करते हैं। नृप ! परिणाम आदि के कारण नयी संज्ञा नहीं प्राप्त करती वही परमार्थ वस्तु है। वह क्या है इसको तो देखो । तुम अखिल लोक के राजा हो, किसी पिता के पुत्र हो, किसी शत्रु के शत्रु हो, किसी पत्नी के पति और किसी पुत्र के पिता हो, अब तुम को बता रहा हूँ कि तुम कौन हो। तुम क्या यह शिर हो ? नहीं, शिर तो तुम्हारा है और उदर भी तुम्हारा ही है। महीपते ! क्या ये पैर, हाथ आदि तुम्हारे नहीं हैं ? वस्तुतः तुम इन समस्त शरीरावयवों से पृथक् स्थित हो। पार्थिव ! तुम कौन हो, इस विषय को सावधान हो कर विचारो। इस प्रकार रहस्यमय होने के कारण 'मैं कौन हूँ' इस विषय में मैं 'चरण आदि शरीर अवयवों से पृथक हूँ' ऐसा कहना कैसे सरल कहा जा सकता है ॥९१-९५॥ श्रीनारदीय महापुराण के पूर्वार्द्ध में अड़तालीसवां अध्याय समाप्त ॥४८॥

अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच निशम्य तस्येति वचः परमार्थसमन्वितम् । प्रश्रयावनतो भूत्वा तमाह नृपतिर्द्विजम् ॥१॥ राजोवाच भगवंस्त्वत्तया प्रोक्तं परमार्थमयं वचः । श्रुते तस्मिन्भ्रमंतीव मनसो मम वृत्तयः ॥२॥ एतद्विवेकविज्ञानं यदि शेषेषु जंतुषु । भवता दर्शितं विप्र तत्परं प्रकृतेर्महत् ॥३॥ नाहं वहामि शिविकां शिविका मयि न स्थिता । शरीरमन्यदस्मत्तो येनेयं शिविका धृता ॥४॥ गुणप्रवृत्तिर्भूतानां प्रवृत्तिः कर्मचोदिता । प्रवर्तंते गुणाश्चैते किं ममेति त्वयोदितम् ॥५॥ एतस्मिन्परमार्थज्ञ मम श्रोत्रपथं गते । मनो विह्वलतामेति परमार्थरतां गतम् ॥६॥ पूर्वमेव महाभाग कपिलर्षिमहं द्विज । प्रष्टुमभ्युद्यतो गत्वा श्रेयः किंत्वत्र संशये ॥७॥ तदंतरे च भवता यदिदं वाक्यमीरितम् । तेनैव परमार्थं त्वयि चेतः प्रधावति ॥८॥ कपिलर्षिर्भगवतः सर्वभूतस्य वै किल । विष्णोरंशो जगन्मोहनाशाय समुपागतः ॥९॥ स एव भगवान्नूनमस्माकं हितकाम्यया । प्रत्यक्षतामनुगतस्तथैतद्भवतोच्यते ॥१०॥ तन्मह्यं मोहनाशाय यच्छ्रेयः परमं द्विज । तद्वदाखिलविज्ञानजलवीच्युदधिर्भवान् ॥११॥ अध्याय ४६ परमार्थ का निरूपण सनंदन बोले--भरत की उपर्युक्त परमार्थ तत्त्व से भरी हुई व्याख्या को सुनकर राजा ने नम्र होकर पुनः उनसे पूछा ॥१॥ राजा ने कहा--भगवन्, आपने जो कुछ परम तत्त्व की बात कही उसको सुनकर मेरे मन की वृत्तियाँ अभी भ्रम में पड़ी हुई सी हैं ॥२॥ इस प्रकार का विवेक-विज्ञान यदि शेष जन्तुओं के विषय में हो जाय तब तो यह प्रकृति से परे का ज्ञान है ॥३॥ मैं पालकी नहीं ढोता, न तो वह मुझ पर अवस्थित है । शरीर हमसे पृथक् है, जिसने इस पालकी को धारण किया है । भूतों की प्रवृत्ति गुणों की प्रेरणा है और गुण कर्म से प्रेरित होकर प्रवृत्त होते हैं । इसलिए मेरा कर्तव्य क्या है, यह आपने कहा है । परमार्थज्ञ ! इस गूढ़ तत्त्व के सुन लेने से परमार्थ के ज्ञान के पूर्व से ही उत्सुक मेरा मन इस समय और अधिक विह्वल हो रहा है ॥४-६॥ द्विज ! मैं पहले ही संशय में पड़कर श्रेयस्कर तत्त्व को पूछने के लिए कपिल ऋषि के यहाँ जा रहा था । इसी बीच आपने ऐसी रहस्यमय बातें सुनाईं । इस कारण अब आपसे ही परमार्थ तत्त्व को जानने की इच्छा से मेरा मन आप ही की ओर उन्मुख हो रहा है ॥७-८॥ कपिल ऋषि अखिल प्राणियों के ईश विष्णु के अंश हैं, जो जगत् का मोह दूर करने के लिए इस लोक में आए हुए हैं । इसलिए आप ऐसी बातें कहते हैं ॥९-१०॥ द्विज ! इसलिए हमारे मोह नाश के लिए जिस परम श्रेय को आप उचित समझते हों, उसको कहिए । क्योंकि आप सम्पूर्ण विज्ञानरूपी तरंगों से परिपूर्ण समुद्र हैं ॥११॥

३२६ नारदीयपुराणम् ब्राह्मण उवाच भूयः पृच्छसि किं श्रेयः परमार्थेन पृच्छसि । श्रेयांसि परमार्थानि ह्यशेषाण्येव भूपते ॥१२॥ देवताराधनं कृत्वा धनसंपदमिच्छति । पुत्रानिच्छति राज्यं च श्रेयस्तस्यैव तन्नृप ॥१३॥ विवेकिनस्तु संयोगः श्रेयोऽसौ परमात्मना । कर्मयज्ञादिकं श्रेयः स्वलोकफलदायि यत् ॥१४॥ श्रेयः प्रधानं च फले तदेवानभिसंहिते । आत्मा ध्येयः सदा भूप योगयुक्तैस्तथा परैः ॥१५॥ श्रेयस्तस्यैव संयोगः श्रेयो यः परमात्मनः । श्रेयांस्येवमनेकानि शतशोऽथ सहस्रशः ॥१६॥ संत्यत्र परमार्थास्तु न त्वेते श्रूयतां च मे । धर्मोऽर्थं त्यजते किं तु परमार्थो धनं यदि ॥१७॥ व्ययश्च क्रियते कस्मात्कामप्राप्त्युपलक्षणः । पुत्रश्चेत्परमार्थाह्वयः सोऽप्यन्यस्य नरेश्वर ॥१८॥ परमार्थभूतः सोऽन्यस्य परमार्थो हि नो पिता । एवं न परमार्थोऽस्ति जगत्यत्र चराचरे ॥१९॥ परमार्थो हि कार्याणि करणानामशेषतः । राज्यादिप्राप्तिरन्बोक्ता परमार्थतया यदि ॥२०॥ परमार्था भवन्त्यत्र न भवंति च वै ततः । ऋग्यजुः सामनिष्पाद्यं यज्ञकर्म मतं तव ॥२१॥ परमार्थभूतं तत्रापि श्रूयतां वदतो मम । यत्तु निष्पाद्यते कार्यं मृदा कारणभूतया ॥२२॥ तत्कारणानुगमनाज्जायते नृप मृन्मयम् । एवं विनाशिभिर्द्रव्यैः समिदाज्यकुशादिभिः ॥२३॥ निष्पाद्यते क्रिया या तु सा भवित्री विनाशिनी । अनाशी परमार्थस्तु प्राज्ञैरभ्युपगम्यते ॥२४॥ यत्तु नाशि न संदेहो नाशिद्रव्योपपादितम् । तदेवाफलदं कर्म परमार्थो न भेदवान् ॥२५॥ मुक्तिसाधनभूतत्वात्परमार्थो न साधनम् । ध्यानमेवात्मनो भूप परमार्थशब्दिदंतम् ॥२६॥

