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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

२० नारदीयपुराणम् अश्वमेधसहस्रं वा कर्म्म वेदोदितं कृतम् । तत्सर्वं निष्फलं ब्रह्मन्यदि भक्तिविवर्जितम् ॥११॥ हरिभक्तिः परा नृणां कामधेनूपमा स्मृता । तस्यां सत्यां पिबन्त्यज्ञाः संसारगरलं ह्यहो ॥१२॥ असारभूते संसारे सारमेतदजात्मज । भगवद्भक्तसङ्गश्च हरिभक्तिस्तितिक्षुता ॥१३॥ असूयोपेतमनसां भक्तिदानादिकर्म्म यत् । अवेहि निष्फलं ब्रह्मंस्तेषां दूरतरो हरिः ॥१४॥ परश्रियाभितप्तानां दम्भाचाररतात्मनाम् । मृषा तु कुर्वतां कर्म तेषां दूरतरो हरिः ॥१५॥ पृच्छतां च महाधर्म्मान्वदतां वै मृषा च तान् । धर्मेष्वभक्तिमनसां तेषां दूरतरो हरिः ॥१६॥ वेदप्रणिहितो धर्म्मो वेदो नारायणः परः । तत्राश्रद्धापरा ये तु तेषां दूरतरो हरिः ॥१७॥ यस्य धर्म्मविहीनानि दिनान्यायान्ति यान्ति च । स लोहकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥१८॥ धर्मार्थकाममोक्षाख्याः पुरुषार्थाः सनातनाः । श्रद्धावतां हि सिध्यन्ति नान्यथा ब्रह्मनन्दन ॥१९॥ स्वाचारमनतिक्रम्य हरिभक्तिपरो हि यः । स याति विष्णुभवनं यद्वै पश्यन्ति सूरयः ॥२०॥ कुर्वन्वेदोदितान्धर्म्मान्मुनीन्द्र स्वाश्रमोचितान् । हरिध्यानपरो यस्तु स याति परमं पदम् ॥२१॥ आचारप्रभवो धर्मः धर्मस्य प्रभुरच्युतः । आश्रमाचारयुक्तेन पूजितः सर्वदा हरिः ॥२२॥ यः स्वाचारपरिभ्रष्टः साङ्गवेदान्तगोऽपि वा । स एव पतितो ज्ञेयो यतः कर्मबहिष्कृतः ॥२३॥ हरिभक्तिपरो वाऽपि हरिध्यानपरोऽपि वा । भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात्पतितः सोऽभिधीयते ॥२४॥ यज्ञ कर देने पर भी कुछ भी फल नहीं मिलता है यदि वह भक्ति पूर्वक नहीं किये गए हों। मनुष्यों के लिए हरि- भक्ति सब सिद्धियों को देने वाली श्रेष्ठ कामधेनु के समान मानी गई है। आश्चर्य है कि इसके रहते हुए भी मूढ़ जन सांसारिक विषय वासना रूपी विष का बार-बार पान करते हैं ॥११-१२॥ ब्रह्मपुत्र ! इस असार संसार में केवल भगवद्भक्तों की संगति, हरिभक्ति और सहिष्णुता ही सारभूत पदार्थ हैं। ब्रह्मन् ! ईर्ष्यालु मनुष्यों के किये हुए भक्ति, दान आदि प्रत्येक कर्म को निष्फल ही समझो और उनके लिए हरि दूर से भी दूरतर हैं ॥१३-१४॥ दूसरे के ऐश्वर्य को देखकर जलने वाले और पाखण्ड में लगे रहने वाले मनुष्यों के किये हुए कर्म व्यर्थ हैं और उनसे भगवान् उतनी ही दूर रहते हैं जितना पाताल से आकाश । किसी से परम धर्म के विषय में पूछा जाय—और यदि वह जिज्ञासु जनों को व्यर्थ के उपदेश दे तो ऐसे धर्म में श्रद्धा न रखने वाले व्यक्तियों से भगवान् सर्वदा दूर रहते हैं। धर्म वेद प्रतिपादित हैं, अर्थात् धर्म की व्याख्या वेद ही करते हैं और वेद नारायण को ही परम धर्म मानते हैं, ऐसे नारायण और नारायण परक वेद और धर्म में श्रद्धा न रखने वाले व्यक्ति से भगवान् सर्वदा दूर रहते हैं ॥१५-१७॥ जिसके दिन धर्माचरण में नहीं बीतते हैं यों ही व्यर्थ आते-जाते हैं, वह व्यक्ति लुहार की भाथी (धौंकनी) के समान श्वास लेता हुआ भी मृतक के समान है। ब्रह्मनन्दन ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये ही सनातन चार पुरुषार्थ माने गए हैं; परन्तु ये केवल श्रद्धालुजनों को ही प्राप्त होते हैं श्रद्धाहीनों को नहीं। जो अपने कुलाचार को न छोड़ता हुआ हरिभक्ति में तल्लीन रहता है वह उस विष्णुलोक को प्राप्त करता है, जिसको ज्ञानी लोग अपनी ज्ञानदृष्टि से देखा करते हैं। मुनीन्द्र ! वेदोक्त एवं अपने आश्रम के योग्य धर्म का पालन करते हुए जो व्यक्ति हरिभक्ति में रत रहते हैं ॥१८-२०॥ वे परम पद को पा जाते हैं। धर्म से ही आचार उत्पन्न होता है और धर्म के प्रभु (स्वामी, आदि कारण) अच्युत हरि हैं। अतः आश्रमानुकूल आचार पालन से प्रभु सर्वदा प्रसन्न होते हैं। साङ्गोपाङ्ग वेदों का अध्ययन करने वाला व्यक्ति भी यदि अपने कुलाचार से हीन है तो उसे भी पतित ही समझना चाहिये; क्योंकि वह भगवान् के प्रिय कर्मों से च्युत है। चाहे कोई व्यक्ति हरिभक्ति और उसके ध्यान में अनन्य

चतुर्थोऽध्यायः २१ वेदो वा हरिभक्तिर्वा भक्तिर्वापि महेश्वरे । आचारात्पतितं मूढं न पुनाति द्विजोत्तम ॥२५॥ पुण्यक्षेत्राभिगमनं पुण्यतीर्थनिषेवणम् । यज्ञो वा विविधो ब्रह्मंस्त्यक्ताचारं न रक्षति ॥२६॥ आचारात्प्राप्यते स्वर्ग आचारात्प्राप्यते सुखम् । आचारात्प्राप्यते मोक्ष आचारात्किं न लभ्यते ॥२७॥ आचाराणां तु सर्वेषां योगानां चैव सत्तम । हरिभक्तेरपि तथा निदानं भक्तिरिष्यते ॥२८॥ भक्त्यैव पूज्यते विष्णुर्वाञ्छितार्थफलप्रदः । तस्मात्समस्तलोकानां भक्तिर्मतेति गीयते ॥२९॥ जीवन्ति जन्तवः सर्वे यथा मातरमाश्रिताः । तथा भक्तिं समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति धार्मिकाः ॥३०॥ स्वाश्रमाचारयुक्तस्य हरिभक्तिर्यदा भवेत् । न तस्य त्रिषुलोकेषु सदृशोऽस्त्यजनन्दन ॥३१॥ भक्त्या सिध्यन्ति कर्माणि कर्मभिस्तुष्यते हरिः । तस्मिंस्तुष्टे भवेज्ज्ञानं ज्ञानान्मोक्षमवाप्यते ॥३२॥ भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन खलु जायते । तत्सङ्गं प्राप्यते पुम्भिः सुकृतैः पूर्वसञ्चितैः ॥३३॥ वर्णाश्रमाचाररता भगवद्भक्तिलालसाः । कामादिदोषनिर्मुक्तास्ते सन्तो लोकशिक्षकाः ॥३४॥ सत्सङ्गः परमो ब्रह्मन्न लभ्येताकृतात्मनाम् । यदि लभ्येत विज्ञेयं पुण्यं जन्मान्तरार्जितम् ॥३५॥ पूर्वार्जितानि पापानि नाशमायान्ति यस्य वै । सत्सङ्गतिर्भवेत्तस्य नान्यथा घटते हि सा ॥३६॥ रविर्हि रश्मिजालेन दिवा हन्ति बहिस्तमः । सन्तः सूक्तिमरीच्योघैश्चान्तर्ध्वान्तं हि सर्वदा ॥३७॥

निष्ठा रखता हो परन्तु यदि वह अपने आचार से भ्रष्ट है तो भी उसको पतित ही कहा जाता है ॥२१-२४॥ द्विजवर्य ! साक्षात् वेद, हरिभक्ति या शिवभक्ति कोई भी अभागे आचार-भ्रष्ट को पवित्र नहीं कर सकता । ब्रह्मन् ! पवित्र क्षेत्रों में जाना, पुण्य तीर्थों की सेवा अथवा विविध यज्ञ ये कभी भी आचार-पतित की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकते ॥२५-२६॥ आचार से स्वर्ग प्राप्त होता है, आचार से ही सुख मिलता है और आचार से ही मोक्ष भी प्राप्त होता है । इस प्रकार कौन ऐसी वस्तु है जो आचार से नहीं मिल सकती है ? सज्जनों में श्रेष्ठ ! सब प्रकार के आचारों, योगों और हरि भक्ति का भी एकमात्र आदि कारण भक्ति (श्रद्धा) ही है। सब मनः कामनाओं को पूर्ण करने वाले विष्णु भक्ति के द्वारा ही पूजे जाते हैं या प्रसन्न होते हैं। इसीलिए भक्ति सब लोकों की माता कही जाती है। जिस प्रकार सभी जन्तु या प्राणी माता के सहारे जीते हैं उसी प्रकार सभी धार्मिक भक्ति के सहारे जीवित रहते हैं ॥२७-३०॥ ब्रह्मनन्दन ! जब अपने आश्रम के अनुसार आचरण करने वाले व्यक्ति हरिभक्तिपरायण हो जाते हैं तो उनके समान भाग्यशाली और पुण्यवान् व्यक्ति तीनों लोक में दूसरा नहीं रहता । भक्ति के द्वारा ही सब कर्म सफल होते हैं और कर्मों से ही भगवान् प्रसन्न होते हैं, भगवान् की प्रसन्नता (कृपा) से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त होती है ॥३१-३२॥ भगवद्भक्तों की संगति से ही भक्ति उत्पन्न होती है और सत्सङ्गति पूर्व सञ्चित शुभकर्मों से ही मनुष्य को प्राप्त होती है । ऐसे सन्त व्यक्ति ही लोक-शिक्षक या लोक-गुरु हैं जो कि वर्णाश्रम धर्म के पालन में लगे रहते, जिनकी सत्सङ्गति में रुचि होती और जो कामक्रोधादि दोषों से मुक्त रहते हैं। ब्रह्मन् ! सत्सङ्ग के समान उत्तम पदार्थ अजितेन्द्रिय व्यक्ति को कभी भी प्राप्त नहीं होता। यदि कोई ऐसा व्यक्ति पा जाय तो उसको उसके पूर्व जन्म के सञ्चित कर्मों का फल समझना चाहिए । जिसके पूर्व जन्म के किये पाप नष्ट हो जाते हैं उसीको सत्सङ्गति का सौभाग्य मिलता है; अन्यथा पापियों को सत्सङ्गति कथमपि प्राप्त नहीं हो सकती। सूर्य अपनी किरणों से दिन में जगद्व्यापी अन्धकार को दूर कर देता है और सज्जन मनुष्य अपने सदुपदेश रूपी किरणों के समूह से अज्ञानियों के अन्तःकरण के अज्ञानान्धकार को दूर करते हैं ॥३३-३७॥ इस लोक में भगवद्भक्ति में श्रद्धा एवं

