भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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४० नारदीयपुराणम् तावत्पुत्राश्च पौत्राश्च धनधान्यगृहादयः । यावदीक्षेत लक्ष्मीशः कृपापाङ्गेन नारद ॥२५॥ अपि मूर्खान्धबधिरजडाः शूरा विवेकिनः । श्लाघ्या भवन्ति विप्रेन्द्र प्रेक्षिता माधवेन ये ॥२६॥ सौभाग्यं तस्य हीयेत यस्यासूयादिलाञ्छनम् । जायते नात्र संदेहो जन्तुद्वेषो विशेषतः ॥२७॥ सततं यस्य कस्यापि यो द्वेषं कुरुते नरः । तस्य सर्वाणि नश्यन्ति श्रेयांसि मुनिसत्तम ॥२८॥ असूया वर्द्धते यस्य तस्य विष्णुः पराङ्मुखः । धनं धान्यं मही संपद्विनश्यति ततो ध्रुवम् ॥२९॥ विवेकं हन्त्यहंकारस्तद्विवेकात्तु जीविनाम् । आपदः संभवन्त्येवेत्यहंकारं त्यजेत्ततः ॥३०॥ अहंकारो भवेद्यस्य तस्य नाशोऽतिवेगतः । असूयाविष्टमनसस्तस्य राज्ञः परैः सह ॥३१॥ आयोधनमभूद्घोरं मासमेकं निरन्तरम् । हैहयैस्तालजङ्घैश्च रिपुभिः स पराजितः ॥३२॥ स तु बाहुस्ततो दुःखी अन्तर्वत्न्या स्वभार्यया । अवाप परमां तुष्टिं तत्र दृष्ट्वा महत्सरः ॥३३॥ असूयोपेतमलसस्तस्य भावं निरीक्ष्य च । सरोगतविहङ्गास्ते लीनाश्चित्रमिदं महत् ॥३४॥ अहो कष्टमहो रूपं घोरमत्र समागतम् । विशन्तस्त्वरया वासमित्यूचुस्ते विहङ्गमाः ॥३५॥ सोऽवगाह्य सरो भूपः पत्नीभ्यां सहितो मुदा । पीत्वा जलं च सुखदं वृक्षमूलमुपाश्रितः ॥३६॥ तस्मिन्बाहौ वनं याते तेनैव परिरक्षिताः । दुर्गुणान्विगणय्यास्य धिग्धिगित्यब्रुवन्प्रजाः ॥३७॥ यो वा को वा गुणी मर्त्यः सर्वश्लाघ्यतरो द्विजः । सर्वसंपत्समायुक्तोऽप्यगुणी निंदितो जनैः ॥३८॥ मनुष्य की धन-सम्पत्ति-पुत्र, पौत्र, धान्य और गृह आदि तभी तक बढ़ते हैं जब तक उसके ऊपर भगवान् की कृपा । दृष्टि बनी रहती है ॥२३-२५॥ विप्रेन्द्र ! जब तक माधव की कृपा दृष्टि मनुष्य पर बनी रहती है तब तक चाहे वह मूर्ख, अन्धा, बहिरा, भी क्यों न हो परन्तु वह विवेकी, शूर और लोक में आदरणीय रहता है। उस मनुष्य का सौभाग्य शीघ्र नष्ट हो जाता है जो असूया रूपी कलंक से अथवा विशेष रूप से प्राणी-ईर्ष्या से कलंकित हो जाता है। जो मनुष्य जिस किसी व्यक्ति से सर्वदा द्वेष करता रहता है उसके सारे श्रेय नष्ट हो जाते हैं। मुनिश्रेष्ठ ! जिसके हृदय में असूया रहती है उससे भगवान् असन्तुष्ट हो जाते हैं और उसके बाद धन-धान्य, भूमि, संपत्ति आदि शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, यह ध्रुव सत्य है ॥२६-२९॥ अहंकार विवेक को नष्ट कर देता है। अविवेक से आपत्तियाँ आ जाती हैं। इसलिए अहंकार को कभी भी पास नहीं फटकने देना चाहिए। जिसको अहंकार हो जाता है, उसका शीघ्र नाश हो जाता है। उस असूया के कारण उस ईर्ष्यालु राजा से शत्रुओं ने घोर युद्ध किया । हैहय-तालजङ्घ आदि रिपुओं से एक मास तक सतत युद्ध होता रहा, जिसमें वह राजा पराजित हुआ । ॥३०-३२॥ निदान, दुःखी होकर वह राजा अपनी गर्भिणी पत्नी को साथ लेकर भटकता हुआ एक बहुत बड़े सरोवर के पास पहुँचा। सरोवर को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ परन्तु उसकी असूया-भावना को देखकर उस तालाब के पक्षी आदि जीव छिप गए, यह आश्चर्य जनक घटना हुई। उस राजा को देख कर पक्षी आपस में कहने लगे कि 'अहा ! बड़ा अनर्थ हुआ यहाँ महाभयङ्कर प्राणी आ गया तुम लोग शीघ्र सरोवर में घुस जाओ। वह राजा प्रसन्नता पूर्वक पत्नी सहित सरोवर में स्नान कर और जल पान कर एक वृक्ष की सुखद छाया में बैठ गया । ॥३३-३६॥ उस बाहु राजा के इस प्रकार वन में चले जाने पर उनके ही शासन और रक्षा में रहने वाली प्रजा उनके अवगुणों का स्मरण कर धिक्कारने लगी। द्विज ! चाहे मनुष्य गुणवान् हो या न हो परन्तु सम्पत्तिशाली होने पर वह आदरणीय समझा जाता है। वही जब विभवहीन हो जाता है तब मनुष्यों द्वारा निन्दित होता है। इस संसार में अपयश के समान मृत्यु भी कष्टकर नहीं है। जब राजा बाहु वन को चला गया तब उससे राग करने