ब्राह्मण बोला- फिर तुम श्रेय क्या है, इसको पूछ रहे हो, यदि परमार्थतः पूछते हो तब तो हे भूपते ! सम्पूर्ण परमार्थ ही श्रेय हैं। नृप ! देवता की उपासना से धन, सम्पत्ति, पुत्र और राज्य की जो इच्छा करते हैं उनके लिए वही श्रेय है ॥१२-१३॥ ज्ञानी पुरुषों के लिए परमात्मा का संयोग (प्राप्ति) ही श्रेय है । कर्मयज्ञ आदि भी श्रेय ही हैं, क्योंकि वे स्वर्ग लोकरूपी फल को देने वाले हैं ॥१४॥ निकट न रहने वाले परम फल में श्रेय की प्रधानता रहती है । भूपाल ! अन्य योगियों ने आत्मा को ही सदा अपना ध्येय माना है तो परमात्मा का जो संयोग है वही उनका श्रेय है ॥१५॥ इस प्रकार श्रेय के अनेकों (सैकड़ों और सहस्रों) भेद हैं । श्रेय इतने हैं, परन्तु ये परमार्थ श्रेय नहीं हैं। जो परमार्थ है, उसको मुझसे सुनो ॥१६$\frac{१}{२}$॥ यदि धन को परमार्थ माना जाय तो धर्म के लिए उसका त्याग क्यों किया जाता तथा काम प्राप्ति के लिए धन का व्यय क्यों किया जाता है ? तब नरेश्वर ! पुत्र को परमार्थ कैसे माना जाय, क्योंकि वह भी तो दूसरे का परमार्थभूत है । इसी प्रकार पिता भी परमार्थ भूत नहीं है, वह भी अन्य का ही परमार्थ है । इसलिए नरेश्वर ! इस चराचर जगत् में परमार्थ नहीं है ॥१७-१६॥ परमार्थ अशेष कारणों का एकमात्र कार्य है अर्थात् संसार का एकमात्र प्राप्य है। यदि राज्य आदि का पाना परमार्थ माना जाय तो ऋग्-यजुस् और साम द्वारा प्रतिपादित यज्ञादि कर्म परमार्थ की श्रेणी में नहीं आते ॥२०-२१॥ परमार्थ भूत जो तत्त्व है, उसको मैं कह रहा हूँ, सुनो । राजन् ! कारणभूत मिट्टी से जो कार्य (घट) उत्पन्न होता है, वह कारण का अनुगमन करने से मृत्तिका स्वरूप ही समझा जाता है। इसी प्रकार समिधा, कुश आदि विनाशीील कारणों से जो कार्य उत्पन्न होगा वह भी विनश्वर होगा ॥२२-२३$\frac{१}{२}$॥ प्राज्ञ व्यक्ति परमार्थ को अनश्वर मानते हैं। जो क्षणभंगुर पदार्थों से ही बनता है, वह अवश्य ही क्षणभंगुर होता है । तो यह मेरा मत है कि जो किसी प्रकार के फल (प्रत्यक्ष) को न देने वाला कर्म है, वही परमार्थ है। परमार्थ स्वयं मुक्ति का साधनभूत होने के कारण अन्य किसी का साधन नहीं है । भूप ! यदि आत्मा के ध्यान

एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३२७ भेदकारि परेष्वस्तु परमार्थो न भेदवान् । परमात्मनिनोयोगः परमार्थ इतीष्यते ॥२७॥ मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैतद्द्रव्यमयं यतः । तस्माच्छ्रेयांस्यशेषाणि नृपैतानि न संशयः ॥२८॥ परमार्थस्तु भूपाल संक्षेपाच्छ्रूयतां मम । एको व्यापी समः शुद्धो निर्गुणप्रकृतेः परः ॥२९॥ जन्मवृद्ध्यादिरहित आत्मा सर्वगतो नृप । परिज्ञानमयो सद्भिर्नामजात्यादिभिर्विभुः ॥३०॥ न योगवान्न युक्तोऽभून्नैव पार्थिव योक्ष्यति । तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽप्येकयमयं हि तत् ॥३१॥ विज्ञानं परमार्थोऽसौ वेत्ति नोऽतथ्यदर्शनः । वेणुरंध्रविभेदेन भेदः षड्जादिसंज्ञितः ॥३२॥ अभेदो व्यापिनो वायोस्तथा तस्य महात्मनः । एकत्वं रूपभेदश्च बाह्यकर्मप्रवृत्तिजः ॥२३॥ देवादिभेदमध्यास्ते नास्त्येवाचरणो हि सः । शृण्वत्र भूप प्राग्वृत्तं यद्गीतमृभुना भवेत् ॥३४॥ अवबोधं जनयतो निदाघस्य द्विजन्मनः । ऋभुर्नामाऽभवत्पुत्रो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥३५॥ विज्ञाततत्त्वसद्भावो निसर्गादेव भूपते । तस्य शिष्यो निदाघोऽभूत्पुलस्त्यतनयः पुरा ॥३६॥ प्रादादशेषविज्ञानं स तस्मै परया मुदा । अवाप्तज्ञानतत्त्वस्य न तस्याद्वैतवासना ॥३७॥ स ऋभुस्तर्कयामास निदाघस्य नरेश्वर । देविकायास्तटे वीर नगरं नाम वै पुरम् ॥३८॥ समृद्धमतिरम्यं च पुलस्त्येन निवेशितम् । रम्योपवनपर्यन्तं स तस्मिन्पार्थिवोत्तम ॥३९॥ निदाघनामयोगज्ञस्तस्य शिष्योऽभवत्पुरा । दिव्ये वर्षसहस्रे तु समतीतेऽथ तत्पुरम् ॥४०॥ जगाम स ऋभुः शिष्यं निदाघमवलोकितुम् । स तस्य वैश्वदेवांते द्वारालोकनगोचरः ॥४१॥ को ही परमार्थ शब्द का अर्थ माना जाय तो वह दूसरे से आत्मा का भेद करने वाला है; किन्तु परमार्थ में भेद नहीं होता । परमार्थ और आत्मा का योग ही परमार्थ कहा जाता है । अन्य द्रव्य मिथ्या है क्योंकि परमार्थ द्रव्यमय नहीं है । अतः राजन् ! निःसन्देह ये सब श्रेय ही हैं, परमार्थ नहीं । भूपाल ! अब मैं संक्षेप से परमार्थ का वर्णन करता हूँ, सुनो ॥२४-२८॥ नरेश्वर ! आत्मा एक, व्यापक, सम, शुद्ध, निर्गुण और प्रकृति से परे है । उसमें जन्म और वृद्धि आदि विकार नहीं हैं । वह सर्वत्र व्यापक तथा परम ज्ञानमय है । असत् नाम और जाति आदि से उस सर्वव्यापक परमात्मा का न कभी संयोग हुआ, न है और न होगा ही । वह अपने और दूसरे के शरीर में विद्यमान रहते हुए भी एक ही है ॥२६-३१॥ इस प्रकार का जो विशेष ज्ञान है वही परमार्थ है । द्वैत भावना रखने वाले पुरुष तो अपरमार्थदर्शी ही हैं । जैसे बाँसुरी में एक ही वायु अभेद भाव से व्याप्त है, किन्तु उसके छिद्रों के भेद से उसमें षड्ज, ऋषभ आदि स्वरों का भेद हो जाता है, उसी प्रकार उस एक ही परमात्मा के देव, मनुष्य आदि अनेक भेद प्रतीत होते हैं । उस भेद की स्थिति तो अविद्या के आवरण तक ही सीमित है ॥३२-३३३॥ भूपाल ! इस विषय में ऋभु ऋषि का जो प्राचीन ऐतिहासिक उपाख्यान है, उसको सुनो । द्विजन्मा निदाघ को ज्ञान का प्रकाश देने वाले ऋभु परमेष्ठी ब्रह्मा के पुत्र थे ॥३४-३५॥ भूपते ! स्वभाव से ही समस्त तत्त्वों के ज्ञाता थे । प्राचीन काल में पुलस्त्य-तनय निदाघ उनका शिष्य था ॥३६॥ उन्होंने प्रसन्न होकर अपने शिष्य को सम्पूर्ण ज्ञान दे डाला । परन्तु सम्पूर्ण तत्त्वों को जान लेने पर भी निदाघ में अद्वैत भावना नहीं हुई ॥३७॥ नरेश्वर ! ऋभु ने निदाघ की इस स्थिति को ताड़ लिया । वीर ! देविका नदी के तट पर नागर नाम का एक विशाल नगर था । वह अत्यन्त मनोहर और समृद्धिशाली था जिसको पुलस्त्य ने बसाया था ॥३८३॥ नृपवर्य ! रम्य उपवनों से सुशोभित उस नगर में वह योगविद् निदाघ रहता था । एक दिन दिव्य हजार वर्ष बीत जाने पर ऋषि ऋभु अपने शिष्य निदाघ को देखने के लिए उस पुर में गए । उसने वैश्वदेव विधि करने के उपरान्त गुरुदेव को द्वार पर आया हुआ देखा और आदर के साथ उनका स्वागत कर घर में ले गया ॥३९-४१३॥

३२८ नारदीयपुराणम् स्थितस्तेन गृहीतार्थो निजवेश्म प्रवेशितः । प्रक्षालितांघ्रिपाणिं च कृतासनपरिग्रहम् ॥४२॥ उवाच स द्विजश्रेष्ठो भुज्यतामिति सादरम् । ऋभुरुवाच ॥४३॥ भो विप्रवर्य भोक्तव्यं यदत्र भवतो गृहे तत्कथ्यतां कदन्नेषु न प्रीतिः सततं मम । निदाघ उवाच सक्तुयावकव्रीहीनामपूपानां च मे गृहे । ॥४४॥ यद्रोचते द्विजश्रेष्ठ तावद्भुंक्ष्व यथेच्छया । ऋभुरुवाच ॥४५॥ कदन्नानि द्विजैतानि मिष्टमन्नं प्रयच्छ मे संयावपायसादीनि चेक्षुका रसवंति च । निदाघ उवाच ॥४६॥ गृहे शालिनि मद्गेहे यत्किंचिदतिशोभनम् भोज्येषु साधनं मिष्टं तेनास्यान्नं प्रसाधय । इत्युक्ता तेन सा पत्नी मिष्टमन्नं द्विजस्य तत् ॥४७॥ प्रसाधितवती तद्वै भर्तुर्वचनगौरवात् । तं भुक्तवंतमिच्छातो मिष्टमन्नं महामुनिम् ॥४८॥ निदाघः प्राह भूपाल प्रश्रयावनतः स्थितः । निदाघ उवाच ॥४९॥ अपि ते परमा तृप्तिरुत्पन्ना पुष्टिरेव च हाथ और पैर को धो कर उसने गुरु जी को उच्च आसन दिया । जब गुरुजी आसनासीन हो गए तब उस द्विज- श्रेष्ठ ने आदरपूर्वक भोजन करने के लिए कहा ॥४२½॥ ऋभु बोले- विप्रवर्य ! जो तुम्हारे घर में है उसी को खाना चाहिए । तो कहो मैं क्या खाऊँ ? कदन्न से तो मुझे कभी भी प्रीति नहीं रही । निदाघ बोला- द्विजश्रेष्ठ ! मेरे घर में सत्तू, जौ की लपसी और बाटी बनी हैं। इनमें से जो अच्छा लगे उसको आप यथेच्छ भोजन कीजिए ॥४३-४४½॥ ऋभु ने कहा- द्विज ! ये तो कदन्न हैं, मुझे मीठा अन्न भोजन के लिए दो । हलुआ, खीर और खांड़ के बने हुए पदार्थ भोजन कराओ ॥४५½॥ निदाघ ने कहा- गृहिणी ! मेरे घर में जो कुछ उत्तम अन्न और मीठे पदार्थ हैं उनका स्वादु भोजन बनाकर द्विजवर को परसो । पत्नी पति के कहने के अनुसार आदरपूर्वक अपने पति के वचन के अनुकूल ही स्वादु भोजन द्विज के आगे परोस दिया । भूपाल ! जब महामुनि इच्छानुकूल मधुर अन्न खा चुके तब निदाघ ने विनम्र नम्र होकर पूछा ॥४६-४८½॥ 'द्विज ! क्या आपको इस मधुर भोजन से पर्याप्त तृप्ति हुई ? कुछ शरीर में शक्ति आई ? अथवा दृढ

एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३२६ अपि ते मानसं स्वस्थमाहारेण कृतं द्विज । क्व निवासी भवान्विप्र क्व वा गंतुं समुद्यतः ॥५०॥ आगम्यते च भवता यतस्तच्च निवेद्यताम् । ऋभुरुवाच क्षुधितस्य च भुक्तेऽन्ने तृप्तिर्ब्रह्मन्व्जायते ॥५१॥ न मे क्षुधा भवेत्तृप्तिः कस्मान्मां द्विज पृच्छसि । वह्निना पार्थिवेनादौ दग्धे वै क्षुत्समुद्भवः ॥५२॥ भवत्यंभसि च क्षीणे नृणां तृष्णासमुद्भवः । क्षुत्तृष्णे देहधर्माख्ये न ममैते यतो द्विज ॥५३॥ ततः क्षुत्संभवाभावात्तृप्तिरस्त्येव मे सदा । मनसः स्वस्थता तुष्टिश्चित्तधर्माविमौ द्विज ॥५४॥ चेतसो यस्य यत्पृष्टं पुमानेभिर्न युज्यते । क्व निवासस्तवेत्युक्तं क्व गंतासि च यत्त्वया ॥५५॥ कुतश्चागम्यते त्वैतत्त्रितयेऽपि निबोध मे । पुमान्सर्वगतो व्यापीत्याकाशवदयं यतः ॥५६॥ कुतः कुत्र क्व गंतासीत्येतदप्यर्थवत्कथम् । सोऽहं गंता च चागंता नैकदेशनिकेतनः ॥५७॥ त्वं चान्ये च न च त्वं त्वं नान्ये नैवाहमप्यहम् । मिष्टान्ने मिष्टमित्येषा जिह्वा सा मे कृता तव ॥५८॥ किं वक्ष्यतीति तत्रापि श्रूयतां द्विजसत्तम । मिष्टमेव यदामिष्टं तदेवोद्वेगकारणम् ॥५९॥ अमिष्टं जायते मिष्टं मिष्टादुद्विजते जनः । आदिमध्यावसानेषु किमन्नं रुचिकारणम् ॥६०॥ मृण्मयं हि मृदा यद्वद्गृहं लिप्तं स्थिरीभवेत् । पार्थिवोऽयं तथा देहः पार्थिवैः परमाणुभिः ॥६१॥ यवगोधूममुद्गादिधृतं तैलं पयो दधि । गुडः फलानीति तथा पार्थिवाः परमाणवः ॥६२॥ आहार से कुछ मानसिक तुष्टि प्राप्त हुई ? ॥४६ १/२॥ विप्र ! आप कहाँ के रहने वाले हैं ? इस समय कहाँ के लिए प्रस्थान किया है और कहाँ से आपका शुभागमन हुआ है ? कृपा कर मुझसे कहिए ॥५०॥ ऋभु ने कहा—भूखे व्यक्ति को भोजन करने से तृप्ति होती है । द्विज ! मुझे तो क्षुधा लगती नहीं तो फिर तुम तृप्ति के विषय में क्यों पूछते हो ? पार्थिव अग्नि से जलने पर भूख लगती है और जल के नष्ट होने पर मनुष्य में तृष्णा उत्पन्न होती है । द्विज ! क्षुधा और तृष्णा देह के धर्म हैं, मेरे नहीं । इसलिए क्षुधा के सर्वथा अभाव से मुझे तो सर्वदा तृप्ति रहती ही है ॥५१-५३ १/२॥ द्विज ! मन का स्वास्थ्य और तुष्टि ये दोनों चित्त के धर्म हैं । तो जब ये चित्त के धर्म हैं तो पुरुष इनसे कभी भी युक्त नहीं होता ॥५४ १/२॥ तुमने जो यह पूछा है कि कहाँ निवास स्थान है, कहाँ जाओगे और कहाँ से आ रहे हो, तो इन तीनों प्रश्नों का उत्तर भी मुझसे सुनो । चूंकि यह पुरुष आकाश की भाँति सर्वगत और सर्वव्यापक है इसलिए कहाँ से आये हो और कहाँ जाओगे, ये प्रश्न भी सार्थक कैसे हो सकते हैं ? ऐसा मैं न तो कहीं जाता हूँ, न आता हूँ और न तो किसी एक देश में मेरा निवास-स्थान ही है ॥५५-५७॥ तुम और दूसरे न तुम तुम हो न दूसरे दूसरे हैं और न मैं मैं हूँ । तुम्हारे मिष्टान्न को मेरी जिह्वा ने मीठा समझकर खाया है ॥५८॥ द्विजसत्तम ! इस विषय में मेरी जिह्वा कहा करती है उसको सुनो । यदि मीठे को मीठा न कहा जाय तो वही उद्वेग का कारण बन जाता है ॥५९॥ कभी कड़वा ही मीठा बन जाता और कभी मीठा ही मनुष्य को अरुचिकर हो जाता है । आदि, मध्य और अन्त में कभी ऐसा हो जाता है तो अन्न के रुचिकर होने में क्या कारण है इसको सुनो ॥६०॥ जिस प्रकार मिट्टी का घर मिट्टी से लीपने पर स्थिर (पुष्ट) होता है उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर पार्थिव परमाणुओं से पुष्ट होता है ॥६१॥ यव, गेहूँ, उड़द, घी, तेल, दूध, दही, गुड़ और फल ये पार्थिव परमाणु हैं ॥६२॥ इसलिए आप मीठे और कड़वे का रहस्य ४२ ना० पु०

