भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

षष्ठोऽध्यायः [पृ. ३५]

अहो माया जगत्सर्वं मोहयत्येतदद्भुतम् । यतो वै नरकं यान्ति गङ्गानाम्नि स्थितेऽपि हि ॥२५॥ संसारदुःखविच्छेदि गङ्गानाम प्रकीर्तितम् । तथा तुलस्या भक्तिश्च हरिकीर्तिप्रवक्तरि ॥२६॥ सकृद्यद्युच्चरेद्यस्तु गङ्गेत्येवाक्षरद्वयम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥२७॥ योजनत्रितयं यस्तु गङ्गायामधिगच्छति । सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोकं समेति हि ॥२८॥ सेयं गङ्गा महापुण्या नदी भक्त्या निषेविता । मेषतौलिमृगाङ्केषु पावयत्यखिलं जगत् ॥२९॥ गोदावरी भीमरथी कृष्णा रेवा सरस्वती । तुङ्गभद्रा च कावेरी कालिन्दी बाहुदा तथा ॥३०॥ वेत्रवती ताम्रपर्णी सरयूश्च द्विजोत्तम । एवमादिषु तीर्थेषु गङ्गा मुख्यतमा स्मृता ॥३१॥ यथा सर्वगतो विष्णुर्जगद्व्याप्य प्रतिष्ठितः । तथेयं व्यापिनी गङ्गा सर्वपापप्रणाशिनी ॥३२॥ अहो गङ्गा जगद्धात्री स्नानपानादिभिर्जगत् । पुनाति पावनीत्येषा न कथं सेव्यते नृभिः ॥३३॥ तीर्थानामुत्तमं तीर्थं क्षेत्राणां क्षेत्रमुत्तमम् । वाराणसीति विख्यातं सर्वदेवनिषेवितम् ॥३४॥ त एव श्रवणे धन्ये संविदाते बहुश्रुतम् । इह श्रुतिमंतां पुंसां काशी याभ्यां श्रुताऽसकृत् ॥३५॥ ये यं स्मरन्ति संस्थानमविमुक्तं द्विजोत्तमम् । निर्धूतसर्वपापास्ते शिवलोकं व्रजन्ति वै ॥३६॥ योजनानां शतस्थोऽपि अविमुक्तं स्मरेद्यदि । बहुपातकपूर्णोऽपि पदं गच्छत्यनामयम् ॥३७॥ प्राणप्रयाणसमये योऽविमुक्तं स्मरेद्विज । सोऽपि पापविनिर्मुक्तः शैवं पदमवाप्नुयात् ॥३८॥ काशीस्मरणजं पुण्यं भुक्त्वा स्वर्गे तदन्ततः । पृथिव्यामेकराड् भूत्वा काशीं प्राप्य च मुक्तिभाक् ॥३९॥ बहुनात्र किमुक्तेन वाराणस्या गुणान्प्रति । नामापि गृह्णतां काश्याश्चतुर्वर्गो न दूरतः ॥४०॥

इस विषय में अधिक क्या कहा जाय ! अहो ! यह आश्चर्य की बात है कि माया संसार को मोह लेती है और ऐसी परम पुनीत गंगा के नाम रहते हुए भी लोग नरक में गिरते हैं। गंगा का नामोच्चारण संसार के दुःखों का नाश करने वाला है। इसी प्रकार वैष्णवों को तुलसी की भक्ति भी संसार से मुक्त कर देती है। जो एक बार भी गंगा इन दो अक्षरों का उच्चारण करता है वह सब पापों से छूट कर विष्णु लोक को चला जाता है ॥२१-२८॥ जो गंगा के प्रवाह में तीन योजन तक जाता है वह पाप मुक्त होकर सूर्य लोक को चला जाता है। मेष, तुला और सिंह के संक्रान्ति-काल में यदि भक्तिपूर्वक महापुण्यदायिनी गंगा की सेवा (स्नान या कल्पवास) की जाय तो वह अखिल लोक के पाप को दूर कर देती है। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, नर्मदा, सरस्वती, तुङ्गभद्रा, कावेरी, अति पुण्यशीला यमुना, वेत्रवती (बेतवा), ताम्रपर्णी, सरयू आदि तीर्थों में गंगा मुख्य तीर्थ है। जिस प्रकार भगवान् विष्णु व्यापक होने के कारण सर्वत्र स्थित हैं उसी प्रकार यह त्रिभुवनपावनी गंगा सब पापों को नष्ट करने वाली है। अहो ! गंगा जगन्माता है। इसमें स्नान और इसके जल का पान करने से यह पावनी संसार को पवित्र कर देती है तो ऐसी गंगा की सेवा लोग क्यों नहीं करते ? सब देवों का एकमात्र वासस्थान वाराणसी पुरी सम्पूर्ण तीर्थों में उत्तम तीर्थ, सब क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र प्रसिद्ध है ॥२६-३४॥ उस काशी का नाम सुनने वालों के कान ही धन्य हैं जिनके द्वारा काशी का नाम बहुत बार सुना गया है। जो इस अविमुक्त परम तीर्थ वाराणसी क्षेत्र का स्मरण करते हैं वे सब पापों से मुक्त होकर शिवलोक को चले जाते हैं। जो सौ योजन दूर रहकर भी उस अविमुक्त क्षेत्र का स्मरण करते हैं वे अनगिनत पापों से युक्त होते हुए भी परमशाश्वत पद को प्राप्त करते हैं। द्विज ! मृत्यु के समय भी जो अविमुक्त क्षेत्र का स्मरण करता है वह भी पापों से छुटकारा पाकर शिवलोक को चला जाता है। ॥३५-३६॥ वह काशी स्मरण के कारण प्राप्त पुण्यों का स्वर्ग में उपभोग कर पुनः उसके क्षीण हो जाने पर पृथ्वी का एक छत्रपति सम्राट् होता है और पुनः काशी का दर्शन कर मुक्ति प्राप्त करता है। अथवा वाराणसी की महिमा या गुणवर्णन के विषय में अधिक क्या कहा जाय, केवल काशी के नाम स्मरण से भी चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) दूर या दुर्लभ नहीं रह जाता।