बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः ३६ एकदा तस्य भूपस्य सर्वसंपद्विनाशकृत् । अहंकारो महाञ्जज्ञे सासूयो लोपहेतुकः ॥१०॥ अहं राजा समस्तानां लोकानां पालको बली । कर्त्ता महाक्रतूनां च मत्तः पूज्योऽस्ति कोऽपरः ॥११॥ अहं विचक्षणः श्रीमान्जिताः सर्वे मयारयः । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः ॥१२॥ अजेयोऽव्याहतैश्वर्यो मत्तः कोऽन्योऽधिको भुवि । अहंकारवशस्यैवं जातासूया परेष्वपि ॥१३॥ असूयातोऽभवत्कामस्तस्य राज्ञो मुनीश्वर । एषु स्थितेषु तु नरो विनाशं यात्यसंशयम् ॥१४॥ यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता । एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ॥१५॥ तस्यासूया तु महती जाता लोकविरोधिनी । स्वदेहनाशिनी विप्र सर्वसंपद्विनाशिनी ॥१६॥ असूयाविष्टमनसि यदि संपत्प्रवर्त्तते । तुषाग्नि वायुसंयोगमिव जानीहि सुव्रत ॥१७॥ असूयोपेतमनसां दम्भाचारवतां तथा । परुषोक्तिरतानां च सुखं नेह परत्र च ॥१८॥ असूयाविष्टचित्तानां सदा निष्ठुरभाषिणाम् । प्रिया वा तनया वापि बान्धवा अप्यरातयः ॥१९॥ मनोभिलाषं कुरुते यः समीक्ष्य परस्त्रियम् । स स्वसंपद्विनाशाय कुठारो नात्र संशयः ॥२०॥ यः स्वश्रेयोविनाशाय कुर्याच्चेतं नरो मुने । सर्वेषां श्रेयसं दृष्ट्वा स कुर्यान्मत्सरं कुधीः ॥२१॥ मित्रापत्यगृहक्षेत्रधनधान्यपशुष्वपि । हानिमिच्छन्नरः कुर्यादसूयां सततं द्विज ॥२२॥ अथ तस्याविनीतस्य ह्यसूयाविष्टचेतसः । हैहयास्तालजंघाश्च बलिनोऽरातयोऽभवन् ॥२३॥ यस्यानुकूलो लक्ष्मीशः सौभाग्यं तस्य वर्द्धते । स एव विमुखो यस्य सौभाग्यं तस्य हीयते ॥२४॥
सत्ता मिटा देने वाला और ईर्ष्या युक्त अहंकार उत्पन्न हो गया । वह सोचने लगा कि मैं समस्त लोगों का स्वामी हूँ, पालक हूँ और सर्व शक्तिसम्पन्न हूँ, बड़े-बड़े यज्ञों का कर्त्ता हूँ । मुझसे बढ़कर दूसरा कौन पूज्य है ? ॥८-११॥ मैं विद्वान् हूँ श्रीमान् हूँ, सब शत्रुओं को मैंने जीत लिया है, वेद-वेदाङ्गों के तत्त्व को जानने वाला और नीति कुशल मैं ही हूँ । मैं अजेय हूँ समस्त ऐश्वर्य मेरे यहाँ केन्द्रीभूत है । मुझसे बढ़कर इस पृथ्वी पर दूसरा कौन है ? इस प्रकार अहंकार हो जाने पर दूसरों के प्रति भी उसको असूया होने लगी । मुनीश्वर ! इस प्रकार असूया बुद्धि (गुणों में दोषों का देखना) हो जाने पर उस राजा के हृदय में काम (इच्छा) जागरित हो गया । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि इस प्रकार असूया होने पर मनुष्य का नाश अवश्यम्भावी है । युवावस्था, सम्पत्ति, अधिकार मद, अज्ञान इनमें से प्रत्येक अनर्थ की सृष्टि करते हैं । फिर जहाँ ये चारों जुट जाँय वहाँ तो कुछ कहना ही नहीं । उसके हृदय में इस प्रकार की लोकविरोधिनी, स्वदेहनाशिनी और सब सम्पत्तियों को धूल में मिला देने वाली असूया उत्पन्न हो गई ॥१२-१६॥ सुव्रत ! ऐसी असूया रखने वाले व्यक्ति के पास धन हो जाता है तब तो समझो कि तुषाग्नि सुलगती हुई को वायु के झोंक मिल गये । ईर्ष्यालु, दम्भी, और कटुभाषी व्यक्ति को कभी भी लोक और परलोक में सुख नहीं मिलता है । असूया से भरे हृदय वाले और सर्वदा अप्रिय वचन बोलने वाले व्यक्तियों के भाई बन्धु यहाँ तक कि भार्या भी शत्रु हो जाती है । जो दूसरे की स्त्री को देख कर मन में बुरी भावना रखता है वह अपनी संपत्ति नाश का एक मात्र कारण (कुठार) बन जाता है । मुने ! यदि कोई अपने कल्याण का नाश करना चाहे तो वह मूर्ख दूसरों की सम्पत्ति देखकर ईर्ष्या करना सीखे । द्विज ! यदि कोई मित्र, सन्तान, भवन, क्षेत्र, धन, अन्न और पशुओं का नाश चाहता हो तो वह सर्वदा ईर्ष्या करे ॥१७-२२॥ उस राजा की उद्दण्डता और मात्सर्य भाव को देखकर हृदय, ताल जङ्घ आदि बली पड़ोसी राजा शत्रु हो गए । लक्ष्मीपति विष्णु जिसके अनुकूल होते हैं उसकी विभूति बढ़ती है परन्तु वही जिसके प्रतिकूल हो जाते हैं तो उसका सारा वैभव शीघ्र नाशोन्मुख हो जाता है । नारद !