बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः नारद उवाच ब्रह्मन्कथं स भगवान्मृकण्डोः पुत्रतां गतः । किं चकार च तद्ब्रूहि हरिर्भार्गववंशजः ॥१॥ श्रूयते च पुराणेषु मार्कण्डेयो महामुनिः । अपश्यद्वैष्णवीं मायां चिरंजीव्यस्य संप्लवे ॥२॥ सनक उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि कथामेतां सनातनीम् । विष्णुभक्तिसमायुक्तां मार्कण्डेयमुनिं प्रति ॥३॥ तपसोऽन्ते मृकण्डुस्तु भार्यामुद्वाह्य सत्तमः । गार्हस्थ्यमकरोद्धृष्टः शान्तो दान्तः कृतार्थकः ॥४॥ तस्य भार्या शुचिर्दक्षा नित्यं पतिपरायणा । मनसा वचसा चापि देहेन च पतिव्रता ॥५॥ काले दधार सा गर्भं हरितेजोऽंशसंभवम् । सुषुवे दशमासान्ते पुत्रं तेजस्विनं परम् ॥६॥ स ऋषिः परमप्रीतो दृष्ट्वा पुत्रं सुलक्षणम् । जातकं कारयामास मङ्गलं विधिपूर्वकम् ॥७॥ स वालो ववृधे तत्र शुक्लपक्ष इवोडुपः । ततस्तु पञ्चमे वर्षे उपनीय मुदान्वितः ॥८॥ शिक्षां चकार विप्रेन्द्र वैदिकीं धर्मसंहिताम् । नमस्कार्या द्विजाः पुत्र सदा दृष्ट्वा विधानतः ॥६॥ त्रिकालं सूर्यमभ्यर्च्य सलिलाञ्जलिदानतः । वैदिकं कर्म कर्तव्यं वेदाध्ययनपूर्वकम् ॥१०॥
अध्याय ५ मार्कण्डेय मुनि की कथा
नारद बोले—ब्रह्मन् ! क्यों भगवान् हरि मृकण्डु के पुत्र हुए ? भार्गव-वंश में पुत्र रूप से जन्म लेकर क्या किया ? इस बात को कहिए । पुराणों में ऐसा सुना जाता है कि मुनि मार्कण्डेय ने प्रलय काल में चिरजीवी विष्णु की माया का प्रत्यक्ष दर्शन किया था ॥१-३॥ सनक बोले—नारद ! मार्कण्डेय मुनि से सम्बन्ध रखने वाली, विष्णुभक्ति से ओत-प्रोत उस सनातन कथा को अब कह रहा हूँ सुनो । उस घोर तपस्या के बाद प्रसन्न, शान्त और उदार मृकण्डु मुनि ने विवाह किया और कृतार्थ होकर भार्या के साथ गृहस्थ जीवन बिताने लगे । उनकी भार्या पवित्र, कुशल और नित्य पति सेवा में लगी रहती थी, शरीर, मन और वचन से भी वह पतिव्रता थी । कुछ समय बाद उसने विष्णु कलांश से युक्त गर्भ धारण किया और दसवें महीने के अन्त में परम तेजस्वी पुत्र को उत्पन्न किया । ऋषि उस सर्व-लक्षण-सम्पन्न पुत्र को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और विधि पूर्वक मांगलिक जातक संस्कार किया ॥४-७॥ वह बालक शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भाँति दिनानुदिन बढ़ने लगा । इसके बाद पाँचवें वर्ष में यज्ञोपवीत संस्कार कर प्रसन्न चित्त से उस बालक को वैदिक धर्म संहिता की शिक्षा देने लगे कि पुत्र ! द्विज को देखकर सर्वदा विधिपूर्वक नमस्कार करना चाहिये । तीनों काल सूर्य को सूर्यार्घ्य देकर वेदाध्ययन पूर्वक वैदिक कर्म करना चाहिये । ब्रह्मचर्य और तपस्या