भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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तृतीयोऽध्यायः

तृतीयोऽध्यायः १७ स्तेयादिदोषविमुखः कृतज्ञः सत्यवाक् शुचिः । परोपकारनिरतः पूजनीयः सुरासुरैः ॥६१॥ वेदार्थश्रवणे बुद्धिः पुराणश्रवणे तथा । सत्संगेऽपि च यस्यास्ति सोऽपि वन्द्यः सुरोत्तमैः ॥६२॥ एवमादीन्यनेकानि कर्माणि श्रद्धयान्वितः । करोति भारते वर्षे संबन्धोऽस्माभिरेव च ॥६३॥ एतेष्वन्यतमो विप्रसात्मानं नारभेत्तु यः । स एव दुष्कृतिमूढो नास्त्यन्योऽस्मादचेतनः ॥६४॥ संप्राप्य भारते जन्म सत्कर्मसु पराङ्मुखः । पीयूषकलशं मुक्त्वा विषभाण्डमुपाश्रितः ॥६५॥ श्रुतिस्मृत्युदितैर्धर्मैरात्मानं पावयेत्तु यः । स एवात्मविधाती स्यात्पापिनामग्रणीर्मुने ॥६६॥ कर्मभूमिं समासाद्य यो न धर्मं समाचरेत् । स च सर्वाधमः प्रोक्तो वेदविद्भिर्मुनीश्वर ॥६७॥ शुभं कर्म समुत्सृज्य दुष्कर्माणि करोति यः । कामधेनुं परित्यज्य अर्कक्षीरं स मार्गति ॥६८॥ एवं भारतभूभागं प्रशंसन्ति दिवौकसः । ब्रह्माद्या अपि विप्रेन्द्र स्वभोगक्षयभीरवः ॥६९॥ तस्मात्पुण्यतमं ज्ञेयं भारतं वर्षमुत्तमम् । देवानां दुर्लभं वापि सर्वकर्मफलप्रदम् ॥७०॥ अस्मिन्पुण्ये च भूभागे यस्तु सत्कर्मसूद्यतः । न तस्य सदृशं कश्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥७१॥ अस्मिञ्जातो नरो यस्तु स्वकर्मक्षपणोद्यतः । नररूपपरिच्छन्नः स हरिनैत्र संशयः ॥७२॥ परं लोकफलं प्रेप्सुः कुर्यात्कर्माप्यतन्द्रितः । निवेद्य हरये भक्त्या तत्फलं ह्याक्षयं स्मृतम् ॥७३॥ विरागी चेत्कर्मफलेष्वपि किंचिन्न कारयेत् । अर्पयेत्सुकृतं कर्म प्रीयतामिति मे हरिः ॥७४॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरुत्पत्तिदायकाः । फलागृध्नुः कर्मणां तत्प्राप्नोति परमं पदम् ॥७५॥ वेदोदितानि कर्माणि कुर्यादीश्वरतुष्टये । यथाश्रमं त्यक्तकामः प्राप्नोति पदमव्ययम् ॥७६॥


चोरी आदि पापों से विमुख रहने वाला, कृतज्ञ, सत्यवक्ता, पवित्र और नित्य परोपकार में निरत रहने वाला व्यक्ति सुर एवं असुर दोनों का पूज्य होता है। जिसकी वेदों के तत्त्व सुनने में, पुराण श्रवण में और सत्संग में श्रद्धा एवं भावना रहती है वह भी देवताओं से वन्द्य (पूज्य) होता है। जो इस भारतवर्ष में जन्म लेकर हमलोगों के आदेशानुसार श्रद्धायुक्त होकर ऐसे अनेक शुभकर्मों को करता है वह धन्य है। जो मूढ़ इन उपर्युक्त कर्मों के विरुद्ध आचरण करता है वह पापी है। उससे बढ़कर अज्ञानी इस संसार में कोई दूसरा नहीं है। जो भारतवर्ष में जन्म लेकर भी अच्छे सत्कर्म से विमुख रहता है वह अमृत कलश को छोड़कर विषकुम्भ को अपनाता है। ॥५८-६५॥ मुने ! जो श्रुतिस्मृति-समस्त धर्मों के आचरण से आत्मोद्धार नहीं करता है, वही आत्मघाती और पापियों में महान् पापी है। मुनीश्वर ! जो इस कर्मभूमि (भारतभूमि) पर जन्म लेकर धर्म का आचरण नहीं करता है, उसको वेद के जानने वाले लोग सबसे अधम कहते हैं। जो शुभकर्मों को छोड़ कर दुष्कर्मों में प्रवृत्त होता है, वह कामधेनु को छोड़कर मदार के दूध की इच्छा करता है। देवता भी भारत भूमि की प्रशंसा करते हैं। विप्रेन्द्र ! ब्रह्मा आदि देवगण भी अपने (पुण्यफल) भोग के नाश से डरने वाले हैं। इसलिए भारतवर्ष को सब वर्षों से उत्तम समझना चाहिए, यह सब कर्मों के फलों को देने वाला वर्ष देवों के लिए भी दुर्लभ है ॥६६-७०॥ इस पवित्र भूभाग पर जन्म लेकर जो सत्कर्म करने में लगे रहते हैं उसके समान इस त्रिलोक में कोई दूसरा नहीं है। जो इस भारतवर्ष में जन्म लेकर अपने कर्मों के लिए उद्यत रहता है वह मनुष्य के रूप में प्रच्छन्न विष्णु है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। उत्तम लोक के फल को चाहने वाले व्यक्ति को भक्ति पूर्वक भगवदर्पण बुद्धि से आलस्य रहित होकर सत्कार्य करना चाहिए ऐसे कर्मों के फल कभी भी नष्ट नहीं होते। यदि कर्म फलों की कुछ भी इच्छा न रखने वाला व्यक्ति चाहे और कुछ भी न करे केवल 'हरि मुझ पर प्रसन्न हों (हरिः प्रीयताम्), यह कहता हुआ अपने सुकृतकर्मों को अर्पित कर दे, तो वह पुनर्जन्म को देनेवाले स्वर्ग से लेकर भूलोक को पार कर परम पद को प्राप्त करता है ॥७१-७५॥ केवल भगवत्प्रीति की इच्छा से, निष्काम होकर जो आश्रमानुकूल कर्म

३-ना० पु०