बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 39, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें२० नारदीयपुराणम् अश्वमेधसहस्रं वा कर्म्म वेदोदितं कृतम् । तत्सर्वं निष्फलं ब्रह्मन्यदि भक्तिविवर्जितम् ॥११॥ हरिभक्तिः परा नृणां कामधेनूपमा स्मृता । तस्यां सत्यां पिबन्त्यज्ञाः संसारगरलं ह्यहो ॥१२॥ असारभूते संसारे सारमेतदजात्मज । भगवद्भक्तसङ्गश्च हरिभक्तिस्तितिक्षुता ॥१३॥ असूयोपेतमनसां भक्तिदानादिकर्म्म यत् । अवेहि निष्फलं ब्रह्मंस्तेषां दूरतरो हरिः ॥१४॥ परश्रियाभितप्तानां दम्भाचाररतात्मनाम् । मृषा तु कुर्वतां कर्म तेषां दूरतरो हरिः ॥१५॥ पृच्छतां च महाधर्म्मान्वदतां वै मृषा च तान् । धर्मेष्वभक्तिमनसां तेषां दूरतरो हरिः ॥१६॥ वेदप्रणिहितो धर्म्मो वेदो नारायणः परः । तत्राश्रद्धापरा ये तु तेषां दूरतरो हरिः ॥१७॥ यस्य धर्म्मविहीनानि दिनान्यायान्ति यान्ति च । स लोहकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥१८॥ धर्मार्थकाममोक्षाख्याः पुरुषार्थाः सनातनाः । श्रद्धावतां हि सिध्यन्ति नान्यथा ब्रह्मनन्दन ॥१९॥ स्वाचारमनतिक्रम्य हरिभक्तिपरो हि यः । स याति विष्णुभवनं यद्वै पश्यन्ति सूरयः ॥२०॥ कुर्वन्वेदोदितान्धर्म्मान्मुनीन्द्र स्वाश्रमोचितान् । हरिध्यानपरो यस्तु स याति परमं पदम् ॥२१॥ आचारप्रभवो धर्मः धर्मस्य प्रभुरच्युतः । आश्रमाचारयुक्तेन पूजितः सर्वदा हरिः ॥२२॥ यः स्वाचारपरिभ्रष्टः साङ्गवेदान्तगोऽपि वा । स एव पतितो ज्ञेयो यतः कर्मबहिष्कृतः ॥२३॥ हरिभक्तिपरो वाऽपि हरिध्यानपरोऽपि वा । भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात्पतितः सोऽभिधीयते ॥२४॥ यज्ञ कर देने पर भी कुछ भी फल नहीं मिलता है यदि वह भक्ति पूर्वक नहीं किये गए हों। मनुष्यों के लिए हरि- भक्ति सब सिद्धियों को देने वाली श्रेष्ठ कामधेनु के समान मानी गई है। आश्चर्य है कि इसके रहते हुए भी मूढ़ जन सांसारिक विषय वासना रूपी विष का बार-बार पान करते हैं ॥११-१२॥ ब्रह्मपुत्र ! इस असार संसार में केवल भगवद्भक्तों की संगति, हरिभक्ति और सहिष्णुता ही सारभूत पदार्थ हैं। ब्रह्मन् ! ईर्ष्यालु मनुष्यों के किये हुए भक्ति, दान आदि प्रत्येक कर्म को निष्फल ही समझो और उनके लिए हरि दूर से भी दूरतर हैं ॥१३-१४॥ दूसरे के ऐश्वर्य को देखकर जलने वाले और पाखण्ड में लगे रहने वाले मनुष्यों के किये हुए कर्म व्यर्थ हैं और उनसे भगवान् उतनी ही दूर रहते हैं जितना पाताल से आकाश । किसी से परम धर्म के विषय में पूछा जाय—और यदि वह जिज्ञासु जनों को व्यर्थ के उपदेश दे तो ऐसे धर्म में श्रद्धा न रखने वाले व्यक्तियों से भगवान् सर्वदा दूर रहते हैं। धर्म वेद प्रतिपादित हैं, अर्थात् धर्म की व्याख्या वेद ही करते हैं और वेद नारायण को ही परम धर्म मानते हैं, ऐसे नारायण और नारायण परक वेद और धर्म में श्रद्धा न रखने वाले व्यक्ति से भगवान् सर्वदा दूर रहते हैं ॥१५-१७॥ जिसके दिन धर्माचरण में नहीं बीतते हैं यों ही व्यर्थ आते-जाते हैं, वह व्यक्ति लुहार की भाथी (धौंकनी) के समान श्वास लेता हुआ भी मृतक के समान है। ब्रह्मनन्दन ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये ही सनातन चार पुरुषार्थ माने गए हैं; परन्तु ये केवल श्रद्धालुजनों को ही प्राप्त होते हैं श्रद्धाहीनों को नहीं। जो अपने कुलाचार को न छोड़ता हुआ हरिभक्ति में तल्लीन रहता है वह उस विष्णुलोक को प्राप्त करता है, जिसको ज्ञानी लोग अपनी ज्ञानदृष्टि से देखा करते हैं। मुनीन्द्र ! वेदोक्त एवं अपने आश्रम के योग्य धर्म का पालन करते हुए जो व्यक्ति हरिभक्ति में रत रहते हैं ॥१८-२०॥ वे परम पद को पा जाते हैं। धर्म से ही आचार उत्पन्न होता है और धर्म के प्रभु (स्वामी, आदि कारण) अच्युत हरि हैं। अतः आश्रमानुकूल आचार पालन से प्रभु सर्वदा प्रसन्न होते हैं। साङ्गोपाङ्ग वेदों का अध्ययन करने वाला व्यक्ति भी यदि अपने कुलाचार से हीन है तो उसे भी पतित ही समझना चाहिये; क्योंकि वह भगवान् के प्रिय कर्मों से च्युत है। चाहे कोई व्यक्ति हरिभक्ति और उसके ध्यान में अनन्य