भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

षष्ठोऽध्यायः सूत उवाच भगवद्भक्तिमाहात्म्यं श्रुत्वा प्रीतस्तु नारदः । पुनः पप्रच्छ सनकं ज्ञानविज्ञानपारगम् ॥१॥ नारद उवाच क्षेत्राणामुत्तमं क्षेत्रं तीर्थानां च तथोत्तमम् । परया दयया तथ्यं ब्रूहि शास्त्रार्थपारग ॥२॥ सनक उवाच शृणु ब्रह्मन्परं गुह्यं सर्वसंपत्करं परम् । दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं धर्म्यं पापहरं शुभम् ॥३॥ श्रोतव्यं मुनिभिर्नित्यं दुष्टग्रहनिवारणम् । सर्वरोगप्रशमनमायुर्वर्द्धनकारणम् ॥४॥ क्षेत्राणामुत्तमं क्षेत्रं तीर्थानां च तथोत्तमम् । गङ्गायमुनयोर्योगं वदन्ति परमर्षयः ॥५॥ सितासितोदकं तीर्थं ब्रह्माद्याः सर्वदेवताः । मुनयो मनवश्चैव सेवन्ते पुण्यकाङ्क्षिणः ॥६॥ गङ्गा पुण्यनदी ज्ञेया यतो विष्णुपदोद्भवा । रविजा यमुना ब्रह्मंस्तयोर्योगः शुभावहः ॥७॥ स्मृतार्तिनाशिनी गङ्गा नदीनां प्रवरा मुने । सर्वपापक्षयकरी सर्वोपद्रवनाशिनी ॥८॥ यानि क्षेत्राणि पुण्यानि समुद्रान्ते महीतले । तेषां पुण्यतमं ज्ञेयं प्रयागाख्यं महामुने ॥६॥ अध्याय ६ गंगा-माहात्म्य-वर्णन सूत बोले-भगवद्भक्ति की महिमा सुनकर नारद परमानन्दित हुए और पुनः ज्ञान-विज्ञान के पारगामी विद्वान् सनक से पूछने लगे ।१।। नारद बोले- हे शास्त्रों के पारंगत विद्वान् सनक ! जो क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र और तीर्थों में उत्तम तीर्थ है, उसको तथ्यतः कहने की परम कृपा करें ।॥२॥ सनक बोले-ब्रह्मन् ! उस परम गुह्य, सर्वसिद्धिदाता, परमतत्त्व, दुःस्वप्ननाशक, पवित्र, धर्मसम्मत, शुभ और पापनाशक आख्यान को सुनो । ऐसे दुष्टग्रहों के प्रभाव से रक्षा करने वाले, सर्वरोग नाशक तथा आयु बढ़ाने वाले पुनीत आख्यान का श्रवण मुनियों को नित्य प्रति करना चाहिए। क्षेत्रों में परमोत्तम क्षेत्र तथा तीर्थों में परमोत्तम तीर्थ गंगा यमुना का संगम ही है, ऐसा परमर्षिगण स्वीकार करते हैं। उस स्वच्छ और नील जल से सुशोभित तीर्थ की सेवा पुण्य की आकांक्षा करने वाले सब ब्रह्मा आदि देवता, मनुष्य और मुनिवृन्द करते हैं ।॥३-६॥ गंगा शुभ पुण्यप्रद नदी मानी जाती है, क्योंकि वह विष्णु के चरण कमल से निकली हुई है। ब्रह्मन् ! यमुना भी सूर्यतनया है। इस प्रकार ऐसी पुनीत नदियों का संगम अत्यन्त कल्याणदायी है। मुने ! नदियों में परम श्रेष्ठ यह नदी गंगा स्मरण मात्र से सब पापों को भी नष्ट कर देती है और सारे उपद्रवों को ५-ना० पु०