३३० नारदीयपुराणम् तदेतद्भवता ज्ञात्वा मिष्टामिष्टविचारि यत् । तन्मनः शमनालंबि कार्यं प्राप्यं हि मुक्तये ॥६३॥ इत्याकर्ण्य वचस्तस्य परमार्थाश्रितं नृप । प्रणिपत्य महाभागो निदाघो वाक्यमब्रवीत् ॥६४॥ प्रसीद महितार्थाय कथ्यतां यस्त्वमागतः । नष्टो मोहस्तवाकर्ण्य वचांस्येतानि मे द्विज ॥६५॥ ऋभुरुवाच ऋभुरस्मि तवाचार्यः प्रज्ञादानाय ते द्विज । इहागतोऽहं दास्यामि परमार्थं सुबोधितम् ॥६६॥ एक एवमिदं विद्धि न भेदि सकलं जगत् । वासुदेवाभिधेयस्य स्वरूपं परमात्मनः ॥६७॥ ब्राह्मण उवाच तथेत्युक्त्वा निदाघेन प्रणिपातपुरःसरम् । पूजितः परया भक्त्यानिच्छतः प्रययौ विभुः ॥६८॥ पुनर्वर्षसहस्रांते समायातो नरेश्वर । निदाघज्ञानदानाय तदेव नगरं गुरुः ॥६९॥ नगरस्य बहिः सोऽथ निदाघं दृष्टवान् मुनिम् । महाबलपरीवारे पुरं विशति पार्थिवे ॥७०॥ दूरस्थितं महाभागे जनसंमर्दवर्जकम् । क्षुत्क्षामकण्ठमायांतमरण्यात्ससमित्कुशम् ॥७१॥ दृष्ट्वा निदाघं स ऋभुरुपागत्याभिवाद्य च । उवाच कस्मादेकांते स्थीयते भवता द्विज ॥७२॥ निदाघ उवाच भो विप्र जनसंमर्द्दो महानेष जनेश्वरे । प्रविवक्षौ पुरे रम्ये तेनात्र स्थीयते मया ॥७३॥ जानकर अपने मन को स्थिर कीजिए और मुक्ति के उपायों को प्राप्त कीजिए ॥६३॥ नृप ! ऋभु की इस परमार्थ से भरी हुई वाणी को सुनकर महाभाग निदाघ उनके चरणों पर गिर पड़ा और बोला ॥६४॥ द्विज ! प्रसन्न होइए, मेरे कल्याण के लिए आप बतलाइए कि आप कौन हैं, जो यहाँ आये हुए हैं ? आपकी इन बातों को सुनकर मेरा सारा मोह नष्ट हो गया ॥६५॥ ऋभु बोले--मैं तुम्हारा आचार्य ऋभु हूँ। द्विज ! तुमको ज्ञान दान करने के लिए यहाँ आया हूँ। तुमको उचित और स्पष्ट परमार्थ ज्ञान दूंगा ॥६६॥ यह समस्त संसार परमात्मा वासुदेव का रूप है, एक है, और अभिन्न है ॥६७॥ ब्राह्मण बोला--निदाघ ने गुरु का उपदेश स्वीकार किया और अत्यन्त निष्ठा से गुरु का चरणवन्दन कर उनकी पूजा की। ऋभु गुरु भी उसकी पूजा से प्रसन्न होकर चले गए ॥६८॥ फिर एक हजार वर्ष बीत जाने पर गुरु जी इसी नगर में अपने शिष्य को ज्ञान देने के लिए आये ॥६९॥ उस समय उन्होंने नगर के बाहर मुनि निदाघ को बैठे हुए देखा। उसी समय राजा भी अपने सैनिकों और राजपुरुषों के साथ नगर में प्रवेश कर रहा था। मुनि निदाघ अरण्य से समिधा और कुश लिए हुए आ रहा था। भूख-प्यास से उसका कण्ठ सूख गया था और भीड़ से बचने के लिए वह दूर खड़ा था ॥७०-७१॥ ऋभु उसको देखकर समीप आये और अभिवादन कर पूछा--"द्विज ! आप यहाँ एकान्त में क्यों बैठे हैं ?" ॥७२॥ निदाघ बोला--विप्र ! आज नरेश्वर इस रम्य पुर में समारोह के साथ प्रवेश कर रहे हैं जिससे अधिक भीड़ हो गई है इसीलिए मैं यहाँ बैठा हूँ ॥७३॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सम्पूर्ण देवनागरी पाठ (लाइन-दर-लाइन) दिया गया है:

एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३१ ऋभुरुवाच नराधिपोऽत्र कतमः कतमश्चेतरो जनः । कथ्यतां मे द्विजश्रेष्ठ त्वमभिज्ञो मतो मम ॥७४॥ निदाघ उवाच योऽयं गजेन्द्रमुन्मत्तमद्रिशृंगसमुच्छ्रयम् । अधिरूढो नरेन्द्रोऽयं परितो यस्तथेतरः ॥७५॥ ऋभुरुवाच एतौ हि गजराजानौ दृष्टौ हि युगपन्मया । भवता निर्विशेषेण पृथग्वेदोपलक्षितौ ॥७६॥ तत्कथ्यतां महाभाग विशेषो भवतानयोः । ज्ञातुमिच्छाम्यहं कोऽत्र गजः को वा नराधिपः ॥७७॥ निदाघ उवाच गजो योऽयमधो ब्रह्मन्नुपर्यस्यैष भूपतिः । वाह्यवाहकसंबंधं को न जानाति वै द्विज ॥७८॥ ऋभुरुवाच ब्रह्मन्यथाहं जानीयां तथा मामवबोधय । अधः सत्त्वविभागं किं किं चोर्ध्वमभिधीयते ॥७९॥ ब्राह्मण उवाच इत्युक्त्वा सहसारुह्य निदाघः प्राह तं ऋभुम् । श्रूयतां कथयाम्येष यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥८०॥ उपर्यहं यथा राजा त्वमधः कुंजरो यथा । अवबोधाय ते ब्रह्मन्दृष्टांतो दर्शितो मया ॥८१॥


ऋभु बोले—इसमें नरेन्द्र कौन हैं और इतर जन कौन हैं, द्विजवर ! आप बताइए, जान पड़ता है कि आप अवश्य भली-भाँति परिचित हैं ॥७४॥ निदाघ बोला—जो पहाड़ की चोटी के समान ऊँचे मतवाले गजेन्द्र पर बैठे हुए हैं वे नरेन्द्र हैं और उनके चारों ओर इतर जन हैं ॥७५॥ ऋभु बोले—मैंने इन दोनों गजराज और राजा को पहले एक साथ ही देख लिया और आपने तो पृथक्-पृथक् भली भाँति देखा है तो महाभाग ! आप कुछ इन दोनों की विशेषता बतलाइए । मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि कौन गज है और कौन राजा ॥७६-७७॥ निदाघ ने कहा—ब्रह्मन् ! जो नीचे है वह तो हाथी है और इसके ऊपर जो स्थित है वह राजा है। द्विज ! इस छोटी सी बात को-वाह्य-वाहक संबन्ध को कौन नहीं जानता ? ॥७८॥ ऋभु बोले--ब्रह्मन् ! जिस प्रकार मैं भली भाँति जान सकूँ उस प्रकार मुझे समझाओ । यहाँ दोनों पदार्थ में विभाग कैसे किया जाय ? इसलिए बतलाओ कि किसको अधः (नीचे) कहा जाय और किसको ऊर्ध्व (ऊपर) ॥७९॥ ब्राह्मण बोला--यह कह कर निदाघ एकाएक ऋभु के ऊपर चढ़ गया और कहा—सुनो बता रहा हूँ जो तुम मुझसे पूछ रहे हो । जिस प्रकार मैं ऊपर हूँ वैसे राजा हाथी के ऊपर है और तुम हाथी की भाँति नीचे हो । ब्रह्मन् ! तुमको भली भाँति समझाने के लिए यह दृष्टान्त के रूप में दिखलाया है ॥८०-८१॥

