बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः ३१ सर्वेषां हितवाक्यानि ये वदन्ति नरोत्तमाः । ये गुणग्राहिणो लोके ते वै भागवताः स्मृताः ॥५६॥ आत्मवत्सर्वभूतानि ये पश्यंति नरोत्तमाः । तुल्याः शत्रुबु मित्रेषु ते वै भागवतोत्तमाः ॥५७॥ धर्मशास्त्रप्रवक्तारः सत्यवाक्यरताश्च ये । सतां शुश्रूषवो ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥५८॥ व्याकुर्वते पुराणानि तानि शृण्वन्ति ये तथा । तद्वक्तरि च भक्ता ये ते वै भागवतोत्तमाः ॥५९॥ ये गोब्राह्मणशुश्रूषां कुर्वते सततं नराः । तीर्थयातापरा ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६०॥ अन्येषामुदयं दृष्ट्वा येऽभिनन्दन्ति मानवाः । हरिनामपरा ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६१॥ आरामारोपणरतास्तडागपरिरक्षकाः । कासारकूपकर्त्तारस्ते वै भागवतोत्तमाः ॥६२॥ ये वै तडागकर्त्तारो देवसद्मानि कुर्वते । गायत्रीनिरता ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६३॥ येऽभिनन्दन्ति नामानि हरेः श्रुत्वाऽतिहर्षिताः । रोमाञ्चितशरीराश्च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६४॥ तुलसीकाननं दृष्ट्वा ये नमस्कुर्वते नराः । तत्काष्ठाङ्कितकर्णा ये ते वै भागवतोत्तमाः ॥६५॥ तुलसीगन्धमाघ्राय सन्तोषं कुर्वते तु ये । तन्मूलमृत्तिकां ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६६॥ आश्रमाचारनिरतास्तथैवातिथिपूजकाः । ये च वेदार्थवक्तारस्ते वै भागवतोत्तमाः ॥६७॥ शिवप्रियाः शिवासक्ताः शिवपादार्च्चने रताः । त्रिपुण्ड्रधारिणो ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६८॥ व्याहरन्ति च नामानि हरेः शम्भोर्महात्मनः । रुद्राक्षालङ्कृता ये च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६९॥ ये यजन्ति महादेवं क्रतुभिर्बहुदक्षिणैः । हरिं वा परया भक्त्या ते वै भागवतोत्तमाः ॥७०॥ विदितानि च शास्त्राणि परार्थं प्रवदन्ति ये । सर्वत्र गुणभाजो ये ते वै भागवताः स्मृताः ॥७१॥ दूर रहते हैं वे उत्तम भागवत हैं। जो नरोत्तम सबके कल्याण के शब्द कहते हैं और जो गुणग्राही हैं वे ही भाग- वतोत्तम हैं। जो सब भूतों (जीवों) में आत्म-भावना रखते हैं, जो शत्रु और मित्र के प्रति समान भाव रखते हैं वे निश्चय ही भागवतोत्तम हैं। जो धर्मशास्त्र के वक्ता, सत्य-भाषण में रत और जो सज्जनों के सेवक हैं वे ही परम भागवत हैं ॥५३-५८॥ जो पुराणों की व्याख्या करते हैं, जो श्रद्धापूर्वक उस व्याख्या को सुनते हैं और जो पुराणोपदेशक में श्रद्धा रखते हैं वे परमभागवत हैं। जो नर गो-ब्राह्मण की सर्वदा शुश्रूषा करते और तीर्थ-यात्रा के प्रेमी होते हैं वे परम भागवत हैं। जो मानव दूसरे के अभ्युदय को देखकर उसका अभिनन्दन करते हैं और हरिनामोच्चारण में तत्पर रहते हैं वे भागवतों में उत्तम हैं। जो उद्यान और वृक्षों को लगाते हैं, जो तड़ागों को लगाते हैं, जो तड़ागों की रक्षा पर ध्यान देते हैं, सरोवर, झील और कुएँ को खुदवाते हैं वे परम भागवत हैं। जो तालाब और देवमन्दिरों को बनवाते और गायत्री जप में तत्पर रहते हैं वे परम भागवत हैं ॥५६-६३॥ जो हरिनाम ध्वनि को सुनकर अति प्रसन्न होते और उस कीर्तन का अभिनन्दन करते एवं आनन्द से पुलकित हो उठते हैं वे परम भागवत हैं। जो मनुष्य तुलसी के उपवन को देखकर नमस्कार करते हैं और तुलसी की माला या काठ को कान में पहनते हैं वे परम भागवत हैं। जो तुलसी के सुगन्ध को सूंघकर प्रसन्नता एवं संतोष व्यक्त करते हैं और तुलसी की जड़ की मिट्टी को शिर चढ़ाते हैं वे भागवतोत्तम हैं जो आश्रमानुकूल आचार में रत रहते हैं, जो अतिथि पूजक और वेदार्थ के व्याख्याता हैं वे भागवतोत्तम हैं। जो शिव के प्रिय, शिव में निष्ठा रखने वाले, शिवचरण चर्चा में निरत और त्रिपुण्ड्रधारी हैं वे परम भागवत हैं जो हरि और महात्मा शम्भु के नाम का उच्चारण करते हैं और रुद्राक्ष माला को सर्वदा धारण करते हैं वे परम भागवत हैं ॥६४-६६॥ जो प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों से महादेव की पूजा करते हैं अथवा परा भक्ति के द्वारा विष्णु की आराधना करते हैं वे परम भागवत हैं। जो शास्त्रों का स्वयं गम्भीरज्ञान रखते हुए दूसरों को उसका उपदेश देते हैं और जो