बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः सनक उवाच श्रद्धापूर्वाः सर्वधर्मा मनोरथफलप्रदाः । श्रद्धया साध्यते सर्वं श्रद्धया तुष्यते हरिः ॥१॥ भक्तिर्भक्त्यैव कर्त्तव्या तथा कर्माणि भक्तितः । कर्मश्रद्धाविहीनानि न सिध्यन्ति द्विजोत्तमाः ॥२॥ यथाऽऽलोको हि जन्तूनां चेष्टाकारणतां गतः । तथैव सर्वसिद्धीनां भक्तिः परमकारणम् ॥३॥ यथा समस्तलोकानां जीवनं सलिलं स्मृतम् । तथा समस्तसिद्धीनां जीवनं भक्तिरिष्यते ॥४॥ यथा भूमिं समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः । तथा भक्तिं समाश्रित्य सर्वकार्याणि साधयेत् ॥५॥ श्रद्धावाँल्लभते धर्म्मं श्रद्धावानर्थमाप्नुयात् । श्रद्धया साध्यते कामः श्रद्धावान्मोक्षमाप्नुयात् ॥६॥ न दानैर्न तपोभिर्वा यज्ञैर्वा बहुदक्षिणैः । भक्तिहीनर्मुनेश्रेष्ठ तुष्यते भगवान्हरिः ॥७॥ मेरुमात्रसुवर्णानां कोटिकोटिसहस्रशः । दत्ता चाप्यर्थनाशाय यतो भक्तिर्विवर्जिता ॥८॥ अभक्त्या यत्तपस्तप्तं केवलं कायशोषणम् । अभक्त्या यद्धुतं हव्यं भस्मनि न्यस्तहव्यवत् ॥६॥ यत्किञ्चित्कुरुते कर्म्म श्रद्धयाप्यणुमात्रकम् । तन्नाम जायते पुंसां शाश्वतं प्रीतिदायकम् ॥१०॥ अध्याय ४ मार्कण्डेय मुनि का चरित्र-वर्णन सनक बोले-श्रद्धापूर्वक किये गये सब धर्म ही इच्छित फल देने वाले होते हैं, श्रद्धा से ही सब कुछ सिद्ध होता है और श्रद्धा से ही भगवान् हरि प्रसन्न होते हैं। उपासना और श्रद्धा भक्तिपूर्वक होनी चाहिए। अन्य कर्म भी भक्तिपूर्वक ही करना चाहिए। द्विजोत्तमवृन्द ! श्रद्धापूर्वक न किये गये कर्म भी पूर्ण नहीं होते हैं। जिस प्रकार प्रकाश प्राणियों के कार्य करने का कारण माना जाता है उसी प्रकार सब प्रकार की सिद्धियों का परमकारण भक्ति ही है अर्थात् जिस प्रकार प्रकाश के द्वारा मनुष्य या प्राणी अपने कार्यों में लग जाते हैं उसी प्रकार भक्ति के द्वारा मनुष्य अपने कार्यों में सफल हो जाता है। जिस प्रकार समस्त प्राणियों का जल जीवन (प्राण-दाता) कहा जाता है उसी प्रकार सब सिद्धियों का जीवन भक्ति है ॥१-४॥ जिस प्रकार सकल जीवजन्तु इस पृथ्वी के सहारे जीते हैं उसी प्रकार भक्ति के बल से मनुष्य सब कार्यों को पूर्ण कर देता है। श्रद्धालु व्यक्ति ही धर्म प्राप्त करता है। वही अर्थ, वही काम और वही मोक्ष भी प्राप्त करता है। मुनिश्रेष्ठ ! भक्तिहीन मनुष्य चाहे असंख्य धन का दान, तप, या यज्ञ कर भरपूर दक्षिणा दे परन्तु उस पर भगवान् कथमपि प्रसन्न नहीं होते हैं ॥५-७॥ मनुष्य मेरु पर्वत के तुल्य करोड़ों सुवर्ण-पर्वत दान में दे दे परन्तु वह केवल धन का अपव्यय ही कहा जायगा यदि वह दान भक्ति पूर्वक नहीं दिया गया है। श्रद्धा-हीन किया हुआ तप केवल शरीर को कष्ट देना मात्र है। श्रद्धा के बिना अग्नि में दी हुई आहुतियां केवल भस्म में दी हुई आहुति के समान हैं ॥८-६॥ श्रद्धापूर्वक किया हुआ सत्कर्म चाहे अति क्षुद्र ही क्यों न हो परन्तु वह निश्चय ही नित्य सुख देने वाला होता है ॥१०॥ ब्रह्मन् ! वेद-विधि के अनुसार सहस्रों अश्वमेध