३३२ नारदोयपुराणम् ऋभुरुवाच त्वं राजेव द्विजश्रेष्ठ स्थितोऽहं गजवद्यदि। तदेवं त्वं समाचक्ष्व कतमस्त्वमहं तथा ॥८२॥ ब्राह्मण उवाच इत्युक्तः सत्वरस्तस्य चरणावभिवंद्य सः। निदाघः प्राह भगवन्नाचार्यस्त्वमृभुर्मम ॥८३॥ नान्यस्याद्वैतसंस्कारसंस्कृतं मानसं तथा। यथाचार्यस्य तेन त्वां मन्ये प्राप्तमहं गुरुम् ॥८४॥ ऋभुरुवाच तवोपदेशदानाय पूर्वशुश्रूषणात्तव। गुरुस्नेहादृभुर्नाम निदाघं समुपागतः ॥८५॥ तदेतदुपदिष्टं ते संक्षेपेण महामते। परमार्थसारभूतं यत्तदद्वैतमशेषतः ॥८६॥ ब्राह्मण उवाच एवमुक्त्वा ददौ विद्यां निदाघं स ऋभुर्गुरुः। निदाघोऽप्युपदेशेन तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥८७॥ सर्वभूतान्यभेदेन ददृशे स तदात्मनः। तथा ब्रह्मतनौ मुक्तिमवाप परमां द्विजः ॥८८॥ तथा त्वमपि धर्मज्ञ तुल्यात्मरिपुबांधवः। भव सर्वगतं ज्ञानमात्मानमवनीपते ॥८९॥ सितनीलादिभेदेन यथैकं दृश्यते नभः। भ्रांत दृष्टिभिरात्मापि तथैकः सन्पृथक् पृथक् ॥९०॥ ऋभु बोले—द्विजश्रेष्ठ ! तुम यदि राजा के समान हो और मैं गज के समान हूँ तो बताओ कि तुम कौन हो और मैं कौन हूँ ॥८२॥ ब्राह्मण बोला—यह सुनकर वह शीघ्र ही गुरु के चरणों की वन्दना कर बोला, भगवन् ! आप निश्चय ही मेरे गुरु ऋभुदेव हैं, क्योंकि आचार्य को छोड़कर दूसरे की ऐसी अद्वैत भावना से परिष्कृत बुद्धि नहीं है। इसलिए मुझे विश्वास है कि आज मैं अपने गुरु को पा गया हूँ ॥८३-८४॥ ऋभु ने कहा—तुम्हारी पूर्व की शुश्रूषा से प्रसन्न होकर मैं (ऋभु) तुम (निदाघ) को उपदेश देने के लिए वात्सल्य से आकृष्ट हो यहाँ आया हूँ। इसलिए महामते ! जो सम्पूर्ण तत्त्वों का सार अद्वैत तत्त्व है उसको इस प्रकार संक्षेप में पूर्णरूप से सुना दिया है ॥८५-८६॥ ब्राह्मण बोला—इस प्रकार गुरु ऋभु ने अपने शिष्य निदाघ को परम अद्वैत विद्या का उपदेश दिया। निदाघ भी गुरु के उस उपदेश से अद्वैत परायण हो गया। उस समय से वह अपने और इतर सब प्राणियों को अभेद भावना से देखने लगा। इस प्रकार उसने ब्राह्मण के शरीर में परम मुक्ति प्राप्त कर ली ॥८७-८८॥ धर्मज्ञ ! इसलिए तुम भी शत्रु और बन्धुओं में समान दृष्टि रखने वाले समदर्शी बनो। भूमिपते ! अपने को सबके रूप में देखने वाला आत्मज्ञानी बनो ॥८९॥ जिस प्रकार एक ही नभ श्वेत, नील आदि भेद से अनेक दिखाई पड़ता है उसी प्रकार भ्रान्तदृष्टि व्यक्ति एक आत्मा को पृथक्-पृथक् रूपों में देखता है ॥९०॥ यहाँ जो कुछ दिखाई देता है वह समस्त अच्युत से अतिरिक्त और कुछ नहीं। वह, मैं और तुम यह सब केवल मायातीत आत्मा की ही विभूति है ॥९१॥

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३३ सनंदन उवाच एकः समस्तं यदिहास्ति किंचित्तदच्युतो नास्ति परं ततोऽन्यत् । सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेतदात्मा स्वयं भात्यपभेदमोहः ॥६१॥ सनंदन उवाच इतोरितस्तेन स राजवर्यस्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः । स चापि जातिस्मरणायबोधस्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥६२॥ परमार्थोऽध्यात्ममेतत्तभ्यमुक्तं मुनीश्वर । ब्राह्मणक्षत्रियविशां श्रोतॄणां चापि मुक्तिदम् ॥६३॥ यथा पृष्टं त्वया ब्रह्म स्तथा ते गदितं मया । ब्रह्मज्ञानमिदं शुद्धं किमन्यत्कथयामि वै ॥६४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वि० पा० एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥४६॥

अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सूत उवाच श्रुत्वा सनंदनस्येत्थं वचनं नारदो मुनिः । असंतुष्ट इव प्राह भ्रातरं तं सनंदनम् ॥१॥

सनन्दन ने कहा- ब्राह्मण के मुख से इस प्रकार का उपदेश सुनकर राजा ने सारे भेद-भाव का त्याग कर परमार्थ दृष्टि प्राप्त कर ली और उसको जातिस्मर का ज्ञान हो जाने के कारण उसी जन्म में मुक्ति भी मिल गई ॥९२॥ मुनीश्वर ! इस परमार्थ अध्यात्म को तुमसे मैंने कह दिया जिसका सुनना ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सबको मुक्ति देने वाला है। ब्रह्मन् ! तुमने जैसे पूछा मैंने तदनुकूल उत्तर भी दे दिया, यही शुद्ध ब्रह्मज्ञान है। अब कहो और मैं क्या कहूँ ॥९३-९४॥ श्रीनारदीय महापुराण में उनचासवाँ अध्याय समाप्त ॥४९॥

अध्याय ५० शिक्षा-निरूपण सूत जी बोले- सनन्दन की बातों को सुनकर नारद असन्तुष्ट-से रहे और फिर अपने भाई सनन्दन से कहा ॥१॥

