बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः २६ चतुर्दशभिरेतैश्च ब्रह्मणो दिवस मुने । यावत्प्रमाणं दिवस तावद्रात्रिः प्रकीर्तिता ॥२८॥ नाशमायाति विप्रेन्द्र तस्मिन्काले जगत्त्रयम् । मानुषेण सहस्रेण यत्प्रमाणं भवेच्छृणु ॥२६॥ चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिवस मुने । तद्वन्मासो वत्सरश्च ज्ञेयस्तस्यापि वेधसः ॥३०॥ परार्द्धद्वयकालस्तु तन्मतेन भवेद्द्विजाः । विष्णोरहस्तु विज्ञेयं तावद्रात्रिः प्रकीर्तिता ॥३१॥ मृकण्डुतनयस्तावत्स्थितः संजीर्णपर्णवत् । तस्मिन्घोरे जलमये विष्णुशक्त्युपबृंहितः ॥ आत्मानं परमं ध्यायन्स्थितवान्हरिसन्निधौ ॥३२॥ अथ काले समायाते योगनिद्राविमोचितः । सृष्टवान्ब्रह्मरूपेण जगदेतच्चराचरम् ॥३३॥ संहृतं तु जलं वीक्ष्य सृष्टं विश्वं मृकण्डुजः । विस्मितः परमप्रीतो ववन्दे चरणौ हरेः ॥३४॥ शिरस्यञ्जलिमाधाय मार्कण्डेयो महामुनिः । तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः सदानन्दैकविग्रहम् ॥३५॥ मार्कण्डेय उवाच सहस्रशिरसं देवं नारायणमनामयम् । वासुदेवमनाधारं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥३६॥ अमेयमजरं नित्यं सदानन्दैकविग्रहम् । अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं प्रणतोऽस्मि दनार्दनम् ॥३७॥ अक्षरं परमं नित्यं विश्वाक्षं विश्वसम्भवम् । सर्वतत्त्वमयं शान्तं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥३८॥ पुराणं पुरुषं सिद्धं सर्वज्ञानैकभाजनम् । परात्परतरं रूपं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥३६॥ परं ज्योतिः परं धाम पवित्रं परमं पदम् । सर्वरूपं परमं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥४०॥ तं सदानन्दचिन्मात्रं पराणां परमं पदम् । सर्वं सनातनं श्रेष्ठं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥४१॥ ।।२२-२७।। चौदह मन्वन्तरों का ब्रह्मा का एक दिन होता है। जितने समय परिमाण का दिन उतने की रात्रि भी होती है । विप्रेन्द्र ! रात्रिकाल में त्रिलोकी का नाश हो जाता है। मानव सहस्र का जो प्रमाण होता है उसको सुनो — मुने ! सहस्र चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है। उसी प्रकार उस ब्रह्मा के मास और वत्सर (वर्ष) का प्रमाण समझना चाहिए ॥२८-३०॥ द्विजो ! इस मत से दो परार्द्ध काल होता है । द्विपरार्द्धकाल विष्णु का एक दिन और उतने ही काल की उनकी रात्रि भी होती है। मृकण्डु-पुत्र विष्णु के रात्रि काल पर्यन्त वहाँ जीर्ण पत्र के समान स्थित रहे । उस घोर एकार्णव में विष्णु शक्तिमान् बनकर परम आत्मतत्त्व का ध्यान करते हुए हरि के समीप रहे । सृष्टि आ जाने पर भगवान् की योगनिद्रा भङ्ग हुई और ब्रह्मारूप से उन्होंने इस चरा- चर जगत् की सृष्टि की। मृकण्डुतनय जल को नष्ट और नूतन विश्व की सृष्टि देखकर विस्मित हो गए, फिर परम प्रसन्न होकर हरिचरणों की वन्दना की। महामुनि मार्कण्डेय शिर पर दोनों हाथों से अञ्जलि बाँधकर सदा आनन्द स्वरूप हरि की अपनी अभीष्ट वाणी से स्तुति करने लगे ॥३१-३५॥ मार्कण्डेय बोले- सहस्र शिर वाले, निर्विकार, नारायण, अनाधार जनार्दनदेव को प्रणाम करता हूँ। अमेय, अजर, नित्य, सदानन्दमय शरीर वाले, अचिन्त्य और तर्कों से न पाने योग्य जनार्दन को नमस्कार करता हूँ । अक्षर, परम, नित्य, विश्वनेत्र, विश्व के कारण, सर्वतत्त्वमय और शान्त जनार्दन को नित्य प्रणाम करता हूँ। पुराण, पुरुष, सिद्ध, सब प्रकार के ज्ञान के एकमात्र आधार, पर से भी श्रेष्ठ रूप वाले जनार्दन को नमस्कार करता हूँ ॥३६-३६॥ परज्योति, परमधाम, पवित्र, परम पद, सर्वरूप (विश्वरूप) और परम जनार्दन को नमस्कार करता हूँ । उस सत् चित् और आनन्द स्वरूप, परों के भी परम पद, सर्व, श्रेष्ठ, सनातन और जनार्दन