बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ नारदीयपुराणम् निष्कामो वा सकामो वा कुर्यात्कर्म यथाविधि । स्वाश्रमाचारशून्यश्च पतितः प्रोच्यते बुधैः ॥७७॥ सदाचारपरो विप्रो वर्द्धते ब्रह्मतेजसा । तस्य विष्णुश्च तुष्टः स्याद्भक्तियुक्तस्य नारद ॥७८॥ भारते जन्म संप्राप्य नात्मानं तारयेत्तु यः । पच्यते निरये घोरे स त्वाचन्द्रार्कतारकम् ॥७९॥ वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरं तपः । वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरा गतिः ॥८०॥ वासुदेवात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं तस्मादन्यन्न विद्यते ॥८१॥ स एव धाता त्रिपुरान्तकश्च स एव देवासुरयज्ञरूपः । स एव ब्रह्माण्डमिदं ततोऽन्यन्न किंचिदस्ति व्यतिरिक्त रूपम् ॥८२॥ यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मादणीयान्न तथा महीयान् । व्याप्तं हि तेनेदमिदं विचित्रं तं देवदेवं प्रणमेत्समीड्यम् ॥८३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सृष्टिभरतखण्ड- प्राशस्थ्यभूगोलानां वर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ करता है वह शाश्वत पद को प्राप्त करता है। चाहे निष्काम भाव हो या सकाम, मनुष्य को विधि के अनुसार कार्य करना चाहिए; क्योंकि बुधजन अपने आश्रम-विहित आचार से विमुख रहने वाले व्यक्ति को पतित कहते हैं। नारद ! सदाचार-परायण ब्राह्मण अपने ब्रह्मतेज से नित्य वृद्धि पाता है और भक्तिरत विप्र पर विष्णु सर्वदा प्रसन्न रहते हैं। जो मूढ़ भारत वर्ष में जन्म लेकर भी अपना उद्धार नहीं करता है वह जब तक चन्द्र, सूर्य और तारामण्डल से आकाश सुशोभित रहता है तब तक घोर नरक में दुःख भोग करता है। वासुदेव ही परमधर्म, परमतप, परमज्ञान और वासुदेव ही परम गति हैं ॥७६-८०॥ ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् वासुदेवमय है। उससे भिन्न संसार नामक कोई अन्य पदार्थ नहीं है। वही ब्रह्मा, वही त्रिपुरारि शंकर, वही देव, असुर और यज्ञरूप है। यह सारा ब्रह्माण्ड वही है। उसके अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की सत्ता नहीं है। जिससे पर या अपर कोई दूसरा नहीं और जिससे सूक्ष्म या महान् कोई दूसरा नहीं अर्थात् जो महान् से भी महत्तर और सूक्ष्म से सूक्ष्मतम है, उससे यह सारा विचित्र जगत् व्याप्त है। इसलिए उस पूज्य देवाधिदेव को प्रणाम करना चाहिए ॥८१-८३॥ श्रीनारदीयपुराण में सृष्टि, भारतवर्ष, उसकी सम्पूर्ण भूभागों से श्रेष्ठता और अन्य भूभागों का वर्णन नामक तीसरा अध्याय समाप्त ॥३॥