३३४ नारदीयपुराणम् नारद उवाच भगवन्सर्वमाख्यातं यत्पृष्टं भवतो मया । तथापि नात्मा प्रीयेत शृण्वन्हरिकथां मुहुः ॥२॥ श्रूयते व्यासपुत्रस्तु शुकः परमधर्मवित् । सिद्धिं सुमहतीं प्राप्तो निर्विण्णोऽवांतरं बहिः ॥३॥ ब्रह्मन्पुंसस्तु विज्ञानं महतां सेवनं विना । न जायते कथं प्राप्तो ज्ञानं व्यासात्मजः शिशुः ॥४॥ तस्य जन्मरहस्यं मे कर्मचाप्यस्य शृण्वते । समाख्याहि महाभाग मोक्षशास्त्रार्थविद्भवान् ॥५॥ सनंदन उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि शुकोत्पत्तिं समासतः । यां श्रुत्वा ब्रह्मतत्त्वज्ञो जायते मानवो मुने ॥६॥ न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बंधुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥७॥ नारद उवाच अनूचानः कथं ब्रह्मन्पुमान्भवति मानद । तन्मे कर्म समाचक्ष्व श्रोतुं कौतूहलं मम ॥८॥ सनंदन उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि ह्यनूचानस्य लक्षणम् । यज्ज्ञात्वा सांगवेदानामभिज्ञो जायते नरः ॥६॥ शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं ज्यौतिषं तथा । छंदःशास्त्रं षडेतानि वेदांगानि विदुर्बुधाः ॥१०॥ ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः । वेदाश्चत्वार एवैते प्रोक्ता धर्मनिरूपणे ॥११॥ सांगान्वेदान्गुरोर्यस्तु समधीते द्विजोत्तमः । सोऽनूचानः प्रभवति नान्यथा ग्रंथकोटिभिः ॥१२॥ भगवन् ! मैंने जो कुछ आपसे पूछा, उसको आपने बता दिया; परन्तु इतनी अधिक हरि-कथा को बार-बार सुनकर भी मुझे प्रसन्नता नहीं हो रही है ॥२॥ सुना जाता है कि परम धर्मज्ञ व्यास-पुत्र शुक ने बिना किसी प्रकार के बाह्य और आभ्यन्तर साधना के ही परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी ॥३॥ भगवन् ! पुरुष को बिना महात्माओं की सेवा के विज्ञान की प्राप्ति नहीं होती; किन्तु व्यास पुत्र शिशु शुक ने कैसे अनायास प्राप्त कर लिया ॥४॥ उनके जन्म के रहस्य और कर्म को कहिए महाभाग ! आप मोक्ष शास्त्र के ज्ञाता हैं। कृपाकर मुझ श्रोता को सुनाइए ॥५॥ सनन्दन बोले- विप्र ! सुनो, मैं तुमको संक्षेप में शुकोत्पत्ति को सुना रहा हूँ। मुने ! जिस कथा को सुनकर मानव ब्रह्म तत्त्व का ज्ञाता हो जाता है ॥६॥ न तो वयोवृद्ध होने से, न केश पकने से, न तो धन, और परिवार द्वारा महत्ता प्राप्त की जाती है। वस्तुतः ऋषियों ने कहा है कि जो अनूचान है वही महान् है ॥७॥ नारद बोले- सम्मान देने वाले ! मनुष्य अनूचान कैसे होता है, उसके कर्म को बतलाइए, मुझे सुनने के लिए कौतूहल हो रहा है ॥८॥ सनंदन बोले- नारद, सुनो, मैं अनूचान का लक्षण बता रहा हूँ जिसको जानकर मनुष्य अंग-सहित सब वेदों को जान जाता है ॥६॥ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द शास्त्र इन्हीं को विद्वानों ने वेदांग कहा है ॥१०॥ धर्म निरूपण में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, ये चार वेद ही प्रमाण कहे गये हैं। जो उत्तम ब्राह्मण गुरु से अंग सहित वेदों का अध्ययन करता है, उसको अनूचान कहते हैं अन्यथा करोड़ों ग्रन्थों के पढ़ने से द्विज अनूचान नहीं हो सकता ॥११-१२॥

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३५ नारद उवाच अंगानां लक्षणं ब्रूहि वेदानां चापि विस्तरात् । त्वमस्मासु महाविज्ञः सांगेष्वेतेषु मानद ॥१३॥ सनंदन उवाच प्रश्नभारोऽयमतुलस्त्वया मम कृतो द्विज । संक्षेपात्कथयिष्यामि सारमेषां सुनिश्चितम् ॥१४॥ स्वरः प्रधानः शिक्षायां कीत्तितो मुनिभिर्द्विजैः । वेदानां वेदविद्भिस्तु तच्छृणुष्व वदामि ते ॥१५॥ आर्चिकं गाथिकं चैव सामिकं च स्वरान्तरम् । कृतान्ते स्वरशास्त्राणां प्रयोक्तव्यं विशेषतः ॥१६॥ एकांतरः स्वरो ह्यृप्सु गाथासु द्वयन्तरः स्वरः । सामसु त्र्यन्तरं विद्यादेतावत्स्वरतोऽन्तरम् ॥१७॥ ऋक्सामयजुरंगानि ये यज्ञेषु प्रयुंजते । अविज्ञानाद्धि शिक्षायास्तेषां भवति विस्वरः ॥१८॥ मंत्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । ॥१९॥ स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेंद्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् उरः कंठः शिरश्चैव स्थानानि त्रीणि वाङ्मये । सवनान्याहुरेतानि साम वाप्यर्द्धतोऽन्तरम् ॥२०॥ नारद बोले-मानद ! आप सम्पूर्ण सांगोपाङ्ग वेदों के महान् पंडित हैं। इसलिये विस्तारपूर्वक अंगों और वेदों के लक्षण कहिये ॥१३॥ सनंदन बोले-द्विज ! तुमने तो बहुत बड़ा प्रश्न किया । इसलिए इनको संक्षेप में सिद्धान्त रूप से कह रहा हूँ ॥१४॥ वेदज्ञ ब्राह्मण मुनियों ने शिक्षा में स्वर की प्रधानता बताई है, उसको सुनो, मैं तुमसे कह रहा हूँ ॥१५॥ स्वर शास्त्रों के निश्चय के अनुसार विशेष रूप से आर्चिक (ऋक्-सम्बन्धी), गाथिक (गाथा-सम्बन्धी) और सामिक (साम-सम्बन्धी) स्वर व्यवधान का प्रयोग करना चाहिए। ऋचाओं में एक का अन्तर देकर स्वर होता है। गाथाओं में दो के व्यवधान से और साम-मन्त्रों में तीन के व्यवधान से स्वर होता है। स्वरों का इतना ही व्यवधान सर्वत्र जानना चाहिए ।१६-१७॥ ऋक्, साम और यजुर्वेद के अंगभूत जो याज्य, स्तोत्र, करण और मन्त्र आदि याज्ञिकों द्वारा यज्ञों में प्रयुक्त होते हैं, शिक्षा शास्त्र का ज्ञान न होने से उनमें विस्वर (विरुद्ध स्वर का उच्चारण) हो जाता है। स्वर और वर्ण से हीन मन्त्र और उसका मिथ्या प्रयोग जो कि यथार्थ अर्थ को न कहे यजमान का उसी प्रकार नाश कर देता है जिस प्रकार इन्द्र-शत्रु (वृत्र) का इन्द्रशत्रु शब्द के अशुद्ध स्वर प्रयोग के अपराध से नाश हो गया १ ॥१८-१९॥ वाङ्मय में उर, कण्ठ और शिर शब्दोच्चारण के तीन मूल स्थान माने जाते हैं। इनको ही सवन कहते हैं। अर्थात् वक्षः स्थान में नीच स्वर से जो शब्दोच्चारण होता है, उसे प्रातः सवन कहते हैं; कण्ठस्थान में मध्यम स्वर से किये हुए शब्दोच्चारण का नाम माध्यन्दिन सवन है तथा मस्तक रूप स्थान में उच्च स्वर से जो शब्दोच्चारण होता है, उसे तृतीय सवन कहते हैं। अधरोत्तर भेद से सप्त- १. तैत्तिरीय शाखा की कृष्णयजुः संहिता के द्वितीय काण्ड में पञ्चम प्रपाठक के द्वितीय अनुवाक की प्रथम पञ्चशती में मन्त्र आया है--'स्वाहेन्द्रशत्रुर्वर्धस्व' । पौराणिक गाथा के अनुसार त्वष्टा प्रजापति ने 'इन्द्र के शत्रु वृत्र के अभ्युदय के लिए इस मंत्र' का उच्चारण किया था। 'इन्द्रस्य शत्रुः' इस विग्रह के अनुसार षष्ठी समास में समासान्त प्रयुक्त अन्तोदात्त का उच्चारण अभीष्ट था; परन्तु प्रयोग में पूर्वपदप्रकृतिस्वर- आद्युदात्त बोला गया; अतः वह बहुव्रीहि के अर्थ का प्रकाशक हो गया। इसलिए 'इन्द्र है शत्रु (संहारक) जिसका वह' ऐसा अर्थ निकलने के कारण वृत्तासुर ही इन्द्र के हाथ से मारा गया।