२२ नारदीयपुराणम् दुर्लभाः पुरुषा लोके भगवद्भक्तिलालसाः । तेषां सङ्गो भवेद्यस्य तस्य शान्तिर्हि शाश्वती ॥३८॥ नारद उवाच किंलक्षणा भागवतास्ते च किं कर्म्म कुर्व्वते । तेषां लोको भवेत्कीदृक्तत्सर्वं ब्रूहि तत्त्वतः ॥३६॥ त्वं हि भक्तो रमेशस्य देवदेवस्य चक्रिणः । एतन्निगदितुं शक्तस्त्वत्तो नास्त्यधिकोऽपरः ॥४०॥ सनक उवाच शृणु ब्रह्मन्परं गुह्यं मार्कण्डेयस्य धीमतः । यमुवाच जगन्नाथो योगनिद्राविमोहितः ॥४१॥ योऽसौ विष्णुः परं ज्योतिर्देवदेवः सनातनः । जगद्रूपी जगत्कर्त्ता शिवब्रह्म स्वरूपवान् ॥४२॥ युगान्ते रौद्ररूपेण ब्रह्माण्डग्रासबृंहितः । जगत्येकार्णवीभूते नष्टे स्थावरजङ्गमे ॥४३॥ भगवान्नेव शेषात्मा शेते वटदले हरिः । असंख्यताब्जजन्माद्यैराभूषिततनूरुहः ॥४४॥ पादाङ्गुष्ठाग्रनिर्गतगङ्गाशीताम्बुपावनः । सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरो देवो ब्रह्माण्डग्रासबृंहितः ॥४५॥ वटच्छदे शयानोऽसौसर्वशक्तिसमन्वितः । तस्मिन्स्थाने महाभागो नारायणपरायणः । मार्कण्डेयः स्थितस्तस्य लीलाः पश्यन्महेशितुः ॥४६॥ ऋषय ऊचुः तस्मिन्काले महाघोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । हरिरेकः स्थित इति श्रुते पूर्वं हि शुश्रुम ॥४७॥ जगत्येकार्णवीभूते नष्टे स्थावरजंगमे । सर्वग्रस्तेन हरिणा किमर्थं सोऽवशेषितः ॥४८॥ लालसा रखने वाले पुरुष दुर्लभ हैं, ऐसे भगवद्भक्तों की सङ्गति जिसको प्राप्त हो जाती है, उसको शाश्वत शान्ति मिल जाती है ॥३८॥ नारद बोले—भगवद् भक्तों के लक्षण क्या हैं ? वे कैसे कर्म करते हैं ? उन लोगों को कौन से लोक प्राप्त होते हैं ? इन बातों को आप यथार्थ रूप से कहिए । आप महाप्रभु, देव-देव, चक्रधर विष्णु के भक्त हैं। आपसे बढ़ कर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं, जो इन विषयों पर साधिकार कुछ कह सके ॥३६-४०॥ सनत्कुमार बोले—ब्रह्मन् ! (इस विषय में) योगनिद्रा का त्याग कर विष्णु ने मार्कण्डेय से जो गुप्त बात कही थी, वह सुनिए। जो विष्णु पर, ज्योतिः स्वरूप, सनातन, देव-देव, जगत्स्वरूप, जगत् के कर्त्ता, शिव और ब्रह्मा रूप धारण करने वाले हैं, वे ही युगान्त में रुद्ररूप धारण कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ग्रस लेते हैं। जब सारा ब्रह्माण्ड एकार्णव रूप में हो जाता है और स्थावर, जंगम सब नष्ट हो जाते हैं तब केवल भगवान् हरि ही शेष रह जाते हैं और अक्षयवट के पत्ते पर सोते हैं। उस समय उनके प्रत्येक रोम अगणित ब्रह्मा आदि से सुशोभित रहते हैं। (अपने) पैर के अंगूठे के अगले भाग से निकली गंगा के शीतल जल को पवित्र करने वाले तथा सूक्ष्म से सूक्ष्म रूप धारण करते हुए भी वे ब्रह्माण्ड को अपने में छिपाकर महान् से महान् बने रहते हैं। इस प्रकार सर्वशक्ति-सम्पन्न हरि उस वट पत्र पर सोये हुए थे। उसी स्थान पर नारायणभक्तमहाभाग्यशाली मार्कण्डेय उस महाप्रभु की लीला को देखकर आश्चर्य-चकित-से स्थित थे ॥४१-४६॥ ऋषिगण बोले—उस महाभयंकर काल में स्थावर-जंगम आदि नष्ट हो गए थे, केवल भगवान् हरि ही बचे थे, ऐसा हम लोगों ने अभी सुना है। पुनः उस प्रलयकाल में जबकि सारा जगत् एकार्णवाकार था, स्थावर, जंगम आदि सब पदार्थ नष्ट हो गए थे तब सर्वसंहारी विष्णु ने मार्कण्डेय मुनि को कैसे छोड़ दिया ?

चतुर्थोऽध्यायः २३ परं कौतूहलं ह्यत्र वर्त्ततेऽतीव सूत नः । हरिकीर्तिसुधापाने कस्यालस्यं प्रजायते ॥४६॥ सूत उवाच आसीन्मुनिर्महाभागो मृकण्डुरिति विश्रुतः । शालग्रामे महातीर्थे सोऽतप्यत महातपाः ॥५०॥ युगानामयुतं ब्रह्मन्गृणन्ब्रह्म सनातनम् । निराहारः क्षमायुक्तः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥५१॥ आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यन्विषयनिःस्पृहः । सर्वभूतहितो दान्तस्तताप सुमहत्तपः ॥५२॥ तत्तपःशङ्किताः सर्वे देवा इन्द्रादयस्तदा । परेशं शरणं जग्मुर्नारायणमनामयम् ॥५३॥ क्षीराब्धेरुत्तरं तीरं संप्राप्य त्रिदिवौकसः । तुष्टुवुर्देवदेवेशं पद्मनाभं जगद्गुरुम् ॥५४॥ देवा ऊचुः नारायणाक्षरानन्त शरणागतपालक । मृकण्डुतपसा त्रस्तान्पाहि नः शरणागतान् ॥५५॥ जय देवाधिदेवेश जय शङ्खगदाधर । जयो लोकस्वरूपाय जयो ब्रह्माण्डहेतवे ॥५६॥ नमस्ते देवदेवेश नमस्ते लोकपावन । नमस्ते लोकनाथाय नमस्ते लोकसाक्षिणे ॥५७॥ नमस्ते ध्यानगम्याय नमस्ते ध्यानहेतवे । नमस्ते ध्यानरूपाय नमस्ते ध्यानसाक्षिणे ॥५८॥ केशिहन्त्रे नमस्तुभ्यं मधुहन्त्रे परात्मने । नमो भूम्यादिरूपाय नमश्चैतन्यरूपिणे ॥५९॥ नमो ज्येष्ठाय शुद्धाय निर्गुणाय गुणात्मने । अरूपाय स्वरूपाय बहुरूपाय ते नमः ॥६०॥ नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥६१॥ नमो हिरण्यगर्भाय नमो ब्रह्मादिरूपिणे । नमः सूर्यादिरूपाय हव्यकव्यभुजे नमः ॥६२॥ सूत जी ! इस विषय में हमलोगों को अत्यन्त कौतूहल हो रहा है, आप कृपा कर इसको समझाइये । भगवान् के गुणगान रूपी अमृत के पान करने-में, कौन ऐसा अभागा होगा जिसको आलस्य होगा ? ॥४७-४६॥ सूत जी बोले--मृकण्डु नाम से विख्यात एक महाभाग्यवान् मुनि थे । उस महातपस्वी ने शालग्राम नामक महान् तीर्थ में घोर तप किया । सहस्रों युगों तक उस सत्यसंध, जितेन्द्रिय, क्षमाशील सब प्राणियों के हित में लगे रहने वाले सबमें आत्मभावना रखने वाले उदार मुनि ने निराहार रहकर और विषय-वासनाओं से निःस्पृह होकर महान् तप किया । उनकी तपस्या से भयभीत होकर इन्द्र आदि सब देवता परम प्रभु, निर्विकार नारायण की शरण में गए । क्षीर सागर के उत्तर तट पर जाकर वे स्वर्गवासी देवता जगद्गुरु पद्मनाभ की स्तुति करने लगे ॥५०-५४॥ देवगण बोले-नारायण ! अक्षर ! अनन्त ! शरणागतों का पालन करने वाले ! मृकण्डुमुनि की तपस्या से भयभीत हम लोगों की रक्षा कीजिए । देवाधिदेवेश ! आपकी जय हो । शङ्ख-गदाधारी ! जय हो । लोक स्वरूप की जय हो । ब्रह्माण्ड के आदि कारण की जय हो । देवदेवेश ! आपको नमस्कार है । लोक पावन ! नमस्कार है । लोकनाथ को नमस्कार हैं । लोकसाक्षी को नमस्कार है । ध्यान से प्राप्त करने योग्य को नमस्कार है । ध्यान के हेतु को नमस्कार है । ध्यानरूप और ध्यान के साक्षी को नमस्कार है । केशी के हन्ता ! तुमको नमस्कार है । परात्मा मधुसूदन को नमस्कार है । भू सृष्टि के आदि रूप को नमस्कार है । चैतन्य रूप को नमस्कार है ॥५५-५९॥ ज्येष्ठ, शुद्ध, निर्गुण और सगुण ईश को नमस्कार है । अरूप, सरूप, और बहुरूप को नमस्कार है । विप्र वेद रक्षक देव को, गो ब्राह्मणों के हित करने वाले, जगत् के कल्याणकर्त्ता कृष्ण गोविन्द को नमस्कार है, हिरण्यगर्भ, ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप धारण करने वाले को नमस्कार है । सूर्य आदि रूप वाले, हव्य (देवाहुति) कव्य (पितृ

२४ नारदीयपुराणम् नमो नित्याय वन्द्याय सदानन्दैकरूपिणे । नमः स्मृतार्त्तिनाशाय भूयो भूयो नमो नमः ॥६३॥ एवं देवस्तुतिं श्रुत्वा भगवान्कमलापतिः । प्रत्यक्षतामगात्तेषां शङ्खचक्रगदाधरः ॥६४॥ विकचाम्बुजपत्राक्षं सूर्य्यकोटिसमप्रभम् । सर्वालङ्कारसंयुक्तं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् ॥६५॥ पीताम्बरधरं सौम्यं स्वर्णयज्ञोपवीतिनम् । स्तूयमानं मुनिवरैः पार्षदप्रवरावृतम् ॥६६॥ तं दृष्ट्वा देवसंघास्ते तत्तेजोजिततेजसः । नमश्चक्रुर्मुदा युक्ता अष्टांगैरवनिं गताः ॥६७॥ ततः प्रसन्नो भगवान्मेघगंभीरनिस्वनः । उवाच प्रीणयन्देवान्नतानिन्द्रपुरोगमान् ॥६८॥ श्रीभगवानुवाच जाने वो मानसं दुःखं मृकण्डुतपसोद्गतम् । युष्मान्न बाधते देवाः स ऋषिः सज्जनाग्रणी ॥६९॥ संपद्भिः संयुता वापि विपद्भिर्भवचापिसज्जनाः । सर्वथान्यं न बाधन्ते स्वप्नेऽपि सुरसत्तमाः ॥७०॥ सततं बाध्यमानोऽपि विषयाद्यैररातिभिः । अविधायात्मनो रक्षामन्यान्द्वेष्टि कथं सुधीः ॥७१॥ तापत्रयाभिधानेन बाध्यमानो हि मानवः । अन्यं क्रीडयितुं शक्तः कथं भवति सत्तमः ॥७२॥ कर्मणा मनसा वाचा बाधते यः सदा परान् । नित्यं कामादिभिर्युक्तो मूढधीः प्रोच्यते तु सः ॥७३॥ यो लोकहितकृन्मर्त्यो गतासूयो विमत्सरः । निःशङ्कः प्रोच्यते सद्भिborderरिहामुत्र च सत्तमः ॥७४॥ सशङ्कः सर्वदा दुःखी निःशङ्कः सुखमाप्नुयात् । गच्छध्वं स्वालयं स्वस्थाः क्रीडिष्यति वो न सः ॥७५॥ निमित्त दिये हुए पदार्थ) को ग्रहण करने वाले को नमस्कार है । नित्य, पूज्य, सर्वदा आनन्द स्वरूप को नमस्कार है । भक्तों की बाधा दूर करने वाले को वार-वार नमस्कार है ॥६०-६३॥ देवों की ऐसी स्तुति सुनकर भगवान् कमलापति शंख, चक्र और गदाधारी रूप में उनके सम्मुख प्रकट हुए, जिनके नेत्र विकसित कमल के समान उत्फुल्ल थे, शरीर से कोटि-कोटि सूर्य की प्रभा निकल रही थी, अङ्ग-अङ्ग पर अलङ्कार सुशोभित हो रहे थे, जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्स से अङ्कित था, जो पीताम्बरधारी और सुवर्ण के यज्ञोपवीत पहने हुए थे, जिनकी मुनिवरगण स्तुति कर रहे थे और जो अपने उत्तम पार्षदों से घिरे हुए थे । देव- समूह उस तेजोमय को देखकर हततेज हो गए, आनन्दविभोर हो देवों ने साष्टाङ्ग दण्डवत् किया । विनम्र देवों पर प्रसन्न होकर भगवान् ने इन्द्र आदि देवों को सम्बोधित करते हुए मेघ के समान गम्भीर स्वर से कहा ॥६४-६८॥ श्री भगवान् बोले-मुनि मृकण्डु की तपस्या के कारण जो मानसिक दुःख तुम देवों को हो गया है उसको मैं भलीभांति जानता हूँ; परन्तु देववृन्द ! वह ऋषि उच्चकोटि के सज्जन हैं । तुम लोगों को उससे किसी प्रकार की बाधा न होगी । सुरश्रेष्ठो ! सज्जन चाहे वैभव से युक्त हो अथवा विपत्तियों से घिरा हो वह स्वप्न में भी किसी प्रकार से दूसरों को कष्ट नहीं पहुँचाता है । वह विषय-वासना रूपी महान् शत्रुओं से बार-बार कष्ट पाता हुआ भी स्वयं की रक्षा न करके वह विद्वान् कैसे दूसरों से द्वेष कर सकता है ? त्रिताप नाम के महान् शत्रु से पीड़ित सज्जन पुरुष किस प्रकार दूसरे को पीड़ित करने का साहस कर सकता है ? जो मन, वचन और कर्म से सर्वदा दूसरों को कष्ट पहुँचाता रहता है, वह नित्य काम, क्रोध आदि के वश में रहने वाला सज्जन नहीं प्रत्युत मूढ़ बुद्धि कहा जाता है ॥६६-७३॥ सज्जनवृन्द ! जो लोकहितकारी मनुष्य ईर्ष्या-हीन और मात्सर्य से विरक्त रहता है, वह इस लोक में तथा परलोक में निःशङ्क रहता है, ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं । सशङ्क प्राणी सर्वदा दुःखी रहते हैं और निःशङ्क सर्वदा सुखभोग करते हैं, इसलिए तुम लोग

