बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६८ नारदीयपुराणम् संस्कारादिकलंबनमंगुलाद्यं प्रजायते । सेष्वंशोनाः सितं तिथयो बलन्नाशोन्र्नतं विधोः ॥१६६॥ शृङ्गमन्यत्र उद्वाच्यं वलनांगुललेखनात् । पंचर्तवोऽगोंकविशिखाः शेषकर्णहताः पृथक् ॥१६७॥ विक्रुक्य्यकांगसिद्धानिमक्तालब्धोनसंयुताः । त्रिज्याधिकोने श्रवणे वपंषि स्युर्हताः कुजात् ॥१६८॥ ऋज्वोर्ऋज्वोविवरं गत्यंतरविभाजितम् । वक्रत्वोर्गतिंयोगामं गम्येऽतीते दिनादिकम् ॥१६९॥ खनत्थासंस्कृतौष्वेषदक्सास्येन्यैतरं युतिः । याम्योदक्खेटविवरं मानैक्याद्धोल्पकं यदा ॥१७०॥ यदा भेदोर्लंबनाद्यं स्फुटार्थं सूर्यपर्ववत् । एकायनगतौ स्यातां सूर्याचन्द्रमसौ यदा ॥१७१॥ तयुते मंडले क्रांत्यौ तुल्यत्वे वै धृताभिधः । विपरीतयनगतौ चंद्राकौं क्रांतिलिप्तिकाः ॥१७२॥ समास्तदा व्यतीपातो भगणार्द्धं तयोयुतौ । भास्करेंद्रोर्भचक्रांतचक्राद्धंविधिसंस्थयोः ॥१७३॥ लब्धि हो, उतना अंगुल संस्कार-दिशा का वलन होता है। चन्द्रमा से जिस दिशा में सूर्य रहता है, वही संस्कार की दिशा समझी जाती है। तिथि में अपना पञ्चमांश घटाने से शुक्ल (चन्द्र के श्वेत भाग) का अंगुलादि मान होता है। वलन की जो दिशा होती है, उस दिशा का चन्द्रशृङ्ग उन्नत और अन्य दिशा में नत होता है। उसके अनुसार परिखे करना चाहिए ॥१६५-१६६३॥ ग्रहयुति-ज्ञानार्थ मंगलादि पाँच ग्रहों के विम्ब-साधन - मंगलादि के ग्रहों के ५, ६, ७, ६, ५ इन मध्यमविम्बमानों को क्रम से मंगलादि ग्रहों के कर्णशेष (त्रिज्या और अपने-अपने शोध कर्ण के अन्तर) से गुणा करके गुणनफल को २ स्थानों में रखे । एक स्थान में मंगलादि ग्रह के क्रम से २१, १२, ६, २४ और ३ का भाग देकर लब्धि को द्वितीय स्थान में स्थित गुणनफल में, यदि कर्ण त्रिज्या से अधिक हो तो घटाये, यदि त्रिज्या से अल्प हो तो जोड़े, फिर उसमें ३ से भाग दे तो क्रमशः मंगलादि ग्रहों के बिम्ब-प्रमाण होते हैं ॥१६७-१६८।। ग्रहों की युति के गत-गम्य दिन-साधन- जिन दो ग्रहों के युतिकाल का ज्ञान करना हो, वे दोनों मार्गी हों, अथवा दोनों वक्रो हों तो दोनों की गतियोंगकला से भाग देना चाहिए । फिर जो लब्धि आए, वह ग्रह युति के गतथा गम्य दिनादि होते हैं ॥१६६॥ ग्रहों की युति में भेद-ज्ञान - जिन दो ग्रहों की युति होती हो, उन दोनों के अपनी-अपनी नति से संस्कृत शर (भूपृष्ठस्थानाभिप्रायिक शर) एक दिशां के हों तो अन्तर, यदि भिन्न दिशा के हों तो योग करने से दोनों ग्रहों का अन्तर (दक्षिणोत्तरान्तर) होता है ! यह अन्तर यदि दोनों के बिम्बमान योगार्ध से अल्प हो तो उनके उनके योग में भेद (एक से दूसरा आच्छादित) होता है। इसलिए इनमें नीचे वाले को छादक और ऊपर वाले को छाद्यक और ऊपर वाले को छाद्य मानकर सूर्यग्रहण के समान ही लम्बून, ग्रासमान आदि करना चाहिए ॥१७०-१७१३॥ पाताधिकार-पात की संज्ञा - जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों एक हो अयन (याम्यायन-दक्षिणायन अथवा सौम्यायन - उत्तरायण) में हों तथा उन दोनों के राश्यादि योग १२ राशि हो तो उस स्थिति में दोनों के क्रान्तिसाम्य होने पर वैधृति नाम का पात कहता है। तथा जब दोनों भिन्न (पृथक्पृथक्) अयन में हों और दोनों का योग ६ राशि हो तो उस स्थिति में दोनों के क्रान्तिसाम्य होने पर व्यतीपात नामक पात होता है ॥१७२-१७३३॥