भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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३० नारदीयपुराणम् सगुणं निर्गुणं शान्तं मायातीतं सुमायिनम् । अरूपं बहुरूपं तं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥४२॥ यत्र तद्भगवान्विश्वं सृजत्यवति हन्ति च । तमादिदेवमीशानं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥४३॥ परेश परमानन्द शरणागतवत्सल । त्राहि मां करुणासिन्धो मनोतीत नमोऽस्तु ते ॥४४॥ एवं स्तुवन्तं विप्रेन्द्रं मार्कण्डेयं जगद्गुरुम् । उवाच परया प्रीत्या शङ्खचक्रगदाधरः ॥४५॥ श्रीभगवानुवाच लोके भागवता ये च भगवद्भक्तमानसाः । तेषां तुष्टो न सन्देहो रक्षाम्येतांश्च सर्वदा ॥४६॥ अहमेव द्विजश्रेष्ठ नित्यं प्रच्छन्नविग्रहः । भगवद्भक्तरूपेण लोकान्रक्षामि सर्वदा ॥४७॥ मार्कण्डेय उवाच किंलक्षणा भागवता जायन्ते केन कर्मणा । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कौतूहलपरो यतः ॥४८॥ श्रीभगवानुवाच लक्षणं भागवतानां शृणुष्व मुनिसत्तम । वक्तुं तेषां प्रभावं हि शक्यते नाब्दकोटिभिः ॥४९॥ ये हिताः सर्वजन्तूनां गतासूया अमत्सराः । वशिनो निस्पृहाः शान्तास्ते वै भागवतोत्तमाः ॥५०॥ कर्मणा मनसा वाचा परपीडां न कुर्वते । अपरिग्रहशीलाश्च ते वै भागवताः स्मृताः ॥५१॥ सत्कथाश्रवणे येषां वर्तते सात्त्विकी मतिः । तद्भक्तविष्णुभक्ताश्च ते वै भागवतोत्तमाः ॥५२॥ मातापित्रोश्च शुश्रूषां कुर्वन्ति ये नरोत्तमाः । गङ्गाविश्वेश्वरधिया ते वै भागवतोत्तमाः ॥५३॥ ये तु देवार्चनरता ये तु तत्साधकाः स्मृताः । पूजां दृष्ट्वानुमोदन्ते ते वै भागवतोत्तमाः ॥५४॥ व्रतिनां च यतीनां च परिचर्यापराश्च ये । वियुक्तपरनिन्दाश्च ते वै भागवतोत्तमाः ॥५५॥ नमस्कार करता हूँ । सगुण, निर्गुण, शान्त, मायातीत, अतिमायापटु, अरूप और बहुरूप उस जनार्दन को प्रणाम करता हूँ । वे भगवान् जिन तीन रूपों में अपने को विभक्त कर विश्व की सृष्टि, रक्षा और संहार करते हैं, उन आदि ईशान देव को नमस्कार करता हूँ । परेश ! परमानन्द ! शरणागतवत्सल ! करुणासिन्धु ! मेरी रक्षा करो । मन से परे ! आपको नमस्कार करता हूँ । इस प्रकार स्तुतिपरायण, जगद्गुरु, विप्रेन्द्र, मार्कण्डेय से शङ्ख, चक्र और गदाधारी विष्णु प्रसन्नतापूर्वक बोले- भगवान् बोले- इस लोक में जो भगवान् के भक्त तथा भगवद्भक्तों के प्रेमी हैं, उनसे प्रसन्न रहता हूँ और सर्वदा उनकी रक्षा करता हूँ, इसमें सन्देह नहीं । द्विजश्रेष्ठ ! मैं ही नित्य प्रच्छन्न शरीर होकर भगवद्भक्त के रूप से लोगों की सर्वदा रक्षा करता हूँ ॥४०-४७॥ मार्कण्डेय बोले-भागवतों के क्या लक्षण हैं ? किन शुभ कर्मों से वे भक्त उत्पन्न होते हैं ? इन बातों को सुनने की इच्छा हो रही है, क्योंकि मेरे हृदय में महान् कौतूहल है ॥४८॥ श्रीभगवान् बोले- मुनिवर्य ! भागवतजनों के लक्षण सुनो । उनके प्रभाव का वर्णन वस्तुतः कोटि वर्षों में भी सम्भव नहीं है। जो सब प्राणियों के हित में लगे रहते, जो ईर्ष्या-मात्सर्य-रहित, जितेन्द्रिय, निःस्पृह और शान्त होते हैं, वे ही परम भागवत हैं जो मन, वचन और कर्म से दूसरे को पीड़ा नहीं पहुँचाते, जो परिग्रह शील (संचयशील) नहीं हैं वे ही भागवत कहे गये हैं। जिसकी सात्त्विक भावना सर्वदा सत्कथाओं के सुनने में लगी रहती है, जो विष्णु-भक्त और भक्तों के प्रेमी हैं वे निश्चय ही परम भागवत हैं ॥४६-५२॥ जो नरपुंगव माता पिता की शुश्रूषा में उनको गंगा और विश्वेश्वर समझकर तल्लीन रहते हैं वे ही परम भागवत हैं। जो देवार्चन में सदा रत रहते हैं, जो उनकी पूजा के समर्थक हैं और भगवदर्चा को देखकर सदा उसका समर्थन और सराहना करते हैं वे ही परम भागवत हैं। जो व्रतपरायण और यतिजनों की सेवा में लगे रहते हैं और पर निन्दा से सर्वथा