भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः २५ भवतां रक्षकश्चाहं विहरध्वं यथासुखम् । इति दत्त्वा वरं तेषामतसीकुसुमप्रभः ॥७६॥ पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत । तुष्टात्मानः सुरगणा ययुर्नाकं यथागतम् ॥७७॥ मृकण्डोरपि तुष्टात्मा हरिः प्रत्यक्षतामगात् । अरूपं परमं ब्रह्म स्वप्रकाशम् निरञ्जनम् ॥७८॥ अतसीपुष्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । दिव्यायुधधरं दृष्ट्वा मृकण्डुर्विस्मितोऽभवत् ॥७९॥ ध्यानादुन्मील्य नयनं अपश्यद्धरिग्रतः । प्रसन्नवदनं शान्तं धातारं विश्वतेजसम् ॥८०॥ रोमाञ्चितशरीरोऽसावानन्दाश्रुविलोचनः । ननाम दण्डवद्भूतौ देवदेवं सनातनम् ॥८१॥ अश्रुभिः क्षालयंस्तस्य चरणौ हर्षसंभवैः । शिरस्यञ्जलिमाधाय स्तोतुं समुपचक्रमे ॥८२॥ मृकण्डुरुवाच । नमः परेशाय परात्मरूपिणे परात्परस्मात्परतः पराय ॥८३॥ अपारपाराय परानुकर्वे नमः परेभ्यः परपारगाय । यो नामजात्यादिविकल्पहीनः शब्दादिदोषव्यतिरेकरूपः ॥८४॥ बहु स्वरूपोऽपि निरञ्जनो यस्तमीशमीड्यं परमं भजामि । वेदान्तवेद्यं पुरुषं पुराणं हिरण्यगर्भादिजगत्स्वरूपम् ॥८५॥ अनूपमं भक्तिजनानुकम्पिनं भजामि सर्वेश्वरमादिमीड्यम् । पश्यन्ति यं वीतसमस्तदोषा ध्यानैकनिष्ठा विगतस्पृहाश्च ॥८६॥ निवृत्तमोहाः परमं पवित्रं नतोऽस्मि संसारनिवर्त्तकं तम् स्मृतार्तिनाशनं विष्णुं शरणागतपालकम् । जगत्सेव्यं जगद्धाम परेशं करुणाकरम् ॥८७॥ शान्त होकर यहाँ से जाओ । वह मुनि कथमपि तुम लोगों को कष्ट नहीं पहुँचायेंगे । मैं आप देवों का रक्षक हूँ । आप सुखपूर्वक विहार कीजिए । यह वर देकर अलसी के पुष्प के समान कान्तिमान् भगवान् देवों के देखते ही देखते अन्तर्हित हो गये । सुरगण भी भगवान् का आश्वासन पाकर प्रसन्न हो गये और जहाँ से आये थे उसी स्वर्ग लोक को लौट गए । भगवान् विष्णु भी मृकण्डु की तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए । उस अरूप, परम ब्रह्म, स्वप्रकाश, निरंजन, पीताम्बर, अलसी पुष्प के समान नील वर्ण, अच्युत और दिव्य शस्त्रधारी भगवान् को देखकर मुनि विस्मित हो गए । ध्यान से विरत होकर जब उन्होंने आंख खोली तो सामने प्रसन्नमुख, शान्त, धाता और अत्यन्त तेजस्वी भगवान् को देखा । देखते ही उनको आनन्द से रोमाञ्च हो गया । नेत्रों से आनन्द की अश्रुधार बह चली । सनातन देवाधिदेव हरि को दण्डवत् प्रणाम किया । आनन्दातिरेक से निकली हुई अश्रुधार से भगवान् के युगल- चरण को धोते हुए, शिर पर अञ्जलि बाँधकर स्तुति करने लगे ॥७४-८२॥ मृकण्डु बोले—परेश, परात्मरूपी, पर-से-पर और उस परात्पर से पर को नमस्कार है, अपार संसार से परे रहने वाले, पर का अनुकरण करने वाले या दूसरों पर अनुग्रह करने वाले तथा दूसरों को संसार-सागर के उस पार पहुँचा देने वाले को नमस्कार है । जो नाम (संज्ञा) जाति आदि विविधताओं (उपाधियों) से रहित, शब्द आदि दोषों से शून्य रूप वाले (शब्दाबोध्य) तथा बहुस्वरूप होते हुए भी निरंजन है, उस पूज्य ईश की स्तुति करता हूँ । वेदान्त वेद्य, पुराण पुरुष, हिरण्यगर्भ, जगत् के आदि स्वरूप (कारण), अनुपम, भक्तों पर कृपा करने वाले पूज्य सर्वेश्वर को नमस्कार है ॥८३-८५॥ जिस परम पवित्र तथा संसार की माया को दूर करने वाले को समस्त दोषों से शून्य, ध्यानपरायण और निःस्पृह साधक देखते हैं, उस ४-ना० पु०