चतुर्थोऽध्यायः २५ भवतां रक्षकश्चाहं विहरध्वं यथासुखम् । इति दत्त्वा वरं तेषामतसीकुसुमप्रभः ॥७६॥ पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत । तुष्टात्मानः सुरगणा ययुर्नाकं यथागतम् ॥७७॥ मृकण्डोरपि तुष्टात्मा हरिः प्रत्यक्षतामगात् । अरूपं परमं ब्रह्म स्वप्रकाशम् निरञ्जनम् ॥७८॥ अतसीपुष्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । दिव्यायुधधरं दृष्ट्वा मृकण्डुर्विस्मितोऽभवत् ॥७९॥ ध्यानादुन्मील्य नयनं अपश्यद्धरिग्रतः । प्रसन्नवदनं शान्तं धातारं विश्वतेजसम् ॥८०॥ रोमाञ्चितशरीरोऽसावानन्दाश्रुविलोचनः । ननाम दण्डवद्भूतौ देवदेवं सनातनम् ॥८१॥ अश्रुभिः क्षालयंस्तस्य चरणौ हर्षसंभवैः । शिरस्यञ्जलिमाधाय स्तोतुं समुपचक्रमे ॥८२॥ मृकण्डुरुवाच । नमः परेशाय परात्मरूपिणे परात्परस्मात्परतः पराय ॥८३॥ अपारपाराय परानुकर्वे नमः परेभ्यः परपारगाय । यो नामजात्यादिविकल्पहीनः शब्दादिदोषव्यतिरेकरूपः ॥८४॥ बहु स्वरूपोऽपि निरञ्जनो यस्तमीशमीड्यं परमं भजामि । वेदान्तवेद्यं पुरुषं पुराणं हिरण्यगर्भादिजगत्स्वरूपम् ॥८५॥ अनूपमं भक्तिजनानुकम्पिनं भजामि सर्वेश्वरमादिमीड्यम् । पश्यन्ति यं वीतसमस्तदोषा ध्यानैकनिष्ठा विगतस्पृहाश्च ॥८६॥ निवृत्तमोहाः परमं पवित्रं नतोऽस्मि संसारनिवर्त्तकं तम् स्मृतार्तिनाशनं विष्णुं शरणागतपालकम् । जगत्सेव्यं जगद्धाम परेशं करुणाकरम् ॥८७॥ शान्त होकर यहाँ से जाओ । वह मुनि कथमपि तुम लोगों को कष्ट नहीं पहुँचायेंगे । मैं आप देवों का रक्षक हूँ । आप सुखपूर्वक विहार कीजिए । यह वर देकर अलसी के पुष्प के समान कान्तिमान् भगवान् देवों के देखते ही देखते अन्तर्हित हो गये । सुरगण भी भगवान् का आश्वासन पाकर प्रसन्न हो गये और जहाँ से आये थे उसी स्वर्ग लोक को लौट गए । भगवान् विष्णु भी मृकण्डु की तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए । उस अरूप, परम ब्रह्म, स्वप्रकाश, निरंजन, पीताम्बर, अलसी पुष्प के समान नील वर्ण, अच्युत और दिव्य शस्त्रधारी भगवान् को देखकर मुनि विस्मित हो गए । ध्यान से विरत होकर जब उन्होंने आंख खोली तो सामने प्रसन्नमुख, शान्त, धाता और अत्यन्त तेजस्वी भगवान् को देखा । देखते ही उनको आनन्द से रोमाञ्च हो गया । नेत्रों से आनन्द की अश्रुधार बह चली । सनातन देवाधिदेव हरि को दण्डवत् प्रणाम किया । आनन्दातिरेक से निकली हुई अश्रुधार से भगवान् के युगल- चरण को धोते हुए, शिर पर अञ्जलि बाँधकर स्तुति करने लगे ॥७४-८२॥ मृकण्डु बोले—परेश, परात्मरूपी, पर-से-पर और उस परात्पर से पर को नमस्कार है, अपार संसार से परे रहने वाले, पर का अनुकरण करने वाले या दूसरों पर अनुग्रह करने वाले तथा दूसरों को संसार-सागर के उस पार पहुँचा देने वाले को नमस्कार है । जो नाम (संज्ञा) जाति आदि विविधताओं (उपाधियों) से रहित, शब्द आदि दोषों से शून्य रूप वाले (शब्दाबोध्य) तथा बहुस्वरूप होते हुए भी निरंजन है, उस पूज्य ईश की स्तुति करता हूँ । वेदान्त वेद्य, पुराण पुरुष, हिरण्यगर्भ, जगत् के आदि स्वरूप (कारण), अनुपम, भक्तों पर कृपा करने वाले पूज्य सर्वेश्वर को नमस्कार है ॥८३-८५॥ जिस परम पवित्र तथा संसार की माया को दूर करने वाले को समस्त दोषों से शून्य, ध्यानपरायण और निःस्पृह साधक देखते हैं, उस ४-ना० पु०

नारदीयपुराणम् २६ एवं स्तुतः स भगवान्विष्णुस्तेन महर्षिणा । अवाप परमां तृप्तिं शङ्खचक्रगदाधरः ॥८८॥ अथालिङ्ग्य मुनिं देवश्चतुर्भिर्दीर्घबाहुभिः । उवाच परमं प्रीत्या वरं वरय सुव्रत ॥८९॥ प्रीतोऽस्मि तपसा तेन स्तोत्रेण च तवानघ । मनसा यदभिप्रेतं वरं वरय सुव्रत ॥९०॥ मृकण्डुरुवाच देवदेव जगन्नाथ कृतार्थोऽस्मि न संशयः । त्वद्दर्शनमपुण्यानां दुर्लभं च यतः स्मृतम् ॥९१॥ ब्रह्माद्या यं न पश्यन्ति योगिनः संशितव्रताः । धर्मिष्ठा दीक्षिताश्चापि वीतरागा विमत्सराः ॥९२॥ तं पश्यामि परं धाम किमतोऽन्यं वरं वृणे । एतेनैव कृतार्थोऽस्मि जनार्दन जगद्गुरो ॥९३॥ यन्नामस्मृतिमात्रेण महापातकिनोऽपि ये । तत्पदं परमं यान्ति ते दृष्ट्वा किमुताच्युत ॥९४॥ श्रीभगवानुवाच सत्यमुक्तं त्वया ब्रह्मन्त्रीतोऽस्मि तव पण्डित । मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद्भविष्यति ॥९५॥ विष्णुर्भक्तकुटुम्बीति वदन्ति विबुधाः सदा । तदेव पालयिष्यामि मज्जनो नानृतं वदेत् ॥९६॥ तस्मात्त्वत्तपसा तुष्टो यास्यामि तव पुत्रताम् । समस्तगुणसंयुक्तो दीर्घजीवी स्वरूपवान् ॥९७॥ मम जन्म कुले यस्य तत्कुलं मोक्षगामि वै । मयि तुष्टे मुनिश्रेष्ठ किमसाध्यं जगत्त्रये ॥९८॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशो मुनेस्तस्य समीक्षतः । अंतर्दधे मृकण्डुश्च तपसः समवर्तत ॥९९॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे भक्तिवर्णनप्रसङ्गेन मार्कण्डेयचरितारम्भो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ जगत्सेव्य, जगत् के आश्रय दाता, परेश, करुणासागर, भक्तजनों की पीड़ा हरने वाले और शरणागत-रक्षक विष्णु की मैं स्तुति करता हूँ । शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् विष्णु महर्षि की ऐसी स्तुति सुनकर परम प्रसन्न हो गए । अपनी चारों भुजाओं से मुनि को हृदय से लगाकर भगवान् प्रसन्नतापूर्वक बोले—'सुव्रत ! वर माँगो । अनघ ! तुम्हारी इस तपस्या और मोहिनी स्तुति से प्रसन्न हूँ । सुव्रत ! तुम्हारी जो कुछ मनःकामना हो माँगो ॥८६-९०॥ मृकण्डु बोले—देवदेव ! जगन्नाथ ! मैं कृतार्थ हो गया, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं; क्योंकि आपका दर्शन पुण्यहीनों के लिये दुर्लभ कहा गया है । जिसको ब्रह्मा आदि देव, व्रतनिष्ठ, योगी, धर्मप्रेमी, दीक्षित (यज्ञ-दीक्षित) वीतराग और विमत्सर नहीं देख पाते हैं, उस परम पुरुष को आज नेत्रों के सामने पा रहा हूँ । इससे बढ़कर और क्या वर मागूँ ? जगद्गुरो ! जनार्दन ! इतने से ही मैं कृतार्थ हूँ । अच्युत ! जिसके नाम स्मरण मात्र से महापापी भी उस परम पद को पा जाते हैं, उसको देखकर भी कौन-सी अतिरिक्त वस्तु माँगी जाय ॥९१-९४॥ श्री भगवान् बोले—ब्रह्मन् ! तुमने उचित कहा । पंडित ! मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ; मेरा दर्शन कभी विफल नहीं होता है । विष्णु भक्तों के कुटुम्बी हैं, ऐसा देवता या पंडित जन कहा करते हैं । मैं भी उसी कथन को सत्य प्रमाणित करूँगा; क्योंकि मेरे प्रियजन कभी भी असत्य नहीं बोलते । अतएव तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न मैं तुम्हारा वह पुत्र बनूँगा, जो समस्त गुणों से युक्त, रूपवान् और दीर्घजीवी होगा । मेरा जन्म जिस कुल में होगा वह कुल तो अनायास मोक्ष प्राप्त करेगा । मुनिश्रेष्ठ ! मेरे प्रसन्न हो जाने पर इस त्रिलोकी में कौन-सा पदार्थ अप्राप्य और कौन-सा कार्य असाध्य है ? यह कहकर देवदेवेश हरि मृकण्डु मुनि के सक्षम ही अन्तर्धान हो गए और मुनि भी तपस्या में लग गए ॥९५-९६॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग-प्रथमपाद-भक्तिवर्णनप्रसंग में मार्कण्डेयचरितारम्भ नामक चौथा अध्याय समाप्त ॥४॥

पञ्चमोऽध्यायः नारद उवाच ब्रह्मन्कथं स भगवान्मृकण्डोः पुत्रतां गतः । किं चकार च तद्ब्रूहि हरिर्भार्गववंशजः ॥१॥ श्रूयते च पुराणेषु मार्कण्डेयो महामुनिः । अपश्यद्वैष्णवीं मायां चिरंजीव्यस्य संप्लवे ॥२॥ सनक उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि कथामेतां सनातनीम् । विष्णुभक्तिसमायुक्तां मार्कण्डेयमुनिं प्रति ॥३॥ तपसोऽन्ते मृकण्डुस्तु भार्यामुद्वाह्य सत्तमः । गार्हस्थ्यमकरोद्धृष्टः शान्तो दान्तः कृतार्थकः ॥४॥ तस्य भार्या शुचिर्दक्षा नित्यं पतिपरायणा । मनसा वचसा चापि देहेन च पतिव्रता ॥५॥ काले दधार सा गर्भं हरितेजोऽंशसंभवम् । सुषुवे दशमासान्ते पुत्रं तेजस्विनं परम् ॥६॥ स ऋषिः परमप्रीतो दृष्ट्वा पुत्रं सुलक्षणम् । जातकं कारयामास मङ्गलं विधिपूर्वकम् ॥७॥ स वालो ववृधे तत्र शुक्लपक्ष इवोडुपः । ततस्तु पञ्चमे वर्षे उपनीय मुदान्वितः ॥८॥ शिक्षां चकार विप्रेन्द्र वैदिकीं धर्मसंहिताम् । नमस्कार्या द्विजाः पुत्र सदा दृष्ट्वा विधानतः ॥६॥ त्रिकालं सूर्यमभ्यर्च्य सलिलाञ्जलिदानतः । वैदिकं कर्म कर्तव्यं वेदाध्ययनपूर्वकम् ॥१०॥

