बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनारदीयपुराणम् २६ एवं स्तुतः स भगवान्विष्णुस्तेन महर्षिणा । अवाप परमां तृप्तिं शङ्खचक्रगदाधरः ॥८८॥ अथालिङ्ग्य मुनिं देवश्चतुर्भिर्दीर्घबाहुभिः । उवाच परमं प्रीत्या वरं वरय सुव्रत ॥८९॥ प्रीतोऽस्मि तपसा तेन स्तोत्रेण च तवानघ । मनसा यदभिप्रेतं वरं वरय सुव्रत ॥९०॥ मृकण्डुरुवाच देवदेव जगन्नाथ कृतार्थोऽस्मि न संशयः । त्वद्दर्शनमपुण्यानां दुर्लभं च यतः स्मृतम् ॥९१॥ ब्रह्माद्या यं न पश्यन्ति योगिनः संशितव्रताः । धर्मिष्ठा दीक्षिताश्चापि वीतरागा विमत्सराः ॥९२॥ तं पश्यामि परं धाम किमतोऽन्यं वरं वृणे । एतेनैव कृतार्थोऽस्मि जनार्दन जगद्गुरो ॥९३॥ यन्नामस्मृतिमात्रेण महापातकिनोऽपि ये । तत्पदं परमं यान्ति ते दृष्ट्वा किमुताच्युत ॥९४॥ श्रीभगवानुवाच सत्यमुक्तं त्वया ब्रह्मन्त्रीतोऽस्मि तव पण्डित । मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद्भविष्यति ॥९५॥ विष्णुर्भक्तकुटुम्बीति वदन्ति विबुधाः सदा । तदेव पालयिष्यामि मज्जनो नानृतं वदेत् ॥९६॥ तस्मात्त्वत्तपसा तुष्टो यास्यामि तव पुत्रताम् । समस्तगुणसंयुक्तो दीर्घजीवी स्वरूपवान् ॥९७॥ मम जन्म कुले यस्य तत्कुलं मोक्षगामि वै । मयि तुष्टे मुनिश्रेष्ठ किमसाध्यं जगत्त्रये ॥९८॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशो मुनेस्तस्य समीक्षतः । अंतर्दधे मृकण्डुश्च तपसः समवर्तत ॥९९॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे भक्तिवर्णनप्रसङ्गेन मार्कण्डेयचरितारम्भो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ जगत्सेव्य, जगत् के आश्रय दाता, परेश, करुणासागर, भक्तजनों की पीड़ा हरने वाले और शरणागत-रक्षक विष्णु की मैं स्तुति करता हूँ । शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् विष्णु महर्षि की ऐसी स्तुति सुनकर परम प्रसन्न हो गए । अपनी चारों भुजाओं से मुनि को हृदय से लगाकर भगवान् प्रसन्नतापूर्वक बोले—'सुव्रत ! वर माँगो । अनघ ! तुम्हारी इस तपस्या और मोहिनी स्तुति से प्रसन्न हूँ । सुव्रत ! तुम्हारी जो कुछ मनःकामना हो माँगो ॥८६-९०॥ मृकण्डु बोले—देवदेव ! जगन्नाथ ! मैं कृतार्थ हो गया, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं; क्योंकि आपका दर्शन पुण्यहीनों के लिये दुर्लभ कहा गया है । जिसको ब्रह्मा आदि देव, व्रतनिष्ठ, योगी, धर्मप्रेमी, दीक्षित (यज्ञ-दीक्षित) वीतराग और विमत्सर नहीं देख पाते हैं, उस परम पुरुष को आज नेत्रों के सामने पा रहा हूँ । इससे बढ़कर और क्या वर मागूँ ? जगद्गुरो ! जनार्दन ! इतने से ही मैं कृतार्थ हूँ । अच्युत ! जिसके नाम स्मरण मात्र से महापापी भी उस परम पद को पा जाते हैं, उसको देखकर भी कौन-सी अतिरिक्त वस्तु माँगी जाय ॥९१-९४॥ श्री भगवान् बोले—ब्रह्मन् ! तुमने उचित कहा । पंडित ! मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ; मेरा दर्शन कभी विफल नहीं होता है । विष्णु भक्तों के कुटुम्बी हैं, ऐसा देवता या पंडित जन कहा करते हैं । मैं भी उसी कथन को सत्य प्रमाणित करूँगा; क्योंकि मेरे प्रियजन कभी भी असत्य नहीं बोलते । अतएव तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न मैं तुम्हारा वह पुत्र बनूँगा, जो समस्त गुणों से युक्त, रूपवान् और दीर्घजीवी होगा । मेरा जन्म जिस कुल में होगा वह कुल तो अनायास मोक्ष प्राप्त करेगा । मुनिश्रेष्ठ ! मेरे प्रसन्न हो जाने पर इस त्रिलोकी में कौन-सा पदार्थ अप्राप्य और कौन-सा कार्य असाध्य है ? यह कहकर देवदेवेश हरि मृकण्डु मुनि के सक्षम ही अन्तर्धान हो गए और मुनि भी तपस्या में लग गए ॥९५-९६॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग-प्रथमपाद-भक्तिवर्णनप्रसंग में मार्कण्डेयचरितारम्भ नामक चौथा अध्याय समाप्त ॥४॥