बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ नारदीयपुराणम् नमो नित्याय वन्द्याय सदानन्दैकरूपिणे । नमः स्मृतार्त्तिनाशाय भूयो भूयो नमो नमः ॥६३॥ एवं देवस्तुतिं श्रुत्वा भगवान्कमलापतिः । प्रत्यक्षतामगात्तेषां शङ्खचक्रगदाधरः ॥६४॥ विकचाम्बुजपत्राक्षं सूर्य्यकोटिसमप्रभम् । सर्वालङ्कारसंयुक्तं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् ॥६५॥ पीताम्बरधरं सौम्यं स्वर्णयज्ञोपवीतिनम् । स्तूयमानं मुनिवरैः पार्षदप्रवरावृतम् ॥६६॥ तं दृष्ट्वा देवसंघास्ते तत्तेजोजिततेजसः । नमश्चक्रुर्मुदा युक्ता अष्टांगैरवनिं गताः ॥६७॥ ततः प्रसन्नो भगवान्मेघगंभीरनिस्वनः । उवाच प्रीणयन्देवान्नतानिन्द्रपुरोगमान् ॥६८॥ श्रीभगवानुवाच जाने वो मानसं दुःखं मृकण्डुतपसोद्गतम् । युष्मान्न बाधते देवाः स ऋषिः सज्जनाग्रणी ॥६९॥ संपद्भिः संयुता वापि विपद्भिर्भवचापिसज्जनाः । सर्वथान्यं न बाधन्ते स्वप्नेऽपि सुरसत्तमाः ॥७०॥ सततं बाध्यमानोऽपि विषयाद्यैररातिभिः । अविधायात्मनो रक्षामन्यान्द्वेष्टि कथं सुधीः ॥७१॥ तापत्रयाभिधानेन बाध्यमानो हि मानवः । अन्यं क्रीडयितुं शक्तः कथं भवति सत्तमः ॥७२॥ कर्मणा मनसा वाचा बाधते यः सदा परान् । नित्यं कामादिभिर्युक्तो मूढधीः प्रोच्यते तु सः ॥७३॥ यो लोकहितकृन्मर्त्यो गतासूयो विमत्सरः । निःशङ्कः प्रोच्यते सद्भिborderरिहामुत्र च सत्तमः ॥७४॥ सशङ्कः सर्वदा दुःखी निःशङ्कः सुखमाप्नुयात् । गच्छध्वं स्वालयं स्वस्थाः क्रीडिष्यति वो न सः ॥७५॥ निमित्त दिये हुए पदार्थ) को ग्रहण करने वाले को नमस्कार है । नित्य, पूज्य, सर्वदा आनन्द स्वरूप को नमस्कार है । भक्तों की बाधा दूर करने वाले को वार-वार नमस्कार है ॥६०-६३॥ देवों की ऐसी स्तुति सुनकर भगवान् कमलापति शंख, चक्र और गदाधारी रूप में उनके सम्मुख प्रकट हुए, जिनके नेत्र विकसित कमल के समान उत्फुल्ल थे, शरीर से कोटि-कोटि सूर्य की प्रभा निकल रही थी, अङ्ग-अङ्ग पर अलङ्कार सुशोभित हो रहे थे, जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्स से अङ्कित था, जो पीताम्बरधारी और सुवर्ण के यज्ञोपवीत पहने हुए थे, जिनकी मुनिवरगण स्तुति कर रहे थे और जो अपने उत्तम पार्षदों से घिरे हुए थे । देव- समूह उस तेजोमय को देखकर हततेज हो गए, आनन्दविभोर हो देवों ने साष्टाङ्ग दण्डवत् किया । विनम्र देवों पर प्रसन्न होकर भगवान् ने इन्द्र आदि देवों को सम्बोधित करते हुए मेघ के समान गम्भीर स्वर से कहा ॥६४-६८॥ श्री भगवान् बोले-मुनि मृकण्डु की तपस्या के कारण जो मानसिक दुःख तुम देवों को हो गया है उसको मैं भलीभांति जानता हूँ; परन्तु देववृन्द ! वह ऋषि उच्चकोटि के सज्जन हैं । तुम लोगों को उससे किसी प्रकार की बाधा न होगी । सुरश्रेष्ठो ! सज्जन चाहे वैभव से युक्त हो अथवा विपत्तियों से घिरा हो वह स्वप्न में भी किसी प्रकार से दूसरों को कष्ट नहीं पहुँचाता है । वह विषय-वासना रूपी महान् शत्रुओं से बार-बार कष्ट पाता हुआ भी स्वयं की रक्षा न करके वह विद्वान् कैसे दूसरों से द्वेष कर सकता है ? त्रिताप नाम के महान् शत्रु से पीड़ित सज्जन पुरुष किस प्रकार दूसरे को पीड़ित करने का साहस कर सकता है ? जो मन, वचन और कर्म से सर्वदा दूसरों को कष्ट पहुँचाता रहता है, वह नित्य काम, क्रोध आदि के वश में रहने वाला सज्जन नहीं प्रत्युत मूढ़ बुद्धि कहा जाता है ॥६६-७३॥ सज्जनवृन्द ! जो लोकहितकारी मनुष्य ईर्ष्या-हीन और मात्सर्य से विरक्त रहता है, वह इस लोक में तथा परलोक में निःशङ्क रहता है, ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं । सशङ्क प्राणी सर्वदा दुःखी रहते हैं और निःशङ्क सर्वदा सुखभोग करते हैं, इसलिए तुम लोग