अध्याय ५ मार्कण्डेय मुनि की कथा

नारद बोले—ब्रह्मन् ! क्यों भगवान् हरि मृकण्डु के पुत्र हुए ? भार्गव-वंश में पुत्र रूप से जन्म लेकर क्या किया ? इस बात को कहिए । पुराणों में ऐसा सुना जाता है कि मुनि मार्कण्डेय ने प्रलय काल में चिरजीवी विष्णु की माया का प्रत्यक्ष दर्शन किया था ॥१-३॥ सनक बोले—नारद ! मार्कण्डेय मुनि से सम्बन्ध रखने वाली, विष्णुभक्ति से ओत-प्रोत उस सनातन कथा को अब कह रहा हूँ सुनो । उस घोर तपस्या के बाद प्रसन्न, शान्त और उदार मृकण्डु मुनि ने विवाह किया और कृतार्थ होकर भार्या के साथ गृहस्थ जीवन बिताने लगे । उनकी भार्या पवित्र, कुशल और नित्य पति सेवा में लगी रहती थी, शरीर, मन और वचन से भी वह पतिव्रता थी । कुछ समय बाद उसने विष्णु कलांश से युक्त गर्भ धारण किया और दसवें महीने के अन्त में परम तेजस्वी पुत्र को उत्पन्न किया । ऋषि उस सर्व-लक्षण-सम्पन्न पुत्र को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और विधि पूर्वक मांगलिक जातक संस्कार किया ॥४-७॥ वह बालक शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भाँति दिनानुदिन बढ़ने लगा । इसके बाद पाँचवें वर्ष में यज्ञोपवीत संस्कार कर प्रसन्न चित्त से उस बालक को वैदिक धर्म संहिता की शिक्षा देने लगे कि पुत्र ! द्विज को देखकर सर्वदा विधिपूर्वक नमस्कार करना चाहिये । तीनों काल सूर्य को सूर्यार्घ्य देकर वेदाध्ययन पूर्वक वैदिक कर्म करना चाहिये । ब्रह्मचर्य और तपस्या

२८ नारदीयपुराणम् ब्रह्मचर्येण तपसा पूजनीयो हरिः सदा । निषिद्धं वर्जनीयं स्याद्दुष्टसंभाषणादिकम् ॥११॥ साधुभिः सह वस्तव्यं विष्णुभक्तिपरैः सदा । न द्वेषः कस्यचित्कार्यः सर्वेषां हितमाचरेत् ॥१२॥ इज्याध्ययनदानानि सदा कार्याणि ते सुत । एवं पित्रा समादिष्टो मार्कण्डेयो मुनीश्वरः ॥१३॥ चचार धर्मं सततं सदा संचिन्तयन्हरिम् । मार्कण्डेयो महाभागो दयावान्धर्मवत्सलः ॥१४॥ आत्मवान्सत्यसन्धश्च मार्तण्डसदृशप्रभः । वशी शान्तो महाज्ञानी सर्वतत्त्वार्थकोविदः ॥१५॥ तपश्चचार परममच्युतप्रीतिकारणम् । आराधितो जगन्नाथो मार्कण्डेयेन धीमता ॥१६॥ पुराणसंहितां कर्तुं दत्तवान्वरमच्युतः । मार्कण्डेयो मुनिस्तस्मान्नारायण इति स्मृतः ॥१७॥ चिरजीवी महाभक्तो देवदेवस्य चक्रिणः । जगत्येकार्णवीभूते स्वप्रभावं जनार्दनः ॥१८॥ तस्य दर्शयितुं विप्रास्तं न संहृतवान्हरिः । मृकण्डुतनयो धीमान्विष्णुभक्तिसमन्वितः ॥१९॥ तस्मिञ्जले महाघोरे स्थित्वाञ्जीर्णपत्रवत् । मार्कण्डेयः स्थितस्तावद्यावच्छेते हरिः स्वयम् ॥२०॥ तस्य प्रमाणं वक्ष्यामि कालस्य वदतः शृणु । दशभिः पञ्चभिश्चैव निमिषैः परिकीर्तिता ॥२१॥ काष्ठातत्त्रिंशतो ज्ञेया कला पद्मजनन्दन । तत्त्रिंशतः क्षणो ज्ञेयस्तैः षड्भिर्घटिका स्मृता ॥२२॥ तद्द्वयेन मुहूर्त्तः स्याद्दिनं तत्त्रिंशता भवेत् । त्रिंशद्दिनैर्भवेन्मासः पक्षद्वितयसंयुतः ॥२३॥ ऋतुर्मासद्वयेन स्यात्तत्त्रयेणायनं स्मृतम् । तद्द्वयेन भवेदब्दः स देवानां दिनं भवेत् ॥२४॥ उत्तरं दिवसं प्राहु रात्रिवे दक्षिणायनम् । मानुषेणैव मासेन पितॄणां दिनमुच्यते ॥२५॥ तस्मात्सूर्येन्दुसंयोगे ज्ञातव्यं कल्पमुत्तमम् । दिव्यैर्वर्षसहस्रै द्वादशभिर्दैवतं युगम् ॥२६॥ दैवे युगसहस्रे द्वे ब्राह्मः कल्पौ तु तौ नृणाम् । एकसप्ततिसंख्यातैर्दिव्यैर्मन्वन्तरं युगैः ॥२७॥ से हरि की सर्वदा पूजा करनी चाहिए। कटुभाषण आदि निषिद्ध कर्म सर्वथा वर्ज्य हैं । विष्णुभक्तिपरायण साधुओं की संगति करनी चाहिए। किसी से द्वेष नहीं करना चाहिए; प्रत्युत सर्वहित साधन में लीन रहना चाहिए ॥८-१२॥ पुत्र ! यज्ञ, अध्ययन और दान आदि शुभ कर्म सर्वदा करना चाहिए । पिता से इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर मुनीश्वर मार्कण्डेय सर्वदा हरि का ध्यान करते हुए धर्माचरण करते थे । महाभाग्यशाली, दयावान्, धर्मवत्सल, आत्मज्ञ, सत्यव्रत, सूर्य के समान तेजस्वी, जितेन्द्रिय, शान्त, महाज्ञानी और सब तत्त्वों को जानने वाले मार्कण्डेय भगवान् अच्युत को प्रसन्न करने की इच्छा से तपस्या करने लगे । धीमान् मार्कण्डेय की आराधना से प्रसन्न होकर अच्युत ने मुनि को पुराण संहिता रचने का वर दिया । इस कारण मुनि मार्कण्डेय नारायण कहे गए और वे देवाधिदेव विष्णु के परम भक्त चिरंजीवी हुए । विप्रो ! जनार्दन हरि ने संसार के एकार्णवाकार हो जाने पर अपना प्रभाव दिखलाने के लिए ही उनका संहार नहीं किया । उस महाभयंकर जल में मृकण्डु-पुत्र विष्णुभक्त, धीमान् मार्कण्डेय जर्जर पत्र के समान वर्तमान रहे । जब तक स्वयं भगवान् हरि सोये रहे तब तक तक मुनि वहाँ उपस्थित थे । उस काल का प्रमाण मैं कह रहा हूँ, उसको सुनो-पंद्रह निमेषों की एक कला कही जाती है ॥१३-२१॥ हे ब्रह्मपुत्र ! तीस काष्ठा की एक कला और तीस कला का एक क्षण होता है । छह क्षणों की एक घटिका और दो घटिका (घड़ी) का एक मुहूर्त्त होता है । तीस मुहूर्त्त का एक दिन और तीस दिन का एक मास होता है जो दो पक्षों कृष्ण और शुक्ल में विभक्त रहता है । दो महीनों का एक ऋतु और तीन ऋतु का एक अयन होता है । दो अयन का एक वर्ष जो देवताओं का एक दिन होता है । उत्तरायण तो देवों का दिन और दक्षिणायन देवों की रात्रि माना जाता है । मानव मास ही पितरों का दिन कहा जाता है । इसलिए सूर्य और चन्द्र के संयोग काल को उत्तम कल्प समझा जाता है । देवों के बारह हजार वर्षों का दैवत युग होता है । चार हजार दैव युग काल में मनुष्यों के दो कल्प होते हैं और इकहत्तर चर्तुयुगी का एक मन्वन्तर होता है

पञ्चमोऽध्यायः २६ चतुर्दशभिरेतैश्च ब्रह्मणो दिवस मुने । यावत्प्रमाणं दिवस तावद्रात्रिः प्रकीर्तिता ॥२८॥ नाशमायाति विप्रेन्द्र तस्मिन्काले जगत्त्रयम् । मानुषेण सहस्रेण यत्प्रमाणं भवेच्छृणु ॥२६॥ चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिवस मुने । तद्वन्मासो वत्सरश्च ज्ञेयस्तस्यापि वेधसः ॥३०॥ परार्द्धद्वयकालस्तु तन्मतेन भवेद्द्विजाः । विष्णोरहस्तु विज्ञेयं तावद्रात्रिः प्रकीर्तिता ॥३१॥ मृकण्डुतनयस्तावत्स्थितः संजीर्णपर्णवत् । तस्मिन्घोरे जलमये विष्णुशक्त्युपबृंहितः ॥ आत्मानं परमं ध्यायन्स्थितवान्हरिसन्निधौ ॥३२॥ अथ काले समायाते योगनिद्राविमोचितः । सृष्टवान्ब्रह्मरूपेण जगदेतच्चराचरम् ॥३३॥ संहृतं तु जलं वीक्ष्य सृष्टं विश्वं मृकण्डुजः । विस्मितः परमप्रीतो ववन्दे चरणौ हरेः ॥३४॥ शिरस्यञ्जलिमाधाय मार्कण्डेयो महामुनिः । तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः सदानन्दैकविग्रहम् ॥३५॥ मार्कण्डेय उवाच सहस्रशिरसं देवं नारायणमनामयम् । वासुदेवमनाधारं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥३६॥ अमेयमजरं नित्यं सदानन्दैकविग्रहम् । अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं प्रणतोऽस्मि दनार्दनम् ॥३७॥ अक्षरं परमं नित्यं विश्वाक्षं विश्वसम्भवम् । सर्वतत्त्वमयं शान्तं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥३८॥ पुराणं पुरुषं सिद्धं सर्वज्ञानैकभाजनम् । परात्परतरं रूपं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥३६॥ परं ज्योतिः परं धाम पवित्रं परमं पदम् । सर्वरूपं परमं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥४०॥ तं सदानन्दचिन्मात्रं पराणां परमं पदम् । सर्वं सनातनं श्रेष्ठं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥४१॥ ।।२२-२७।। चौदह मन्वन्तरों का ब्रह्मा का एक दिन होता है। जितने समय परिमाण का दिन उतने की रात्रि भी होती है । विप्रेन्द्र ! रात्रिकाल में त्रिलोकी का नाश हो जाता है। मानव सहस्र का जो प्रमाण होता है उसको सुनो — मुने ! सहस्र चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है। उसी प्रकार उस ब्रह्मा के मास और वत्सर (वर्ष) का प्रमाण समझना चाहिए ॥२८-३०॥ द्विजो ! इस मत से दो परार्द्ध काल होता है । द्विपरार्द्धकाल विष्णु का एक दिन और उतने ही काल की उनकी रात्रि भी होती है। मृकण्डु-पुत्र विष्णु के रात्रि काल पर्यन्त वहाँ जीर्ण पत्र के समान स्थित रहे । उस घोर एकार्णव में विष्णु शक्तिमान् बनकर परम आत्मतत्त्व का ध्यान करते हुए हरि के समीप रहे । सृष्टि आ जाने पर भगवान् की योगनिद्रा भङ्ग हुई और ब्रह्मारूप से उन्होंने इस चरा- चर जगत् की सृष्टि की। मृकण्डुतनय जल को नष्ट और नूतन विश्व की सृष्टि देखकर विस्मित हो गए, फिर परम प्रसन्न होकर हरिचरणों की वन्दना की। महामुनि मार्कण्डेय शिर पर दोनों हाथों से अञ्जलि बाँधकर सदा आनन्द स्वरूप हरि की अपनी अभीष्ट वाणी से स्तुति करने लगे ॥३१-३५॥ मार्कण्डेय बोले- सहस्र शिर वाले, निर्विकार, नारायण, अनाधार जनार्दनदेव को प्रणाम करता हूँ। अमेय, अजर, नित्य, सदानन्दमय शरीर वाले, अचिन्त्य और तर्कों से न पाने योग्य जनार्दन को नमस्कार करता हूँ । अक्षर, परम, नित्य, विश्वनेत्र, विश्व के कारण, सर्वतत्त्वमय और शान्त जनार्दन को नित्य प्रणाम करता हूँ। पुराण, पुरुष, सिद्ध, सब प्रकार के ज्ञान के एकमात्र आधार, पर से भी श्रेष्ठ रूप वाले जनार्दन को नमस्कार करता हूँ ॥३६-३६॥ परज्योति, परमधाम, पवित्र, परम पद, सर्वरूप (विश्वरूप) और परम जनार्दन को नमस्कार करता हूँ । उस सत् चित् और आनन्द स्वरूप, परों के भी परम पद, सर्व, श्रेष्ठ, सनातन और जनार्दन

