भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 1008 में से

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१६ नारदीयपुराणम् क्षारोदधेरुत्तरं यद्धिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । ज्ञेयं तद्भारतं वर्षं सर्वकर्मफलप्रदम् ॥४६॥ अत्र कर्माणि कुर्वन्ति त्रिविधानि तु नारद । तत्फलं भुज्यते चैव भोगभूमिधनक्रमात् ॥४७॥ भारते तु कृतं कर्म शुभं वाशुभमेव च । तत्फलं क्षयि विप्रेन्द्र भुज्यतेऽन्यत्र जन्तुभिः ॥४८॥ अद्यापि देवा इच्छन्ति जन्म भारतभूतले । सञ्चितं सुमहत्पुण्यमक्षय्यममलं शुभम् ॥४९॥ कदा लभामहे जन्म वर्षभारतभूमिषु । कदा पुण्येन महता यास्याम परमं पदम् ॥५०॥ दानैर्वाविविधैर्यज्ञैस्तपोभिर्वाथवा हरिम् । जगदीशं समेष्यामो नित्यानन्दमनामयम् ॥५१॥ यो भारतभुवं प्राप्य विष्णुपुजापरो भवेत् । न तस्य सदृशोऽन्योऽस्ति त्रिषु लोकेषु नारद ॥५२॥ हरिकीर्तनशीलो वा तद्भक्तानां प्रियोऽपि वा । शुश्रूषुश्चापि महतः स वेद्यो दिविजैरपि ॥५३॥ हरिपुजारतो नित्यं भक्त पूजारतोऽपि वा । भक्तोच्छिष्टान्नसेवी च याति विष्णोः परं पदम् ॥५४॥ नारायणेति कृष्णेति वासुदेवेति यो वदेत् । अहिंसादिपरः शान्तः सोऽपि वन्द्यः सुरोत्तमैः ॥५५॥ शिवेति नीलकण्ठेति शङ्करेति च यः स्मरेत् । सर्वभूतहितो नित्यं सोऽभ्यर्च्यो दिविजैः स्मृतः ॥५६॥ गुरुभक्तः शिवध्यानी स्वाश्रमाचारतत्परः । अनसूयुः शुचिर्दक्षो यः सोऽप्यर्च्यः सुरेश्वरैः ॥५७॥ ब्राह्मणानां हितकरः श्रद्धावान्वर्णधर्मयोः । वेदवादरतो नित्यं स ज्ञेयः पङ्क्तिपावनः ॥५८॥ अभेददर्शी देवेशे नारायणशिवात्मके । सर्वं यो ब्रह्मणा नित्यमस्मदादिषु का कथा ॥५९॥ गोषु शान्तो ब्रह्मचारी परनिन्दाविवर्जितः । अपरिग्रहशीलश्च देवपूज्यः स नारद ॥६०॥

परिमाण में हैं ।४२-४५। लवण समुद्र से उत्तर और हिमालय से दक्षिण जो प्रदेश है वह सब प्रकार के कर्मों का फल देने वाला भारत वर्ष है । नारद ! इस देश में मनुष्य त्रिविध कर्मों को करते हैं और उन कर्म के फल को भोग-भूमि और सम्पत्ति के क्रम से भोगते हैं । विप्रेन्द्र ! इस भारत में मनुष्य अपने किये हुए शुभ अशुभ कर्मों के क्षयशील फलों का भोग अन्य लोकों (स्वर्ग, नरक आदि) में करते हैं। अब तक भी देवतागण भारत भूतल पर संचित, महान्, अमर, अमल और शुभ पुण्य के लिए जन्म लेना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि कब वे अपने महापुण्यों के प्रभाव से भारत वर्ष की भूमि पर जन्म लेंगे और कब वे अपने पुण्य के प्रभाव से परम पद को प्राप्त करेंगे ॥४६-५०॥ सर्वदा उनकी यही इच्छा रहती है कि कब वे दान, विविध यज्ञों अथवा तपस्या से नित्य आनन्दमय जगदीश हरि के समीप जायेंगे । जो भाग्यशाली मानव भारत भूमि पर जन्म लेकर विष्णु-पूजा में रत रहता है, नारद ! उसके समान इन तीनों लोकों में कोई दूसरा नहीं है । जो हरिकीर्तन के प्रेमी, विष्णु भक्तों के प्रिय अथवा उस परम विष्णु के सेवक हैं उनका देवता भी आदर पूर्वक गुण गान करते हैं । हरि पूजा में रत रहने वाले, नित्य उनके भक्तों की सेवा में रहने वाले, और भक्तों के जूठे अन्न को खाने वाले व्यक्ति भी विष्णु के परम पद को प्राप्त करते हैं । जो अहिंसादि धर्म में रत रहने वाला व्यक्ति नारायण, कृष्ण, वासुदेव आदि नामों का कीर्तन करता है, उसकी श्रेष्ठ देवता भी पूजा करते हैं । जो शिव, नीलकण्ठ और शङ्कर, इन नामों से शिव का स्मरण करता है और लोक कल्याण में लगा रहता है, वह भी देवों द्वारा पूजित होता है । गुरुभक्त, शिव का ध्यान करने वाला, अपने आश्रमानुकूल आचार का पालन करने वाला, ईर्ष्या रहित (उदार), पवित्र और कर्मकुशल व्यक्ति भी देवों से पूजित होता है ॥५१-५७॥ ब्राह्मणों का हित करने वाला, वर्ण व्यवस्था और धर्म में श्रद्धा रखने वाला तथा नित्य ब्रह्म (ज्ञान) की चर्चा में ही समय बिताने वाला व्यक्ति पंक्ति पावन समझा जाता है । नारद ! जो देवों के प्रभु नारायण और शिव में अभेद भाव रखता है तथा सब में ब्रह्म का नित्य दर्शन करता है, उसके विषय में तो कुछ कहना ही नहीं । इन्द्रिय- संयमी, ब्रह्मचारी, पर निन्दा से विमुख रहने वाला एवं दान न लेने वाला व्यक्ति देवों से पूज्य होता है ॥५८-६०॥

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