३३६ नारदीयपुराणम् उरः सप्तविदारं स्यात्तथा कंठस्तथा शिरः । न च शक्तोऽसि व्यक्तस्तु तथा प्रावचनो विधिः ॥२१॥ कठकालापवृत्तेषु तैत्तिराह्वरकेषु च । ऋग्वेदे सामवेदे च वक्तव्यः प्रथमः स्वरः ॥२२॥ ऋग्वेदस्तु द्वितीयेन तृतीयेन च वर्तते । उच्चमध्यमसंघातः स्वरो भवति पार्थिवः ॥२३॥ तृतीये प्रथमकृष्टौ कुर्वन्त्याह्वरकान् स्वरान् । द्वितीयाद्यास्तु मद्रान्तांस्तैत्तिरीयाश्चतुःस्वरान् ॥२४॥ प्रथमश्च द्वितीयश्च तृतीयोऽथ चतुर्थकः । मंद्रः कृष्टो मुनीश्वर एतान्कुर्वंति सामगाः ॥२५॥ द्वितीयप्रथमावेतौ नांडिमाल्लविनौ स्वरौ । तथा शातपथावेतौ स्वरौ वाजसनेयिनाम् ॥२६॥ एते विशेषतः प्रोक्ताः स्वरा वै सार्ववैदिकाः । इत्येतच्चरितं सर्वं स्वराणां सार्ववैदिकम् ॥२७॥ सामवेदे तु वक्ष्यामि स्वराणां चरितं यथा । अल्पग्रंथं प्रभूतार्थं सामवेदांगमुत्तमम् ॥२८॥ तानरागस्वरग्राममूर्च्छनानां तु लक्षणम् । पवित्रं पावनं पुण्यं यथा तुभ्यं प्रकीर्तितम् ॥२६॥ शिक्षामानुद्विजातीनामृग्यजुः सामलक्षणम् । सप्त स्वरास्त्रयो ग्रामा मूर्च्छनास्त्वेकविंशतिः ॥३०॥ ताना एकोनपंचाशदित्येतत्स्वरमंडलम् । षड्जश्च ऋषभश्चैव गांधारो मध्यमस्तथा ॥३१॥ पंचमो धैवतश्चैव निषादः सप्तमः स्वरः । षड्जमध्यमगांधारास्त्रयो ग्रामाः प्रकीर्तिताः ॥३२॥ भूल्लो काज्जायते षड्जो भुवर्लोकाच्च मध्यमः । स्वर्गाच्चाच्चैव गांधारो ग्रामस्थानानि त्रीणि हि ॥३३॥

स्वरात्मक साम के भी पूर्वोक्त तीन ही स्थान हैं। उरोभाग, कण्ठ तथा सिर—ये सातों स्वरों के विचरण-स्थान हैं। किन्तु उरःस्थल में मन्द्र और अतिस्वार की अभिव्यक्ति न होने से उसे सातों स्वरों का विचरणस्थल नहीं कहा जा सकता, तथापि अध्ययनाध्यापन के लिए वैसा विधान किया गया है। (ठीक अभिव्यक्ति न होने पर भी उपांशु या मानस प्रयोग में वर्ण तथा स्वर का सूक्ष्म उच्चारण होता है) ॥२०-२१॥ कठ, कालाप, तैत्तिरीय तथा आह्नरक शाखाओं में और ऋग्वेद एवं सामवेद में प्रथम स्वर का प्रयोग करना चाहिए ॥२२॥ ऋग्वेद द्वितीय और तृतीय स्वर से भी परिगीत होता है। उच्च और मध्यम का संघात पार्थिव (लौकिक) स्वर होता है ॥२३॥ आह्नरक शाखा वाले तृतीय तथा प्रथम में उच्चारित स्वरों का प्रयोग करते हैं। तैत्तिरीय शाखा वाले द्वितीय से लेकर पञ्चम तक चार स्वरों का उच्चारण करते हैं। सामगान करने वाले विद्वान् प्रथम (षड्ज), द्वितीय (ऋषभ), तृतीय (गान्धार), चतुर्थ (मध्यम), मन्द्र (पञ्चम), कृष्ट (धैवत) तथा अतिस्वार (निषाद)—इन सातों स्वरों का प्रयोग करते हैं। द्वितीय और प्रथम—ये ताण्डी (ताण्ड्यपञ्चविंशादि ब्राह्मण के अध्येता कौथुम आदि शाखा वाले) तथा भाल्लवी (छन्दोग शाखा वाले) विद्वानों के स्वर हैं। शतपथ ब्राह्मण में आये हुए ये दोनों स्वर वाजसनेयी शाखा वालों के द्वारा भी प्रयुक्त होते हैं। ये सब वेदों में प्रयुक्त होने वाले स्वर विशेष रूप से बताए गए हैं। इस प्रकार सार्ववैदिक स्वर-संचार कहा गया है ॥२४-२७॥ अब सामवेद में स्वरों का जैसा प्रयोग होता है उसको कह रहा हूँ। सामवेद को थोड़े शब्दों में अत्यधिक अर्थ को व्यक्त करने वाला उत्तम वेद समझना चाहिए ॥२८॥ तान, राग, स्वर, ग्राम और मूर्च्छना का लक्षण पवित्र, पावन और पुण्यदायक है जैसा कि मैंने तुमसे पहले कहा था। द्विजाति के लिये ही ऋक्, यजु और साम संबन्धी शिक्षा कही गई है ॥२६३॥ सात स्वर, तीन ग्राम और मूर्च्छना इक्कीस प्रकार की होती है, तान उनचास प्रकार के होते हैं; इनकी स्वर-मण्डल कहा गया है। षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद ये सात स्वर हैं। षड्ज, मध्यम और गान्धार ये तीन ग्राम हैं ॥३०-३२॥ भूःलोक से षड्ज उत्पन्न होता है, भुवःलोक से मध्यम और स्वर्ग एवं मेघलोक से गान्धार उत्पन्न होता है। तीन ग्राम-स्थान हैं। स्वरों के विशेष रूप से ग्राम राग