३० नारदीयपुराणम् सगुणं निर्गुणं शान्तं मायातीतं सुमायिनम् । अरूपं बहुरूपं तं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥४२॥ यत्र तद्भगवान्विश्वं सृजत्यवति हन्ति च । तमादिदेवमीशानं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥४३॥ परेश परमानन्द शरणागतवत्सल । त्राहि मां करुणासिन्धो मनोतीत नमोऽस्तु ते ॥४४॥ एवं स्तुवन्तं विप्रेन्द्रं मार्कण्डेयं जगद्गुरुम् । उवाच परया प्रीत्या शङ्खचक्रगदाधरः ॥४५॥ श्रीभगवानुवाच लोके भागवता ये च भगवद्भक्तमानसाः । तेषां तुष्टो न सन्देहो रक्षाम्येतांश्च सर्वदा ॥४६॥ अहमेव द्विजश्रेष्ठ नित्यं प्रच्छन्नविग्रहः । भगवद्भक्तरूपेण लोकान्रक्षामि सर्वदा ॥४७॥ मार्कण्डेय उवाच किंलक्षणा भागवता जायन्ते केन कर्मणा । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कौतूहलपरो यतः ॥४८॥ श्रीभगवानुवाच लक्षणं भागवतानां शृणुष्व मुनिसत्तम । वक्तुं तेषां प्रभावं हि शक्यते नाब्दकोटिभिः ॥४९॥ ये हिताः सर्वजन्तूनां गतासूया अमत्सराः । वशिनो निस्पृहाः शान्तास्ते वै भागवतोत्तमाः ॥५०॥ कर्मणा मनसा वाचा परपीडां न कुर्वते । अपरिग्रहशीलाश्च ते वै भागवताः स्मृताः ॥५१॥ सत्कथाश्रवणे येषां वर्तते सात्त्विकी मतिः । तद्भक्तविष्णुभक्ताश्च ते वै भागवतोत्तमाः ॥५२॥ मातापित्रोश्च शुश्रूषां कुर्वन्ति ये नरोत्तमाः । गङ्गाविश्वेश्वरधिया ते वै भागवतोत्तमाः ॥५३॥ ये तु देवार्चनरता ये तु तत्साधकाः स्मृताः । पूजां दृष्ट्वानुमोदन्ते ते वै भागवतोत्तमाः ॥५४॥ व्रतिनां च यतीनां च परिचर्यापराश्च ये । वियुक्तपरनिन्दाश्च ते वै भागवतोत्तमाः ॥५५॥ नमस्कार करता हूँ । सगुण, निर्गुण, शान्त, मायातीत, अतिमायापटु, अरूप और बहुरूप उस जनार्दन को प्रणाम करता हूँ । वे भगवान् जिन तीन रूपों में अपने को विभक्त कर विश्व की सृष्टि, रक्षा और संहार करते हैं, उन आदि ईशान देव को नमस्कार करता हूँ । परेश ! परमानन्द ! शरणागतवत्सल ! करुणासिन्धु ! मेरी रक्षा करो । मन से परे ! आपको नमस्कार करता हूँ । इस प्रकार स्तुतिपरायण, जगद्गुरु, विप्रेन्द्र, मार्कण्डेय से शङ्ख, चक्र और गदाधारी विष्णु प्रसन्नतापूर्वक बोले- भगवान् बोले- इस लोक में जो भगवान् के भक्त तथा भगवद्भक्तों के प्रेमी हैं, उनसे प्रसन्न रहता हूँ और सर्वदा उनकी रक्षा करता हूँ, इसमें सन्देह नहीं । द्विजश्रेष्ठ ! मैं ही नित्य प्रच्छन्न शरीर होकर भगवद्भक्त के रूप से लोगों की सर्वदा रक्षा करता हूँ ॥४०-४७॥ मार्कण्डेय बोले-भागवतों के क्या लक्षण हैं ? किन शुभ कर्मों से वे भक्त उत्पन्न होते हैं ? इन बातों को सुनने की इच्छा हो रही है, क्योंकि मेरे हृदय में महान् कौतूहल है ॥४८॥ श्रीभगवान् बोले- मुनिवर्य ! भागवतजनों के लक्षण सुनो । उनके प्रभाव का वर्णन वस्तुतः कोटि वर्षों में भी सम्भव नहीं है। जो सब प्राणियों के हित में लगे रहते, जो ईर्ष्या-मात्सर्य-रहित, जितेन्द्रिय, निःस्पृह और शान्त होते हैं, वे ही परम भागवत हैं जो मन, वचन और कर्म से दूसरे को पीड़ा नहीं पहुँचाते, जो परिग्रह शील (संचयशील) नहीं हैं वे ही भागवत कहे गये हैं। जिसकी सात्त्विक भावना सर्वदा सत्कथाओं के सुनने में लगी रहती है, जो विष्णु-भक्त और भक्तों के प्रेमी हैं वे निश्चय ही परम भागवत हैं ॥४६-५२॥ जो नरपुंगव माता पिता की शुश्रूषा में उनको गंगा और विश्वेश्वर समझकर तल्लीन रहते हैं वे ही परम भागवत हैं। जो देवार्चन में सदा रत रहते हैं, जो उनकी पूजा के समर्थक हैं और भगवदर्चा को देखकर सदा उसका समर्थन और सराहना करते हैं वे ही परम भागवत हैं। जो व्रतपरायण और यतिजनों की सेवा में लगे रहते हैं और पर निन्दा से सर्वथा

पञ्चमोऽध्यायः ३१ सर्वेषां हितवाक्यानि ये वदन्ति नरोत्तमाः । ये गुणग्राहिणो लोके ते वै भागवताः स्मृताः ॥५६॥ आत्मवत्सर्वभूतानि ये पश्यंति नरोत्तमाः । तुल्याः शत्रुबु मित्रेषु ते वै भागवतोत्तमाः ॥५७॥ धर्मशास्त्रप्रवक्तारः सत्यवाक्यरताश्च ये । सतां शुश्रूषवो ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥५८॥ व्याकुर्वते पुराणानि तानि शृण्वन्ति ये तथा । तद्वक्तरि च भक्ता ये ते वै भागवतोत्तमाः ॥५९॥ ये गोब्राह्मणशुश्रूषां कुर्वते सततं नराः । तीर्थयातापरा ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६०॥ अन्येषामुदयं दृष्ट्वा येऽभिनन्दन्ति मानवाः । हरिनामपरा ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६१॥ आरामारोपणरतास्तडागपरिरक्षकाः । कासारकूपकर्त्तारस्ते वै भागवतोत्तमाः ॥६२॥ ये वै तडागकर्त्तारो देवसद्मानि कुर्वते । गायत्रीनिरता ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६३॥ येऽभिनन्दन्ति नामानि हरेः श्रुत्वाऽतिहर्षिताः । रोमाञ्चितशरीराश्च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६४॥ तुलसीकाननं दृष्ट्वा ये नमस्कुर्वते नराः । तत्काष्ठाङ्कितकर्णा ये ते वै भागवतोत्तमाः ॥६५॥ तुलसीगन्धमाघ्राय सन्तोषं कुर्वते तु ये । तन्मूलमृत्तिकां ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६६॥ आश्रमाचारनिरतास्तथैवातिथिपूजकाः । ये च वेदार्थवक्तारस्ते वै भागवतोत्तमाः ॥६७॥ शिवप्रियाः शिवासक्ताः शिवपादार्च्चने रताः । त्रिपुण्ड्रधारिणो ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६८॥ व्याहरन्ति च नामानि हरेः शम्भोर्महात्मनः । रुद्राक्षालङ्कृता ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६९॥ ये यजन्ति महादेवं क्रतुभिर्बहुदक्षिणैः । हरिं वा परया भक्त्या ते वै भागवतोत्तमाः ॥७०॥ विदितानि च शास्त्राणि परार्थं प्रवदन्ति ये । सर्वत्र गुणभाजो ये ते वै भागवताः स्मृताः ॥७१॥ दूर रहते हैं वे उत्तम भागवत हैं। जो नरोत्तम सबके कल्याण के शब्द कहते हैं और जो गुणग्राही हैं वे ही भाग- वतोत्तम हैं। जो सब भूतों (जीवों) में आत्म-भावना रखते हैं, जो शत्रु और मित्र के प्रति समान भाव रखते हैं वे निश्चय ही भागवतोत्तम हैं। जो धर्मशास्त्र के वक्ता, सत्य-भाषण में रत और जो सज्जनों के सेवक हैं वे ही परम भागवत हैं ॥५३-५८॥ जो पुराणों की व्याख्या करते हैं, जो श्रद्धापूर्वक उस व्याख्या को सुनते हैं और जो पुराणोपदेशक में श्रद्धा रखते हैं वे परमभागवत हैं। जो नर गो-ब्राह्मण की सर्वदा शुश्रूषा करते और तीर्थ-यात्रा के प्रेमी होते हैं वे परम भागवत हैं। जो मानव दूसरे के अभ्युदय को देखकर उसका अभिनन्दन करते हैं और हरिनामोच्चारण में तत्पर रहते हैं वे भागवतों में उत्तम हैं। जो उद्यान और वृक्षों को लगाते हैं, जो तड़ागों को लगाते हैं, जो तड़ागों की रक्षा पर ध्यान देते हैं, सरोवर, झील और कुएँ को खुदवाते हैं वे परम भागवत हैं। जो तालाब और देवमन्दिरों को बनवाते और गायत्री जप में तत्पर रहते हैं वे परम भागवत हैं ॥५६-६३॥ जो हरिनाम ध्वनि को सुनकर अति प्रसन्न होते और उस कीर्तन का अभिनन्दन करते एवं आनन्द से पुलकित हो उठते हैं वे परम भागवत हैं। जो मनुष्य तुलसी के उपवन को देखकर नमस्कार करते हैं और तुलसी की माला या काठ को कान में पहनते हैं वे परम भागवत हैं। जो तुलसी के सुगन्ध को सूंघकर प्रसन्नता एवं संतोष व्यक्त करते हैं और तुलसी की जड़ की मिट्टी को शिर चढ़ाते हैं वे भागवतोत्तम हैं जो आश्रमानुकूल आचार में रत रहते हैं, जो अतिथि पूजक और वेदार्थ के व्याख्याता हैं वे भागवतोत्तम हैं। जो शिव के प्रिय, शिव में निष्ठा रखने वाले, शिवचरण चर्चा में निरत और त्रिपुण्ड्रधारी हैं वे परम भागवत हैं जो हरि और महात्मा शम्भु के नाम का उच्चारण करते हैं और रुद्राक्ष माला को सर्वदा धारण करते हैं वे परम भागवत हैं ॥६४-६६॥ जो प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों से महादेव की पूजा करते हैं अथवा परा भक्ति के द्वारा विष्णु की आराधना करते हैं वे परम भागवत हैं। जो शास्त्रों का स्वयं गम्भीरज्ञान रखते हुए दूसरों को उसका उपदेश देते हैं और जो

