बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ | नारदीयपुराणम् इयाज वेधा यज्ञेन यत्र देवं रमापतिम् । तथैव मुनयः सर्वे चक्रुश्च विविधान्मखान् ॥१०॥ सर्वतीर्थाभिषेकानि यानि पुण्यानि तानि वै । गङ्गाबिन्दुभिषेकस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥११॥ गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद्योजनानां शते स्थितः । सोऽपि मुच्येत पापेभ्यः किमु गङ्गाभिषेकवान् ॥१२॥ विष्णुपदोद्भवा देवी विश्वेश्वरशिरःस्थिता । संसेव्या मुनिभिर्देवैः किं पुनः पामरैर्जनैः ॥१३॥ यत्सैकतं ललाटे तु ध्रियते मनुजोत्तमैः । तत्रैव नेत्रं विज्ञेयं विध्वदर्धाधः समुज्ज्वलत् ॥१४॥ यन्मज्जनं महापुण्यं दुर्लभं त्रिदिवौकसाम् । सारूप्यदायकं विष्णोः किमस्मात्कथ्यते परम् ॥१५॥ यत्र स्नाताः पापिनोऽपि सर्वपापविवर्जिताः । महद्विमानमारूढाः प्रयान्ति परमं पदम् ॥१६॥ यत्र स्नाता महात्मानः पितृमातृकुलानि वै । सहस्राणि समुद्धृत्य विष्णुलोके व्रजन्ति वै ॥१७॥ स स्नातः सर्वतीर्थेषु यो गङ्गां स्मरति द्विज । पुण्यक्षेत्रेषु सर्वेषु स्थितवान्नात्र संशयः ॥१८॥ यत्र स्नातं नरं दृष्ट्वा पापोऽपि स्वर्गभूमिभाक् । मदङ्गस्पर्शमात्रेण देवानामिधिपो भवेत् ॥१९॥ तुलसीमूलसंभूता द्विजपादोद्भवा तथा । गङ्गोद्भवा तु मृल्लोकान्नयत्यच्युतरूपताम् ॥२०॥ गङ्गा च तुलसी चैव हरिभक्तिरचञ्चला । अत्यन्तदुर्लभा नृणां भक्तिस्तद्धर्मप्रवक्तरि ॥२१॥ सद्धर्मवक्तुः पदसंभवा मृदं गङ्गोद्भवां चैव तथा तुलस्याः ॥ मूलोद्भवां भक्तियुतो मनुष्यो धृत्वा शिरस्येति पदं च विष्णोः ॥२२॥ कदा यास्याम्यहं गङ्गां कदा पश्यामि तामहम् । वाञ्छत्यपि च यो ह्येवं सोऽपि विष्णुपदं व्रजेत् ॥२३॥ गङ्गाया महिमा ब्रह्मन्वक्तुं वर्षशतैरपि । न शक्यते विष्णुनापि किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥२४॥ दूर हटा देती है । महामुनि ! समुद्रान्त पृथ्वी तल पर जितने पुण्य क्षेत्र विद्यमान हैं उनमें यह प्रयाग नामक तीर्थ अत्यन्त पुण्यतम है; जहाँ स्वयं ब्रह्मा ने यज्ञ से रमापति हरि का यजन किया और उसी के अनुसार जहाँ मुनियों ने विविध यज्ञों को सम्पन्न किया ॥७-१०॥ सब तीर्थों के स्नान से जो कुछ पुण्य होते हैं वे सभी पुण्य इस प्रयागवाहिनी गंगा के अभिषेकजन्य पुण्य के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं है । जो सैकड़ों योजन दूर रह कर भी गंगा ! गंगा ! उच्चारण करता है वह भी पापों से मुक्त हो जाता है । तब जो व्यक्ति इसके जल में डुबकी लगाते हैं उनके विषय में तो कहना ही क्या । विष्णु के चरणों से निकलने वाली और शंकर की जटा में रहने वाली इस पुण्य गंगा देवी की सेवा मुनि और देवता भी करते हैं, पुनः पामरजनों की क्या गणना है। जो मानवपुङ्गव गंगा की वालुका को ललाट पर लगाते हैं वह मानों वहीं (उनके ललाट पर) भासमान अर्ध चन्द्र है । जिसका स्नान महापुण्यदायक तथा देवदुर्लभ विष्णु का सारूप्य पद प्रदान कर देता है इससे बढ़कर उसकी महिमा का क्या बखान किया जा सकता है ॥११-१५॥ जिस प्रयाग में स्नान करने से पापी भी सब पापों से मुक्त होकर महान् विमान पर चढ़कर परम पद को प्राप्त कर लेते हैं, जहाँ स्नान कर महात्मागण अपने माता-पिता के भी सहस्रों पीढ़ियों का उद्धार कर विष्णु लोक में चले जाते हैं उसके विषय में क्या कहा जाय ! द्विज ! जो गंगा का स्मरण करता है मानों उसने सब तीर्थों में स्नान कर लिया और निःसन्देह सब पुण्य क्षेत्रों में उसने निवास कर लिया ॥१६-१८॥ उस प्रयाग में स्नान करने वाले मनुष्य को देखकर पापी भी स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है, उसके शरीर के स्पर्शमात्र से मनुष्य देवों का स्वामी इन्द्र बन जाता है । तुलसी के मूल की मिट्टी, ब्राह्मणों की चरणरेणु और गंगा की मिट्टी मनुष्य को विष्णु-सारूप्य प्रदान करती है ॥१९-२०॥ गंगा, तुलसी, अच्युतचरणों में अचल भक्ति और धर्मोपदेशकों में श्रद्धा मानव के लिए दुर्लभ है । मनुष्य सद्धर्मोपदेशकों के चरण की धूलि, गंगा की वालुका और तुलसी के मूल की मिट्टी को शिर पर चढ़ाकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है । मैं कब गंगा के समीप जाऊँगा, कब गंगा का दर्शन करूँगा, ऐसी जो इच्छा करता है वह भी विष्णु-पद को प्राप्त करता है । ब्रह्मन् ! गंगा की महिमा स्वयं विष्णु भी सौ वर्षों में वर्णन नहीं कर सकते,