बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८ नारदीयपुराणम् ब्रह्मचर्येण तपसा पूजनीयो हरिः सदा । निषिद्धं वर्जनीयं स्याद्दुष्टसंभाषणादिकम् ॥११॥ साधुभिः सह वस्तव्यं विष्णुभक्तिपरैः सदा । न द्वेषः कस्यचित्कार्यः सर्वेषां हितमाचरेत् ॥१२॥ इज्याध्ययनदानानि सदा कार्याणि ते सुत । एवं पित्रा समादिष्टो मार्कण्डेयो मुनीश्वरः ॥१३॥ चचार धर्मं सततं सदा संचिन्तयन्हरिम् । मार्कण्डेयो महाभागो दयावान्धर्मवत्सलः ॥१४॥ आत्मवान्सत्यसन्धश्च मार्तण्डसदृशप्रभः । वशी शान्तो महाज्ञानी सर्वतत्त्वार्थकोविदः ॥१५॥ तपश्चचार परममच्युतप्रीतिकारणम् । आराधितो जगन्नाथो मार्कण्डेयेन धीमता ॥१६॥ पुराणसंहितां कर्तुं दत्तवान्वरमच्युतः । मार्कण्डेयो मुनिस्तस्मान्नारायण इति स्मृतः ॥१७॥ चिरजीवी महाभक्तो देवदेवस्य चक्रिणः । जगत्येकार्णवीभूते स्वप्रभावं जनार्दनः ॥१८॥ तस्य दर्शयितुं विप्रास्तं न संहृतवान्हरिः । मृकण्डुतनयो धीमान्विष्णुभक्तिसमन्वितः ॥१९॥ तस्मिञ्जले महाघोरे स्थित्वाञ्जीर्णपत्रवत् । मार्कण्डेयः स्थितस्तावद्यावच्छेते हरिः स्वयम् ॥२०॥ तस्य प्रमाणं वक्ष्यामि कालस्य वदतः शृणु । दशभिः पञ्चभिश्चैव निमिषैः परिकीर्तिता ॥२१॥ काष्ठातत्त्रिंशतो ज्ञेया कला पद्मजनन्दन । तत्त्रिंशतः क्षणो ज्ञेयस्तैः षड्भिर्घटिका स्मृता ॥२२॥ तद्द्वयेन मुहूर्त्तः स्याद्दिनं तत्त्रिंशता भवेत् । त्रिंशद्दिनैर्भवेन्मासः पक्षद्वितयसंयुतः ॥२३॥ ऋतुर्मासद्वयेन स्यात्तत्त्रयेणायनं स्मृतम् । तद्द्वयेन भवेदब्दः स देवानां दिनं भवेत् ॥२४॥ उत्तरं दिवसं प्राहु रात्रिवे दक्षिणायनम् । मानुषेणैव मासेन पितॄणां दिनमुच्यते ॥२५॥ तस्मात्सूर्येन्दुसंयोगे ज्ञातव्यं कल्पमुत्तमम् । दिव्यैर्वर्षसहस्रै द्वादशभिर्दैवतं युगम् ॥२६॥ दैवे युगसहस्रे द्वे ब्राह्मः कल्पौ तु तौ नृणाम् । एकसप्ततिसंख्यातैर्दिव्यैर्मन्वन्तरं युगैः ॥२७॥ से हरि की सर्वदा पूजा करनी चाहिए। कटुभाषण आदि निषिद्ध कर्म सर्वथा वर्ज्य हैं । विष्णुभक्तिपरायण साधुओं की संगति करनी चाहिए। किसी से द्वेष नहीं करना चाहिए; प्रत्युत सर्वहित साधन में लीन रहना चाहिए ॥८-१२॥ पुत्र ! यज्ञ, अध्ययन और दान आदि शुभ कर्म सर्वदा करना चाहिए । पिता से इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर मुनीश्वर मार्कण्डेय सर्वदा हरि का ध्यान करते हुए धर्माचरण करते थे । महाभाग्यशाली, दयावान्, धर्मवत्सल, आत्मज्ञ, सत्यव्रत, सूर्य के समान तेजस्वी, जितेन्द्रिय, शान्त, महाज्ञानी और सब तत्त्वों को जानने वाले मार्कण्डेय भगवान् अच्युत को प्रसन्न करने की इच्छा से तपस्या करने लगे । धीमान् मार्कण्डेय की आराधना से प्रसन्न होकर अच्युत ने मुनि को पुराण संहिता रचने का वर दिया । इस कारण मुनि मार्कण्डेय नारायण कहे गए और वे देवाधिदेव विष्णु के परम भक्त चिरंजीवी हुए । विप्रो ! जनार्दन हरि ने संसार के एकार्णवाकार हो जाने पर अपना प्रभाव दिखलाने के लिए ही उनका संहार नहीं किया । उस महाभयंकर जल में मृकण्डु-पुत्र विष्णुभक्त, धीमान् मार्कण्डेय जर्जर पत्र के समान वर्तमान रहे । जब तक स्वयं भगवान् हरि सोये रहे तब तक तक मुनि वहाँ उपस्थित थे । उस काल का प्रमाण मैं कह रहा हूँ, उसको सुनो-पंद्रह निमेषों की एक कला कही जाती है ॥१३-२१॥ हे ब्रह्मपुत्र ! तीस काष्ठा की एक कला और तीस कला का एक क्षण होता है । छह क्षणों की एक घटिका और दो घटिका (घड़ी) का एक मुहूर्त्त होता है । तीस मुहूर्त्त का एक दिन और तीस दिन का एक मास होता है जो दो पक्षों कृष्ण और शुक्ल में विभक्त रहता है । दो महीनों का एक ऋतु और तीन ऋतु का एक अयन होता है । दो अयन का एक वर्ष जो देवताओं का एक दिन होता है । उत्तरायण तो देवों का दिन और दक्षिणायन देवों की रात्रि माना जाता है । मानव मास ही पितरों का दिन कहा जाता है । इसलिए सूर्य और चन्द्र के संयोग काल को उत्तम कल्प समझा जाता है । देवों के बारह हजार वर्षों का दैवत युग होता है । चार हजार दैव युग काल में मनुष्यों के दो कल्प होते हैं और इकहत्तर चर्तुयुगी का एक मन्वन्तर होता है