३२ नारदीयपुराणम् शिवे च परमेशे च विष्णौ च परमात्मनि । समबुद्ध्या प्रवर्त्तन्ते ते वै भागवताः स्मृताः ॥७२॥ शिवाग्निकार्यनिरताः पञ्चाक्षरजपे रताः । शिवध्यानरता ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥७३॥ पानीयदाननिरता येऽन्नदानरतास्तथा । एकादशी व्रतरता ते वै भागवतोत्तमाः ॥७४॥ गोदाननिरता ये च कन्यादानरताश्च ये । मदर्थं कर्म्मकर्त्तारस्ते वै भागवतोत्तमाः ॥७५॥ एते भागवता विप्र केचिदत्र प्रकीर्त्तिताः । मयाऽपि गदितुं शक्या नाब्दकोटिशतैरपि ॥७६॥ तस्मात्त्वमपि विप्रेन्द्र सुशीलो भव सर्वदा । सर्वभूताश्रयो दान्तो मैत्रो धर्म्मपरायणः ॥७७॥ पुनर्युगान्तपर्य्यन्तं धर्म्मं सर्वं समाचरन् । मन्मूर्त्तिध्याननिरतः परं निर्वाणमाप्स्यसि ॥७८॥ एवं मृकंडुपुत्रस्य स्वभक्तस्य कृपानिधिः । दत्त्वा वरं स देवेशस्तत्रैवान्तरधीयत ॥७६॥ मार्कण्डेयो महाभागो हरिभक्तिरतः सदा । चचार परमं धर्ममीजे च विधिवन्मखैः ॥८०॥ शालग्रामे महाक्षेत्रे तताप परमं तपः । ध्यानक्षपितकर्मा तु परं निर्वाणमाप्तवान् ॥८१॥ तस्माज्जन्तुषु सर्वेषु हितकृद्धरिपूजकः । ईप्सितं मनसा यद्यत्तत्तदाप्नोत्यसंशयम् ॥८२॥ सनक उवाच एतत्सर्वं निगदितं त्वया पृष्टं द्विजोत्तम । भगवद्भक्तिमाहात्म्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥८३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे मार्कण्डेयवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ सर्वत्र गुणग्राहक एवं स्वयं गुण के पात्र बनते हैं वे परम भागवत हैं। जो परमेश शिव, और परात्मा विष्णु में सम बुद्धि से आस्था रखते हैं वे निश्चय ही परम भागवत हैं। जो शिव और अग्नि कार्य (यज्ञ) में रत रहते हैं, सर्वदा पंचाक्षर जप में लगे रहते हैं और शिव के ध्यान में निरत रहते हैं वे परम भागवत हैं। जो दूसरों को जल पिलाने में तत्पर रहते, दूसरों को अन्न दान करते हैं और एकादशी का व्रत सर्वदा किया करते हैं वे परम भागवत हैं। जो गोदान करते, कन्यादान करते और भगवदर्पण बुद्धि से प्रत्येक कार्य करते हैं वे परम भागवत हैं ॥७०-७५॥ यहाँ कुछ भागवत पुरुषों का लक्षण कहा गया है; परन्तु वे अनन्त हैं। उनके लक्षणों का कीर्त्तन शत कोटि वर्षों में भी मैं नहीं कर सकता। इसलिए विप्रेन्द्र ! तुम भी सर्वदा सुशील रहो, सब प्राणियों के हितचिन्तक, उदार, मित्र और धर्मपरायण रहो। पुनः युगान्त तक सब धर्मों का पालन करते हुए मेरे रूप के ध्यान में निरत रहो। ऐसा करने से तुम परम मोक्ष पद प्राप्त करोगे ॥७६-७८॥ इस प्रकार अपने परम प्रिय भक्त मृकण्डु-पुत्र को कृपानिधि भगवान् हरि वर प्रदान कर वहीं अन्तर्हित हो गए। महाभाग्यशाली मार्कण्डेय ने सदा हरि भक्ति में निरत रहकर परम धर्म का अनुष्ठान किया और विधि- पूर्वक यज्ञों से भगवान् का भजन किया। फिर उन्होंने महापुण्य क्षेत्र शालग्राम में परम तपस्या करके ध्यान योग से अपने कर्मों का नाश कर अन्त में मोक्ष पद प्राप्त किया। इसलिए अखिल प्राणियों का कल्याण करने वाला तथा हरि की पूजा करने वाला व्यक्ति मन से जो कुछ चाहता है, उसे अवश्य प्राप्त करता है, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं ॥७६-८२॥ सनक बोले—द्विजोत्तम ! आपने जो कुछ पूछा उसके विषय में यह सब बातें कह दीं। अब कौन सा दूसरा माहात्म्य सुनना चाहते हैं, वह पूछिए ॥८३॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग के प्रथमपाद में मार्कण्डेयवर्णन नामक पाँचवां अध्याय समाप्त ॥५॥

षष्ठोऽध्यायः सूत उवाच भगवद्भक्तिमाहात्म्यं श्रुत्वा प्रीतस्तु नारदः । पुनः पप्रच्छ सनकं ज्ञानविज्ञानपारगम् ॥१॥ नारद उवाच क्षेत्राणामुत्तमं क्षेत्रं तीर्थानां च तथोत्तमम् । परया दयया तथ्यं ब्रूहि शास्त्रार्थपारग ॥२॥ सनक उवाच शृणु ब्रह्मन्परं गुह्यं सर्वसंपत्करं परम् । दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं धर्म्यं पापहरं शुभम् ॥३॥ श्रोतव्यं मुनिभिर्नित्यं दुष्टग्रहनिवारणम् । सर्वरोगप्रशमनमायुर्वर्द्धनकारणम् ॥४॥ क्षेत्राणामुत्तमं क्षेत्रं तीर्थानां च तथोत्तमम् । गङ्गायमुनयोर्योगं वदन्ति परमर्षयः ॥५॥ सितासितोदकं तीर्थं ब्रह्माद्याः सर्वदेवताः । मुनयो मनवश्चैव सेवन्ते पुण्यकाङ्क्षिणः ॥६॥ गङ्गा पुण्यनदी ज्ञेया यतो विष्णुपदोद्भवा । रविजा यमुना ब्रह्मंस्तयोर्योगः शुभावहः ॥७॥ स्मृतार्तिनाशिनी गङ्गा नदीनां प्रवरा मुने । सर्वपापक्षयकरी सर्वोपद्रवनाशिनी ॥८॥ यानि क्षेत्राणि पुण्यानि समुद्रान्ते महीतले । तेषां पुण्यतमं ज्ञेयं प्रयागाख्यं महामुने ॥६॥ अध्याय ६ गंगा-माहात्म्य-वर्णन सूत बोले-भगवद्भक्ति की महिमा सुनकर नारद परमानन्दित हुए और पुनः ज्ञान-विज्ञान के पारगामी विद्वान् सनक से पूछने लगे ।१।। नारद बोले- हे शास्त्रों के पारंगत विद्वान् सनक ! जो क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र और तीर्थों में उत्तम तीर्थ है, उसको तथ्यतः कहने की परम कृपा करें ।॥२॥ सनक बोले-ब्रह्मन् ! उस परम गुह्य, सर्वसिद्धिदाता, परमतत्त्व, दुःस्वप्ननाशक, पवित्र, धर्मसम्मत, शुभ और पापनाशक आख्यान को सुनो । ऐसे दुष्टग्रहों के प्रभाव से रक्षा करने वाले, सर्वरोग नाशक तथा आयु बढ़ाने वाले पुनीत आख्यान का श्रवण मुनियों को नित्य प्रति करना चाहिए। क्षेत्रों में परमोत्तम क्षेत्र तथा तीर्थों में परमोत्तम तीर्थ गंगा यमुना का संगम ही है, ऐसा परमर्षिगण स्वीकार करते हैं। उस स्वच्छ और नील जल से सुशोभित तीर्थ की सेवा पुण्य की आकांक्षा करने वाले सब ब्रह्मा आदि देवता, मनुष्य और मुनिवृन्द करते हैं ।॥३-६॥ गंगा शुभ पुण्यप्रद नदी मानी जाती है, क्योंकि वह विष्णु के चरण कमल से निकली हुई है। ब्रह्मन् ! यमुना भी सूर्यतनया है। इस प्रकार ऐसी पुनीत नदियों का संगम अत्यन्त कल्याणदायी है। मुने ! नदियों में परम श्रेष्ठ यह नदी गंगा स्मरण मात्र से सब पापों को भी नष्ट कर देती है और सारे उपद्रवों को ५-ना० पु०

३४ | नारदीयपुराणम् इयाज वेधा यज्ञेन यत्र देवं रमापतिम् । तथैव मुनयः सर्वे चक्रुश्च विविधान्मखान् ॥१०॥ सर्वतीर्थाभिषेकानि यानि पुण्यानि तानि वै । गङ्गाबिन्दुभिषेकस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥११॥ गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद्योजनानां शते स्थितः । सोऽपि मुच्येत पापेभ्यः किमु गङ्गाभिषेकवान् ॥१२॥ विष्णुपदोद्भवा देवी विश्वेश्वरशिरःस्थिता । संसेव्या मुनिभिर्देवैः किं पुनः पामरैर्जनैः ॥१३॥ यत्सैकतं ललाटे तु ध्रियते मनुजोत्तमैः । तत्रैव नेत्रं विज्ञेयं विध्वदर्धाधः समुज्ज्वलत् ॥१४॥ यन्मज्जनं महापुण्यं दुर्लभं त्रिदिवौकसाम् । सारूप्यदायकं विष्णोः किमस्मात्कथ्यते परम् ॥१५॥ यत्र स्नाताः पापिनोऽपि सर्वपापविवर्जिताः । महद्विमानमारूढाः प्रयान्ति परमं पदम् ॥१६॥ यत्र स्नाता महात्मानः पितृमातृकुलानि वै । सहस्राणि समुद्धृत्य विष्णुलोके व्रजन्ति वै ॥१७॥ स स्नातः सर्वतीर्थेषु यो गङ्गां स्मरति द्विज । पुण्यक्षेत्रेषु सर्वेषु स्थितवान्नात्र संशयः ॥१८॥ यत्र स्नातं नरं दृष्ट्वा पापोऽपि स्वर्गभूमिभाक् । मदङ्गस्पर्शमात्रेण देवानामिधिपो भवेत् ॥१९॥ तुलसीमूलसंभूता द्विजपादोद्भवा तथा । गङ्गोद्भवा तु मृल्लोकान्नयत्यच्युतरूपताम् ॥२०॥ गङ्गा च तुलसी चैव हरिभक्तिरचञ्चला । अत्यन्तदुर्लभा नृणां भक्तिस्तद्धर्मप्रवक्तरि ॥२१॥ सद्धर्मवक्तुः पदसंभवा मृदं गङ्गोद्भवां चैव तथा तुलस्याः ॥ मूलोद्भवां भक्तियुतो मनुष्यो धृत्वा शिरस्येति पदं च विष्णोः ॥२२॥ कदा यास्याम्यहं गङ्गां कदा पश्यामि तामहम् । वाञ्छत्यपि च यो ह्येवं सोऽपि विष्णुपदं व्रजेत् ॥२३॥ गङ्गाया महिमा ब्रह्मन्वक्तुं वर्षशतैरपि । न शक्यते विष्णुनापि किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥२४॥ दूर हटा देती है । महामुनि ! समुद्रान्त पृथ्वी तल पर जितने पुण्य क्षेत्र विद्यमान हैं उनमें यह प्रयाग नामक तीर्थ अत्यन्त पुण्यतम है; जहाँ स्वयं ब्रह्मा ने यज्ञ से रमापति हरि का यजन किया और उसी के अनुसार जहाँ मुनियों ने विविध यज्ञों को सम्पन्न किया ॥७-१०॥ सब तीर्थों के स्नान से जो कुछ पुण्य होते हैं वे सभी पुण्य इस प्रयागवाहिनी गंगा के अभिषेकजन्य पुण्य के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं है । जो सैकड़ों योजन दूर रह कर भी गंगा ! गंगा ! उच्चारण करता है वह भी पापों से मुक्त हो जाता है । तब जो व्यक्ति इसके जल में डुबकी लगाते हैं उनके विषय में तो कहना ही क्या । विष्णु के चरणों से निकलने वाली और शंकर की जटा में रहने वाली इस पुण्य गंगा देवी की सेवा मुनि और देवता भी करते हैं, पुनः पामरजनों की क्या गणना है। जो मानवपुङ्गव गंगा की वालुका को ललाट पर लगाते हैं वह मानों वहीं (उनके ललाट पर) भासमान अर्ध चन्द्र है । जिसका स्नान महापुण्यदायक तथा देवदुर्लभ विष्णु का सारूप्य पद प्रदान कर देता है इससे बढ़कर उसकी महिमा का क्या बखान किया जा सकता है ॥११-१५॥ जिस प्रयाग में स्नान करने से पापी भी सब पापों से मुक्त होकर महान् विमान पर चढ़कर परम पद को प्राप्त कर लेते हैं, जहाँ स्नान कर महात्मागण अपने माता-पिता के भी सहस्रों पीढ़ियों का उद्धार कर विष्णु लोक में चले जाते हैं उसके विषय में क्या कहा जाय ! द्विज ! जो गंगा का स्मरण करता है मानों उसने सब तीर्थों में स्नान कर लिया और निःसन्देह सब पुण्य क्षेत्रों में उसने निवास कर लिया ॥१६-१८॥ उस प्रयाग में स्नान करने वाले मनुष्य को देखकर पापी भी स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है, उसके शरीर के स्पर्शमात्र से मनुष्य देवों का स्वामी इन्द्र बन जाता है । तुलसी के मूल की मिट्टी, ब्राह्मणों की चरणरेणु और गंगा की मिट्टी मनुष्य को विष्णु-सारूप्य प्रदान करती है ॥१९-२०॥ गंगा, तुलसी, अच्युतचरणों में अचल भक्ति और धर्मोपदेशकों में श्रद्धा मानव के लिए दुर्लभ है । मनुष्य सद्धर्मोपदेशकों के चरण की धूलि, गंगा की वालुका और तुलसी के मूल की मिट्टी को शिर पर चढ़ाकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है । मैं कब गंगा के समीप जाऊँगा, कब गंगा का दर्शन करूँगा, ऐसी जो इच्छा करता है वह भी विष्णु-पद को प्राप्त करता है । ब्रह्मन् ! गंगा की महिमा स्वयं विष्णु भी सौ वर्षों में वर्णन नहीं कर सकते,

षष्ठोऽध्यायः [पृ. ३५]

