भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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३७ षष्ठोऽध्यायः पुराणधर्मकथनैर्यः समुद्धरते जगत् । संसारसागरे मग्नं स हरिः परिकीर्तितः ॥५७॥ नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति मानसमो गुरुः । नास्ति विष्णुसमं देवं नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥५८॥ वर्णानां ब्राह्मणः श्रेष्ठस्तारकाणां यथा शशी । यथा पयोधिः सिंधूनां तथा गङ्गा परा स्मृता ॥५६॥ नास्ति शान्तिसमो बन्धुर्नास्ति सत्यात्परं तपः । नास्ति मोक्षात्परो लाभो नास्ति गङ्गासमा नदी ॥६०॥ गङ्गायाः परं नाम पापारण्यदवानलः । भवव्याधिहरा गङ्गा तस्मात्सेव्या प्रयत्नतः ॥६१॥ गायत्री जाह्नवी चोभे सर्वपापहरे स्मृते । एतयोर्भक्तिहीनो यस्तं विद्यात्पतितं द्विज ॥६२॥ गायत्री छन्दसां माता माता लोकस्य जाह्नवी । उभे ते सर्वपापानां नाशकारण्तां गते ॥६४॥ यस्य प्रसन्ना गायत्री तस्य गङ्गा प्रसीदति । विष्णुशक्तियुते ते द्वे समकामप्रसिद्धिदे ॥६४॥ धर्मार्थकामरूपाणां फलरूपे निरञ्जने । सर्वलोकानुग्रहार्थं प्रवर्तेते महोत्तमे ॥६५॥ अतीव दुर्लभा नृणां गायत्री जाह्नवी तथा । तथैव तुलसीभक्तिर्हरिभक्तिश्च सात्त्विकी ॥६६॥ अहो गङ्गा महाभागा स्मृता पापप्रणाशिनी । हरिलोकप्रदा दृष्टा पीता सारूप्यदायिनी ॥६७॥ यत्र स्नाता नरा यान्ति विष्णोः पदमनुत्तमम् ॥६७॥ नारायणो जगद्धाता वासुदेवः सनातनः । गङ्गास्नानपुराणां तु वाञ्छितार्थफलप्रदः ॥६८॥ गङ्गाजलकणेनापि यः सिक्तो मनुजोत्तमः । सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमं पदम् ॥६६॥ यद्विन्दुसेवनादेव सगरान्वयसम्भवः । विसृज्य राक्षसं भावं संप्राप्तः परमं पदम् ॥७०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्यं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

संसार का पुराणोपदेश द्वारा उद्धार करता है वह हरि रूप कहा जाता है। गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, मान के समान गुरु नहीं, विष्णु के समान कोई देवता नहीं और गुरु से बढ़कर कोई रहस्य या तत्त्व नहीं है ॥५२-५८॥ जिस प्रकार नक्षत्रों में चन्द्रमा, वर्णों में ब्राह्मण और जलाशयों में समुद्र श्रेष्ठ है उसी प्रकार गंगा सब नदियों और तीर्थों में श्रेष्ठ है । जिस प्रकार शान्ति के समान बन्धु नहीं, सत्य से बढ़कर कोई दूसरा तप नहीं, मोक्ष से बढ़कर कोई दूसरा लाभ नहीं उसी प्रकार गंगा के समान कोई नदी नहीं है । गंगा का उत्कृष्ट नाम पाप रूपी वन को भस्म करने के लिए दावाग्नि के समान है और संसार की व्याधियों को नष्ट करने वाली गंगा नदी ही है । अतः मनुष्य को गंगा की आराधना करनी चाहिए । गायत्री और जाह्नवी दोनों पापनाशक मानी जाती हैं । द्विज ! इन दोनों की उपासना से जो विमुख रहता है, उसको पतित समझना चाहिए ॥५६-६२॥ गायत्री छन्दों की माता है और गंगा लोक की माता है । ये दोनों ही लोक के सब पापों को नष्ट करने वाली हैं । जिसके ऊपर गायत्री प्रसन्न है उसके ऊपर गंगा स्वयं प्रसन्न हो जाती है । विष्णु की ये दोनों शक्तियाँ मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं । ये दोनों धर्म, अर्थ और कामरूप फल को देने वाली और निरञ्जन रूप हैं और ये अति उत्तम शक्तियाँ सब लोक के कल्याण के लिए सर्वदा उद्यत रहती हैं ॥६३-६५॥ मनुष्यों के लिए गायत्री और जाह्नवी दोनों अति दुर्लभ हैं । इसी प्रकार तुलसी की भक्ति और विष्णु की सात्त्विक अनन्य भक्ति भी अत्यन्त दुर्लभ है । अहो ! महापुण्यवती गंगा के स्मरण से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । इसके दर्शन से हरि लोक की प्राप्ति होती और गंगाजल के पीने से सारूप्य मुक्ति मिलती है । गंगा में स्नान करने से मनुष्य परमोत्तम विष्णु लोक को प्राप्त करता है । गंगा में नित्य स्नान करने वाले को जगत्पालक सनातन वासुदेव सब प्रकार के अभीष्ट पदार्थ प्रदान करते हैं । जो मनुष्य गंगा जल के एक विन्दु से भो अभिषिक्त होता है वह तत्काल सब प्रकार के पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है । जिसके जल विन्दु के स्पर्श मात्र से ही सगर वंश की साठ सहस्र संतति राक्षस भाव को छोड़कर मुक्त हो गई उसके प्रभाव का वर्णन कैसे किया जा सकता है ॥६६-७०॥ श्रीनारदीयपुराण में गंगा माहात्म्यनामक छंठा अध्याय समाप्त ॥६॥