बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ नारदीयपुराणम् गङ्गायमुनयोर्योगोऽधिकः काश्या अपि द्विज । यस्य दर्शनमात्रेण नरा यान्ति परां गतिम् ॥४१॥ मकरस्थे रवौ गङ्गा यत्र कुत्रावगाहिता । पुनाति स्नानपानाद्यैर्नयन्तीन्द्रपुरं जगत् ॥४२॥ यो गङ्गां भजते नित्यं शंकरो लोकशंकरः । लिङ्गरूपी कथं तस्या महिमा परिकीर्त्यते ॥४३॥ हरिरूपधरं लिङ्गं लिङ्गरूपधरो हरिः । ईषदप्यन्तरं नास्ति भेदकृच्चानयोः कुधीः ॥४४॥ अनादिनिधने देवे हरिशंकरसंज्ञिते । अज्ञानसागरे मग्ना भेदं कुर्वन्ति पापिनः ॥४५॥ यो देवो जगतामीशः कारणानां च कारणम् । युगान्ते निगदन्त्येतद्रुद्ररूपधरो हरिः ॥४६॥ रुद्रो वै विष्णुरूपेण पालयत्यखिलं जगत् । ब्रह्मरूपेण सृजति प्रान्तेऽस्यैतत्तथं हरः ॥४७॥ हरिशंकरयोर्मध्ये ब्रह्मणश्चापि यो नरः । भेदं करोति सोऽभ्येति नरकं भृशदारुणम् ॥४८॥ हरं हरिं विधातारं यः पश्यत्येकरूपिणम् । स याति परमानन्दं शास्त्राणामेष निश्चयः ॥४९॥ योऽसावनादिः सर्वज्ञो जगतामादिकृद्विभुः । नित्यं संनिहितस्तत्र लिङ्गरूपी जनार्दनः ॥५०॥ काशीविश्वेश्वरं लिङ्गं ज्योतिर्लिङ्गं तदुच्यते । तं दृष्ट्वा परमं ज्योतिराप्नोति मनुजोत्तमः ॥५१॥ काशीप्रदक्षिणा येन कृता त्रैलोक्यपावनी । सप्तद्वीपा सान्धिशैला भूः परिक्रामितामुना ॥५२॥ धातुमृद्दारुपाषाणलेख्याद्या मूर्तयोऽमलाः । शिवस्य वाच्युतस्यापि तासु संनिहितो हरिः ॥५३॥ तुलसीकाननं यत्र यत्र पद्मवनं द्विज । पुराणपठनं यत्र तत्र संनिहितो हरिः ॥५४॥ पुराणसंहितावक्ता हरिरित्यभिधीयते । तद्भक्तिं कुर्वतां नृणां गङ्गास्नानं दिने दिने ॥५५॥ पुराणश्रवणे भक्तिर्गङ्गास्नानसमा द्विज । तद्वक्तरि च या भक्तिः सा प्रयागोपमा स्मृता ॥५६॥
द्विज ! गंगा और यमुना का संगम काशी से भी अधिक पुण्यप्रद है जिसके दर्शनमात्र से मनुष्य परमगति को पा जाता है । ॥३७-४१॥ मकर संक्रान्ति के समय गंगा में जहाँ कहीं भी स्नान, पान करने से सभी मनुष्य पवित्र हो जाते हैं। जो गंगा को नित्य भजता है और लोक कल्याण करने वाले लिङ्ग रूपी शंकर की महिमा का स्मरण करता है उसकी बड़ाई कैसे की जा सकती है। लिङ्ग (शिव) विष्णु रूप हैं और विष्णु शिव लिङ्ग रूप हैं, इन दोनों में कुछ भी अन्तर नहीं है, जो भेद बुद्धि रखता है वह दुर्बुद्धि है। केवल अज्ञान के समुद्र में सर्वदा निमग्न रहने वाले पापी जन ही अनादि अमर हरि और शंकर में भेद बुद्धि रखते हैं। कहा जाता है कि जो देवेश हरि जगत् के स्वामी हैं कारण के भी कारण हैं। वही युगान्तकाल में रुद्र रूप धारण करते हैं। ॥४२-४६॥ रुद्र ही विष्णु रूप से अखिल लोक का पालन करते हैं, ब्रह्मा रूप से इसकी सृष्टि करते हैं और अन्त में इस त्रिलोकी का संहार करते हैं। जो हरि, हर और ब्रह्मा में भेद रखता है वह पापी अत्यन्त घोर नरक में गिरता है। जो हरि, हर और विधाता को एक रूप से देखता है वह परमानन्द को प्राप्त करता है ऐसा शास्त्रों का निर्णय है। जो यह अनादि जगत् का आदि स्रष्टा, सर्वज्ञ, विभु शंकर हैं वह जनार्दन (विष्णु) भी उसी लिङ्ग रूप में सर्वदा सन्निहित रहते हैं ॥४७-५०॥ काशी विश्वेश्वर लिङ्ग को ज्योतिर्लिङ्ग भी कहते हैं, उस लिङ्ग का दर्शन कर श्रेष्ठ मनुष्य परमज्योति लोक को प्राप्त करता है ॥५१॥ जिसने त्रिभुवन पावनी काशी की परिक्रमा करली वह मानो ससागरा और सशैला पृथ्वी की परिक्रमा कर दी। विष्णु और शंकर की मूर्ति चाहे धातु, मिट्टी, लकड़ी या पत्थर किसी भी पदार्थ की हो उसमें विष्णु सर्वदा निवास करते हैं। जहाँ तुलसी कानन है जहाँ कमल वन है अथवा जहाँ पर पुराण पाठ होता है वहाँ भगवान् विष्णु सर्वदा निवास करते हैं। पुराण का वक्ता भी हरि कहा जाता है उसकी भक्ति करने वाला मनुष्य प्रतिदिन गंगा स्नान का फल पाता है। द्विज ! पुराण श्रवण में श्रद्धा रखना गंगा स्नान के समान माना जाता है और पुराण वक्ता में श्रद्धा या भक्ति प्रयाग के समान मानी जाती है। जो महात्मा मोह सागर में निमग्न