अहो माया जगत्सर्वं मोहयत्येतदद्भुतम् । यतो वै नरकं यान्ति गङ्गानाम्नि स्थितेऽपि हि ॥२५॥ संसारदुःखविच्छेदि गङ्गानाम प्रकीर्तितम् । तथा तुलस्या भक्तिश्च हरिकीर्तिप्रवक्तरि ॥२६॥ सकृद्यद्युच्चरेद्यस्तु गङ्गेत्येवाक्षरद्वयम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥२७॥ योजनत्रितयं यस्तु गङ्गायामधिगच्छति । सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोकं समेति हि ॥२८॥ सेयं गङ्गा महापुण्या नदी भक्त्या निषेविता । मेषतौलिमृगाङ्केषु पावयत्यखिलं जगत् ॥२९॥ गोदावरी भीमरथी कृष्णा रेवा सरस्वती । तुङ्गभद्रा च कावेरी कालिन्दी बाहुदा तथा ॥३०॥ वेत्रवती ताम्रपर्णी सरयूश्च द्विजोत्तम । एवमादिषु तीर्थेषु गङ्गा मुख्यतमा स्मृता ॥३१॥ यथा सर्वगतो विष्णुर्जगद्व्याप्य प्रतिष्ठितः । तथेयं व्यापिनी गङ्गा सर्वपापप्रणाशिनी ॥३२॥ अहो गङ्गा जगद्धात्री स्नानपानादिभिर्जगत् । पुनाति पावनीत्येषा न कथं सेव्यते नृभिः ॥३३॥ तीर्थानामुत्तमं तीर्थं क्षेत्राणां क्षेत्रमुत्तमम् । वाराणसीति विख्यातं सर्वदेवनिषेवितम् ॥३४॥ त एव श्रवणे धन्ये संविदाते बहुश्रुतम् । इह श्रुतिमंतां पुंसां काशी याभ्यां श्रुताऽसकृत् ॥३५॥ ये यं स्मरन्ति संस्थानमविमुक्तं द्विजोत्तमम् । निर्धूतसर्वपापास्ते शिवलोकं व्रजन्ति वै ॥३६॥ योजनानां शतस्थोऽपि अविमुक्तं स्मरेद्यदि । बहुपातकपूर्णोऽपि पदं गच्छत्यनामयम् ॥३७॥ प्राणप्रयाणसमये योऽविमुक्तं स्मरेद्विज । सोऽपि पापविनिर्मुक्तः शैवं पदमवाप्नुयात् ॥३८॥ काशीस्मरणजं पुण्यं भुक्त्वा स्वर्गे तदन्ततः । पृथिव्यामेकराड् भूत्वा काशीं प्राप्य च मुक्तिभाक् ॥३९॥ बहुनात्र किमुक्तेन वाराणस्या गुणान्प्रति । नामापि गृह्णतां काश्याश्चतुर्वर्गो न दूरतः ॥४०॥

इस विषय में अधिक क्या कहा जाय ! अहो ! यह आश्चर्य की बात है कि माया संसार को मोह लेती है और ऐसी परम पुनीत गंगा के नाम रहते हुए भी लोग नरक में गिरते हैं। गंगा का नामोच्चारण संसार के दुःखों का नाश करने वाला है। इसी प्रकार वैष्णवों को तुलसी की भक्ति भी संसार से मुक्त कर देती है। जो एक बार भी गंगा इन दो अक्षरों का उच्चारण करता है वह सब पापों से छूट कर विष्णु लोक को चला जाता है ॥२१-२८॥ जो गंगा के प्रवाह में तीन योजन तक जाता है वह पाप मुक्त होकर सूर्य लोक को चला जाता है। मेष, तुला और सिंह के संक्रान्ति-काल में यदि भक्तिपूर्वक महापुण्यदायिनी गंगा की सेवा (स्नान या कल्पवास) की जाय तो वह अखिल लोक के पाप को दूर कर देती है। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, नर्मदा, सरस्वती, तुङ्गभद्रा, कावेरी, अति पुण्यशीला यमुना, वेत्रवती (बेतवा), ताम्रपर्णी, सरयू आदि तीर्थों में गंगा मुख्य तीर्थ है। जिस प्रकार भगवान् विष्णु व्यापक होने के कारण सर्वत्र स्थित हैं उसी प्रकार यह त्रिभुवनपावनी गंगा सब पापों को नष्ट करने वाली है। अहो ! गंगा जगन्माता है। इसमें स्नान और इसके जल का पान करने से यह पावनी संसार को पवित्र कर देती है तो ऐसी गंगा की सेवा लोग क्यों नहीं करते ? सब देवों का एकमात्र वासस्थान वाराणसी पुरी सम्पूर्ण तीर्थों में उत्तम तीर्थ, सब क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र प्रसिद्ध है ॥२६-३४॥ उस काशी का नाम सुनने वालों के कान ही धन्य हैं जिनके द्वारा काशी का नाम बहुत बार सुना गया है। जो इस अविमुक्त परम तीर्थ वाराणसी क्षेत्र का स्मरण करते हैं वे सब पापों से मुक्त होकर शिवलोक को चले जाते हैं। जो सौ योजन दूर रहकर भी उस अविमुक्त क्षेत्र का स्मरण करते हैं वे अनगिनत पापों से युक्त होते हुए भी परमशाश्वत पद को प्राप्त करते हैं। द्विज ! मृत्यु के समय भी जो अविमुक्त क्षेत्र का स्मरण करता है वह भी पापों से छुटकारा पाकर शिवलोक को चला जाता है। ॥३५-३६॥ वह काशी स्मरण के कारण प्राप्त पुण्यों का स्वर्ग में उपभोग कर पुनः उसके क्षीण हो जाने पर पृथ्वी का एक छत्रपति सम्राट् होता है और पुनः काशी का दर्शन कर मुक्ति प्राप्त करता है। अथवा वाराणसी की महिमा या गुणवर्णन के विषय में अधिक क्या कहा जाय, केवल काशी के नाम स्मरण से भी चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) दूर या दुर्लभ नहीं रह जाता।

३६ नारदीयपुराणम् गङ्गायमुनयोर्योगोऽधिकः काश्या अपि द्विज । यस्य दर्शनमात्रेण नरा यान्ति परां गतिम् ॥४१॥ मकरस्थे रवौ गङ्गा यत्र कुत्रावगाहिता । पुनाति स्नानपानाद्यैर्नयन्तीन्द्रपुरं जगत् ॥४२॥ यो गङ्गां भजते नित्यं शंकरो लोकशंकरः । लिङ्गरूपी कथं तस्या महिमा परिकीर्त्यते ॥४३॥ हरिरूपधरं लिङ्गं लिङ्गरूपधरो हरिः । ईषदप्यन्तरं नास्ति भेदकृच्चानयोः कुधीः ॥४४॥ अनादिनिधने देवे हरिशंकरसंज्ञिते । अज्ञानसागरे मग्ना भेदं कुर्वन्ति पापिनः ॥४५॥ यो देवो जगतामीशः कारणानां च कारणम् । युगान्ते निगदन्त्येतद्रुद्ररूपधरो हरिः ॥४६॥ रुद्रो वै विष्णुरूपेण पालयत्यखिलं जगत् । ब्रह्मरूपेण सृजति प्रान्तेऽस्यैतत्तथं हरः ॥४७॥ हरिशंकरयोर्मध्ये ब्रह्मणश्चापि यो नरः । भेदं करोति सोऽभ्येति नरकं भृशदारुणम् ॥४८॥ हरं हरिं विधातारं यः पश्यत्येकरूपिणम् । स याति परमानन्दं शास्त्राणामेष निश्चयः ॥४९॥ योऽसावनादिः सर्वज्ञो जगतामादिकृद्विभुः । नित्यं संनिहितस्तत्र लिङ्गरूपी जनार्दनः ॥५०॥ काशीविश्वेश्वरं लिङ्गं ज्योतिर्लिङ्गं तदुच्यते । तं दृष्ट्वा परमं ज्योतिराप्नोति मनुजोत्तमः ॥५१॥ काशीप्रदक्षिणा येन कृता त्रैलोक्यपावनी । सप्तद्वीपा सान्धिशैला भूः परिक्रामितामुना ॥५२॥ धातुमृद्दारुपाषाणलेख्याद्या मूर्तयोऽमलाः । शिवस्य वाच्युतस्यापि तासु संनिहितो हरिः ॥५३॥ तुलसीकाननं यत्र यत्र पद्मवनं द्विज । पुराणपठनं यत्र तत्र संनिहितो हरिः ॥५४॥ पुराणसंहितावक्ता हरिरित्यभिधीयते । तद्भक्तिं कुर्वतां नृणां गङ्गास्नानं दिने दिने ॥५५॥ पुराणश्रवणे भक्तिर्गङ्गास्नानसमा द्विज । तद्वक्तरि च या भक्तिः सा प्रयागोपमा स्मृता ॥५६॥


द्विज ! गंगा और यमुना का संगम काशी से भी अधिक पुण्यप्रद है जिसके दर्शनमात्र से मनुष्य परमगति को पा जाता है । ॥३७-४१॥ मकर संक्रान्ति के समय गंगा में जहाँ कहीं भी स्नान, पान करने से सभी मनुष्य पवित्र हो जाते हैं। जो गंगा को नित्य भजता है और लोक कल्याण करने वाले लिङ्ग रूपी शंकर की महिमा का स्मरण करता है उसकी बड़ाई कैसे की जा सकती है। लिङ्ग (शिव) विष्णु रूप हैं और विष्णु शिव लिङ्ग रूप हैं, इन दोनों में कुछ भी अन्तर नहीं है, जो भेद बुद्धि रखता है वह दुर्बुद्धि है। केवल अज्ञान के समुद्र में सर्वदा निमग्न रहने वाले पापी जन ही अनादि अमर हरि और शंकर में भेद बुद्धि रखते हैं। कहा जाता है कि जो देवेश हरि जगत् के स्वामी हैं कारण के भी कारण हैं। वही युगान्तकाल में रुद्र रूप धारण करते हैं। ॥४२-४६॥ रुद्र ही विष्णु रूप से अखिल लोक का पालन करते हैं, ब्रह्मा रूप से इसकी सृष्टि करते हैं और अन्त में इस त्रिलोकी का संहार करते हैं। जो हरि, हर और ब्रह्मा में भेद रखता है वह पापी अत्यन्त घोर नरक में गिरता है। जो हरि, हर और विधाता को एक रूप से देखता है वह परमानन्द को प्राप्त करता है ऐसा शास्त्रों का निर्णय है। जो यह अनादि जगत् का आदि स्रष्टा, सर्वज्ञ, विभु शंकर हैं वह जनार्दन (विष्णु) भी उसी लिङ्ग रूप में सर्वदा सन्निहित रहते हैं ॥४७-५०॥ काशी विश्वेश्वर लिङ्ग को ज्योतिर्लिङ्ग भी कहते हैं, उस लिङ्ग का दर्शन कर श्रेष्ठ मनुष्य परमज्योति लोक को प्राप्त करता है ॥५१॥ जिसने त्रिभुवन पावनी काशी की परिक्रमा करली वह मानो ससागरा और सशैला पृथ्वी की परिक्रमा कर दी। विष्णु और शंकर की मूर्ति चाहे धातु, मिट्टी, लकड़ी या पत्थर किसी भी पदार्थ की हो उसमें विष्णु सर्वदा निवास करते हैं। जहाँ तुलसी कानन है जहाँ कमल वन है अथवा जहाँ पर पुराण पाठ होता है वहाँ भगवान् विष्णु सर्वदा निवास करते हैं। पुराण का वक्ता भी हरि कहा जाता है उसकी भक्ति करने वाला मनुष्य प्रतिदिन गंगा स्नान का फल पाता है। द्विज ! पुराण श्रवण में श्रद्धा रखना गंगा स्नान के समान माना जाता है और पुराण वक्ता में श्रद्धा या भक्ति प्रयाग के समान मानी जाती है। जो महात्मा मोह सागर में निमग्न

३७ षष्ठोऽध्यायः पुराणधर्मकथनैर्यः समुद्धरते जगत् । संसारसागरे मग्नं स हरिः परिकीर्तितः ॥५७॥ नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति मानसमो गुरुः । नास्ति विष्णुसमं देवं नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥५८॥ वर्णानां ब्राह्मणः श्रेष्ठस्तारकाणां यथा शशी । यथा पयोधिः सिंधूनां तथा गङ्गा परा स्मृता ॥५६॥ नास्ति शान्तिसमो बन्धुर्नास्ति सत्यात्परं तपः । नास्ति मोक्षात्परो लाभो नास्ति गङ्गासमा नदी ॥६०॥ गङ्गायाः परं नाम पापारण्यदवानलः । भवव्याधिहरा गङ्गा तस्मात्सेव्या प्रयत्नतः ॥६१॥ गायत्री जाह्नवी चोभे सर्वपापहरे स्मृते । एतयोर्भक्तिहीनो यस्तं विद्यात्पतितं द्विज ॥६२॥ गायत्री छन्दसां माता माता लोकस्य जाह्नवी । उभे ते सर्वपापानां नाशकारण्तां गते ॥६४॥ यस्य प्रसन्ना गायत्री तस्य गङ्गा प्रसीदति । विष्णुशक्तियुते ते द्वे समकामप्रसिद्धिदे ॥६४॥ धर्मार्थकामरूपाणां फलरूपे निरञ्जने । सर्वलोकानुग्रहार्थं प्रवर्तेते महोत्तमे ॥६५॥ अतीव दुर्लभा नृणां गायत्री जाह्नवी तथा । तथैव तुलसीभक्तिर्हरिभक्तिश्च सात्त्विकी ॥६६॥ अहो गङ्गा महाभागा स्मृता पापप्रणाशिनी । हरिलोकप्रदा दृष्टा पीता सारूप्यदायिनी ॥६७॥ यत्र स्नाता नरा यान्ति विष्णोः पदमनुत्तमम् ॥६७॥ नारायणो जगद्धाता वासुदेवः सनातनः । गङ्गास्नानपुराणां तु वाञ्छितार्थफलप्रदः ॥६८॥ गङ्गाजलकणेनापि यः सिक्तो मनुजोत्तमः । सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमं पदम् ॥६६॥ यद्विन्दुसेवनादेव सगरान्वयसम्भवः । विसृज्य राक्षसं भावं संप्राप्तः परमं पदम् ॥७०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्यं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

