भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42

चतुर्थोऽध्यायः २३ परं कौतूहलं ह्यत्र वर्त्ततेऽतीव सूत नः । हरिकीर्तिसुधापाने कस्यालस्यं प्रजायते ॥४६॥ सूत उवाच आसीन्मुनिर्महाभागो मृकण्डुरिति विश्रुतः । शालग्रामे महातीर्थे सोऽतप्यत महातपाः ॥५०॥ युगानामयुतं ब्रह्मन्गृणन्ब्रह्म सनातनम् । निराहारः क्षमायुक्तः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥५१॥ आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यन्विषयनिःस्पृहः । सर्वभूतहितो दान्तस्तताप सुमहत्तपः ॥५२॥ तत्तपःशङ्किताः सर्वे देवा इन्द्रादयस्तदा । परेशं शरणं जग्मुर्नारायणमनामयम् ॥५३॥ क्षीराब्धेरुत्तरं तीरं संप्राप्य त्रिदिवौकसः । तुष्टुवुर्देवदेवेशं पद्मनाभं जगद्गुरुम् ॥५४॥ देवा ऊचुः नारायणाक्षरानन्त शरणागतपालक । मृकण्डुतपसा त्रस्तान्पाहि नः शरणागतान् ॥५५॥ जय देवाधिदेवेश जय शङ्खगदाधर । जयो लोकस्वरूपाय जयो ब्रह्माण्डहेतवे ॥५६॥ नमस्ते देवदेवेश नमस्ते लोकपावन । नमस्ते लोकनाथाय नमस्ते लोकसाक्षिणे ॥५७॥ नमस्ते ध्यानगम्याय नमस्ते ध्यानहेतवे । नमस्ते ध्यानरूपाय नमस्ते ध्यानसाक्षिणे ॥५८॥ केशिहन्त्रे नमस्तुभ्यं मधुहन्त्रे परात्मने । नमो भूम्यादिरूपाय नमश्चैतन्यरूपिणे ॥५९॥ नमो ज्येष्ठाय शुद्धाय निर्गुणाय गुणात्मने । अरूपाय स्वरूपाय बहुरूपाय ते नमः ॥६०॥ नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥६१॥ नमो हिरण्यगर्भाय नमो ब्रह्मादिरूपिणे । नमः सूर्यादिरूपाय हव्यकव्यभुजे नमः ॥६२॥ सूत जी ! इस विषय में हमलोगों को अत्यन्त कौतूहल हो रहा है, आप कृपा कर इसको समझाइये । भगवान् के गुणगान रूपी अमृत के पान करने-में, कौन ऐसा अभागा होगा जिसको आलस्य होगा ? ॥४७-४६॥ सूत जी बोले--मृकण्डु नाम से विख्यात एक महाभाग्यवान् मुनि थे । उस महातपस्वी ने शालग्राम नामक महान् तीर्थ में घोर तप किया । सहस्रों युगों तक उस सत्यसंध, जितेन्द्रिय, क्षमाशील सब प्राणियों के हित में लगे रहने वाले सबमें आत्मभावना रखने वाले उदार मुनि ने निराहार रहकर और विषय-वासनाओं से निःस्पृह होकर महान् तप किया । उनकी तपस्या से भयभीत होकर इन्द्र आदि सब देवता परम प्रभु, निर्विकार नारायण की शरण में गए । क्षीर सागर के उत्तर तट पर जाकर वे स्वर्गवासी देवता जगद्गुरु पद्मनाभ की स्तुति करने लगे ॥५०-५४॥ देवगण बोले-नारायण ! अक्षर ! अनन्त ! शरणागतों का पालन करने वाले ! मृकण्डुमुनि की तपस्या से भयभीत हम लोगों की रक्षा कीजिए । देवाधिदेवेश ! आपकी जय हो । शङ्ख-गदाधारी ! जय हो । लोक स्वरूप की जय हो । ब्रह्माण्ड के आदि कारण की जय हो । देवदेवेश ! आपको नमस्कार है । लोक पावन ! नमस्कार है । लोकनाथ को नमस्कार हैं । लोकसाक्षी को नमस्कार है । ध्यान से प्राप्त करने योग्य को नमस्कार है । ध्यान के हेतु को नमस्कार है । ध्यानरूप और ध्यान के साक्षी को नमस्कार है । केशी के हन्ता ! तुमको नमस्कार है । परात्मा मधुसूदन को नमस्कार है । भू सृष्टि के आदि रूप को नमस्कार है । चैतन्य रूप को नमस्कार है ॥५५-५९॥ ज्येष्ठ, शुद्ध, निर्गुण और सगुण ईश को नमस्कार है । अरूप, सरूप, और बहुरूप को नमस्कार है । विप्र वेद रक्षक देव को, गो ब्राह्मणों के हित करने वाले, जगत् के कल्याणकर्त्ता कृष्ण गोविन्द को नमस्कार है, हिरण्यगर्भ, ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप धारण करने वाले को नमस्कार है । सूर्य आदि रूप वाले, हव्य (देवाहुति) कव्य (पितृ