भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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३२ नारदीयपुराणम् शिवे च परमेशे च विष्णौ च परमात्मनि । समबुद्ध्या प्रवर्त्तन्ते ते वै भागवताः स्मृताः ॥७२॥ शिवाग्निकार्यनिरताः पञ्चाक्षरजपे रताः । शिवध्यानरता ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥७३॥ पानीयदाननिरता येऽन्नदानरतास्तथा । एकादशी व्रतरता ते वै भागवतोत्तमाः ॥७४॥ गोदाननिरता ये च कन्यादानरताश्च ये । मदर्थं कर्म्मकर्त्तारस्ते वै भागवतोत्तमाः ॥७५॥ एते भागवता विप्र केचिदत्र प्रकीर्त्तिताः । मयाऽपि गदितुं शक्या नाब्दकोटिशतैरपि ॥७६॥ तस्मात्त्वमपि विप्रेन्द्र सुशीलो भव सर्वदा । सर्वभूताश्रयो दान्तो मैत्रो धर्म्मपरायणः ॥७७॥ पुनर्युगान्तपर्य्यन्तं धर्म्मं सर्वं समाचरन् । मन्मूर्त्तिध्याननिरतः परं निर्वाणमाप्स्यसि ॥७८॥ एवं मृकंडुपुत्रस्य स्वभक्तस्य कृपानिधिः । दत्त्वा वरं स देवेशस्तत्रैवान्तरधीयत ॥७६॥ मार्कण्डेयो महाभागो हरिभक्तिरतः सदा । चचार परमं धर्ममीजे च विधिवन्मखैः ॥८०॥ शालग्रामे महाक्षेत्रे तताप परमं तपः । ध्यानक्षपितकर्मा तु परं निर्वाणमाप्तवान् ॥८१॥ तस्माज्जन्तुषु सर्वेषु हितकृद्धरिपूजकः । ईप्सितं मनसा यद्यत्तत्तदाप्नोत्यसंशयम् ॥८२॥ सनक उवाच एतत्सर्वं निगदितं त्वया पृष्टं द्विजोत्तम । भगवद्भक्तिमाहात्म्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥८३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे मार्कण्डेयवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ सर्वत्र गुणग्राहक एवं स्वयं गुण के पात्र बनते हैं वे परम भागवत हैं। जो परमेश शिव, और परात्मा विष्णु में सम बुद्धि से आस्था रखते हैं वे निश्चय ही परम भागवत हैं। जो शिव और अग्नि कार्य (यज्ञ) में रत रहते हैं, सर्वदा पंचाक्षर जप में लगे रहते हैं और शिव के ध्यान में निरत रहते हैं वे परम भागवत हैं। जो दूसरों को जल पिलाने में तत्पर रहते, दूसरों को अन्न दान करते हैं और एकादशी का व्रत सर्वदा किया करते हैं वे परम भागवत हैं। जो गोदान करते, कन्यादान करते और भगवदर्पण बुद्धि से प्रत्येक कार्य करते हैं वे परम भागवत हैं ॥७०-७५॥ यहाँ कुछ भागवत पुरुषों का लक्षण कहा गया है; परन्तु वे अनन्त हैं। उनके लक्षणों का कीर्त्तन शत कोटि वर्षों में भी मैं नहीं कर सकता। इसलिए विप्रेन्द्र ! तुम भी सर्वदा सुशील रहो, सब प्राणियों के हितचिन्तक, उदार, मित्र और धर्मपरायण रहो। पुनः युगान्त तक सब धर्मों का पालन करते हुए मेरे रूप के ध्यान में निरत रहो। ऐसा करने से तुम परम मोक्ष पद प्राप्त करोगे ॥७६-७८॥ इस प्रकार अपने परम प्रिय भक्त मृकण्डु-पुत्र को कृपानिधि भगवान् हरि वर प्रदान कर वहीं अन्तर्हित हो गए। महाभाग्यशाली मार्कण्डेय ने सदा हरि भक्ति में निरत रहकर परम धर्म का अनुष्ठान किया और विधि- पूर्वक यज्ञों से भगवान् का भजन किया। फिर उन्होंने महापुण्य क्षेत्र शालग्राम में परम तपस्या करके ध्यान योग से अपने कर्मों का नाश कर अन्त में मोक्ष पद प्राप्त किया। इसलिए अखिल प्राणियों का कल्याण करने वाला तथा हरि की पूजा करने वाला व्यक्ति मन से जो कुछ चाहता है, उसे अवश्य प्राप्त करता है, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं ॥७६-८२॥ सनक बोले—द्विजोत्तम ! आपने जो कुछ पूछा उसके विषय में यह सब बातें कह दीं। अब कौन सा दूसरा माहात्म्य सुनना चाहते हैं, वह पूछिए ॥८३॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग के प्रथमपाद में मार्कण्डेयवर्णन नामक पाँचवां अध्याय समाप्त ॥५॥