संसार का पुराणोपदेश द्वारा उद्धार करता है वह हरि रूप कहा जाता है। गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, मान के समान गुरु नहीं, विष्णु के समान कोई देवता नहीं और गुरु से बढ़कर कोई रहस्य या तत्त्व नहीं है ॥५२-५८॥ जिस प्रकार नक्षत्रों में चन्द्रमा, वर्णों में ब्राह्मण और जलाशयों में समुद्र श्रेष्ठ है उसी प्रकार गंगा सब नदियों और तीर्थों में श्रेष्ठ है । जिस प्रकार शान्ति के समान बन्धु नहीं, सत्य से बढ़कर कोई दूसरा तप नहीं, मोक्ष से बढ़कर कोई दूसरा लाभ नहीं उसी प्रकार गंगा के समान कोई नदी नहीं है । गंगा का उत्कृष्ट नाम पाप रूपी वन को भस्म करने के लिए दावाग्नि के समान है और संसार की व्याधियों को नष्ट करने वाली गंगा नदी ही है । अतः मनुष्य को गंगा की आराधना करनी चाहिए । गायत्री और जाह्नवी दोनों पापनाशक मानी जाती हैं । द्विज ! इन दोनों की उपासना से जो विमुख रहता है, उसको पतित समझना चाहिए ॥५६-६२॥ गायत्री छन्दों की माता है और गंगा लोक की माता है । ये दोनों ही लोक के सब पापों को नष्ट करने वाली हैं । जिसके ऊपर गायत्री प्रसन्न है उसके ऊपर गंगा स्वयं प्रसन्न हो जाती है । विष्णु की ये दोनों शक्तियाँ मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं । ये दोनों धर्म, अर्थ और कामरूप फल को देने वाली और निरञ्जन रूप हैं और ये अति उत्तम शक्तियाँ सब लोक के कल्याण के लिए सर्वदा उद्यत रहती हैं ॥६३-६५॥ मनुष्यों के लिए गायत्री और जाह्नवी दोनों अति दुर्लभ हैं । इसी प्रकार तुलसी की भक्ति और विष्णु की सात्त्विक अनन्य भक्ति भी अत्यन्त दुर्लभ है । अहो ! महापुण्यवती गंगा के स्मरण से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । इसके दर्शन से हरि लोक की प्राप्ति होती और गंगाजल के पीने से सारूप्य मुक्ति मिलती है । गंगा में स्नान करने से मनुष्य परमोत्तम विष्णु लोक को प्राप्त करता है । गंगा में नित्य स्नान करने वाले को जगत्पालक सनातन वासुदेव सब प्रकार के अभीष्ट पदार्थ प्रदान करते हैं । जो मनुष्य गंगा जल के एक विन्दु से भो अभिषिक्त होता है वह तत्काल सब प्रकार के पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है । जिसके जल विन्दु के स्पर्श मात्र से ही सगर वंश की साठ सहस्र संतति राक्षस भाव को छोड़कर मुक्त हो गई उसके प्रभाव का वर्णन कैसे किया जा सकता है ॥६६-७०॥ श्रीनारदीयपुराण में गंगा माहात्म्यनामक छंठा अध्याय समाप्त ॥६॥

सप्तमोऽध्यायः नारद उवाच कोऽसौ राक्षसभावाद्धि मोचितः सगरान्वये । सगरः को मुनिश्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥१॥ सनक उवाच शृणुष्व मुनिशार्दूल गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । यज्जलस्पर्शमात्रेण पावितं सागरं कुलम् ॥ गतं विष्णुपदं विप्र सर्वलोकोत्तमोत्तमम् ॥२॥ आसीद्रविकुले जातो बाहुर्नाम वृकात्मजः । बुभुजे पृथिवीं सर्वां धर्मतो धर्मतत्परः ॥३॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये च जन्तवः । स्थापिताः स्वस्वधर्मेषु तेन बाहुर्विशांपतिः ॥४॥ अश्वमेधैरियाजासौ सप्तद्वीपेषु सप्तभिः । अतर्पयद्भूमिदेवान् गोभूस्वर्णांशुकादिभिः ॥५॥ अशासन्नीतिशास्त्रेण यथेष्टं परिपन्थिनः । मेने कृतार्थमात्मानमत्यातपनिवारणम् ॥६॥ चन्दनानि मनोज्ञानि बलिं यत्सर्वदा जनाः । भूषिता भूषणैर्दिव्यैस्तद्राष्ट्रे सुखिनो मुने ॥७॥ अकृष्टपच्यां पृथिवी फलपुष्पसमन्विता ॥८॥ ववर्ष भूमौ देवेन्द्रः काले काले मुनीश्वर । अधर्मनिरताराये प्रजा धर्मेण रक्षिताः ॥६॥ अध्याय ७ गंगा माहात्म्य-वर्णन नारद बोले- मुनिश्रेष्ठ ! सगर के वंश में कौन था जो राक्षस भाव से मुक्त हुआ, सगर कौन थे ? इस आख्यान को कृपा कर मुझसे कहिए ॥१॥ सनक बोले- मुनिशार्दूल ! जिस गंगा के पुनीत जल के स्पर्श मात्र से सगर कुल पवित्र हो गया और विष्णु पद को प्राप्त कर लिया उस गंगा के परमोत्तम माहात्म्य को सुनिए । सूर्य वंश में वृक का पुत्र बाहु नामक राजा उत्पन्न हुआ । इस धार्मिक राजा ने न्याय पूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन किया और अपने बाहु-बल से ब्राह्मण-क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य समस्त प्रजाओं को अपने धर्मों एवं कर्त्तव्यों में लगाया, सातों द्वीपों में सात अश्वमेध यज्ञ किये, ब्राह्मणों को गौ, स्वर्ण, भूमि और वस्त्रदान से संतुष्ट किया एवं अपने शत्रुओं को इच्छानुसार नीति पूर्वक पराजित किया । उसने मनोहर चन्दन वृक्ष के समान दूसरों के कष्ट दूर करने के कारण अपने को कृत-कृत्य समझा । प्रजा सर्वदा उसके मनोन्दुकूल आचरण करती थी । मुने ! उसके राज्य में मनुष्य सर्वदा दिव्य आभूषणों से भूषित और सुखी रहते थे ॥२-७॥ पृथ्वी अनायास अन्न देती और फल पुष्पों से सुशोभित रहती थी । मुनीश्वर ! इन्द्र समय-समय पर पृथ्वी पर वर्षा कर देते थे । प्रत्येक बाधाओं और अन्याय से राजा धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करता था । एक दिन उसके हृदय में सम्पत्ति का नाश करने वाला, राज्य

सप्तमोऽध्यायः ३६ एकदा तस्य भूपस्य सर्वसंपद्विनाशकृत् । अहंकारो महाञ्जज्ञे सासूयो लोपहेतुकः ॥१०॥ अहं राजा समस्तानां लोकानां पालको बली । कर्त्ता महाक्रतूनां च मत्तः पूज्योऽस्ति कोऽपरः ॥११॥ अहं विचक्षणः श्रीमान्जिताः सर्वे मयारयः । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः ॥१२॥ अजेयोऽव्याहतैश्वर्यो मत्तः कोऽन्योऽधिको भुवि । अहंकारवशस्यैवं जातासूया परेष्वपि ॥१३॥ असूयातोऽभवत्कामस्तस्य राज्ञो मुनीश्वर । एषु स्थितेषु तु नरो विनाशं यात्यसंशयम् ॥१४॥ यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता । एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ॥१५॥ तस्यासूया तु महती जाता लोकविरोधिनी । स्वदेहनाशिनी विप्र सर्वसंपद्विनाशिनी ॥१६॥ असूयाविष्टमनसि यदि संपत्प्रवर्त्तते । तुषाग्नि वायुसंयोगमिव जानीहि सुव्रत ॥१७॥ असूयोपेतमनसां दम्भाचारवतां तथा । परुषोक्तिरतानां च सुखं नेह परत्र च ॥१८॥ असूयाविष्टचित्तानां सदा निष्ठुरभाषिणाम् । प्रिया वा तनया वापि बान्धवा अप्यरातयः ॥१९॥ मनोभिलाषं कुरुते यः समीक्ष्य परस्त्रियम् । स स्वसंपद्विनाशाय कुठारो नात्र संशयः ॥२०॥ यः स्वश्रेयोविनाशाय कुर्याच्चेतं नरो मुने । सर्वेषां श्रेयसं दृष्ट्वा स कुर्यान्मत्सरं कुधीः ॥२१॥ मित्रापत्यगृहक्षेत्रधनधान्यपशुष्वपि । हानिमिच्छन्नरः कुर्यादसूयां सततं द्विज ॥२२॥ अथ तस्याविनीतस्य ह्यसूयाविष्टचेतसः । हैहयास्तालजंघाश्च बलिनोऽरातयोऽभवन् ॥२३॥ यस्यानुकूलो लक्ष्मीशः सौभाग्यं तस्य वर्द्धते । स एव विमुखो यस्य सौभाग्यं तस्य हीयते ॥२४॥

सत्ता मिटा देने वाला और ईर्ष्या युक्त अहंकार उत्पन्न हो गया । वह सोचने लगा कि मैं समस्त लोगों का स्वामी हूँ, पालक हूँ और सर्व शक्तिसम्पन्न हूँ, बड़े-बड़े यज्ञों का कर्त्ता हूँ । मुझसे बढ़कर दूसरा कौन पूज्य है ? ॥८-११॥ मैं विद्वान् हूँ श्रीमान् हूँ, सब शत्रुओं को मैंने जीत लिया है, वेद-वेदाङ्गों के तत्त्व को जानने वाला और नीति कुशल मैं ही हूँ । मैं अजेय हूँ समस्त ऐश्वर्य मेरे यहाँ केन्द्रीभूत है । मुझसे बढ़कर इस पृथ्वी पर दूसरा कौन है ? इस प्रकार अहंकार हो जाने पर दूसरों के प्रति भी उसको असूया होने लगी । मुनीश्वर ! इस प्रकार असूया बुद्धि (गुणों में दोषों का देखना) हो जाने पर उस राजा के हृदय में काम (इच्छा) जागरित हो गया । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि इस प्रकार असूया होने पर मनुष्य का नाश अवश्यम्भावी है । युवावस्था, सम्पत्ति, अधिकार मद, अज्ञान इनमें से प्रत्येक अनर्थ की सृष्टि करते हैं । फिर जहाँ ये चारों जुट जाँय वहाँ तो कुछ कहना ही नहीं । उसके हृदय में इस प्रकार की लोकविरोधिनी, स्वदेहनाशिनी और सब सम्पत्तियों को धूल में मिला देने वाली असूया उत्पन्न हो गई ॥१२-१६॥ सुव्रत ! ऐसी असूया रखने वाले व्यक्ति के पास धन हो जाता है तब तो समझो कि तुषाग्नि सुलगती हुई को वायु के झोंक मिल गये । ईर्ष्यालु, दम्भी, और कटुभाषी व्यक्ति को कभी भी लोक और परलोक में सुख नहीं मिलता है । असूया से भरे हृदय वाले और सर्वदा अप्रिय वचन बोलने वाले व्यक्तियों के भाई बन्धु यहाँ तक कि भार्या भी शत्रु हो जाती है । जो दूसरे की स्त्री को देख कर मन में बुरी भावना रखता है वह अपनी संपत्ति नाश का एक मात्र कारण (कुठार) बन जाता है । मुने ! यदि कोई अपने कल्याण का नाश करना चाहे तो वह मूर्ख दूसरों की सम्पत्ति देखकर ईर्ष्या करना सीखे । द्विज ! यदि कोई मित्र, सन्तान, भवन, क्षेत्र, धन, अन्न और पशुओं का नाश चाहता हो तो वह सर्वदा ईर्ष्या करे ॥१७-२२॥ उस राजा की उद्दण्डता और मात्सर्य भाव को देखकर हृदय, ताल जङ्घ आदि बली पड़ोसी राजा शत्रु हो गए । लक्ष्मीपति विष्णु जिसके अनुकूल होते हैं उसकी विभूति बढ़ती है परन्तु वही जिसके प्रतिकूल हो जाते हैं तो उसका सारा वैभव शीघ्र नाशोन्मुख हो जाता है । नारद !