बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६६ दृक्कल्पसाधितांशादियुक्तयोः स्वावपक्रमौ । अथोजपदगम्येदोः क्रांतिविक्षेपसंस्कृता ॥१७४॥ यदि स्यादधिका भानोः क्रांतेः पातो गतस्तदा । न्यूना चेत्स्यात्तदा भावी वामं युग्मपदस्य च ॥१७५॥ यदान्यत्वं विधोः क्रांतिः क्षेपाच्चेद्यदि शुद्धयति । क्रांत्योर्जेत्रिज्ययाभिस्ते परमापक्रमोद्धृते ॥१७६॥ तच्चापांतमर्द्धवायोज्यंभाविनशीतगौ । शोध्यं चंद्राद्गते पाते तत्सूर्यगतिताडितम् ॥१७७॥ चंद्रभुक्त्या हृते भानौ लिप्तादिशशिवत्फलम् । तद्वच्छशांकपातस्य फलं देयं विपर्ययात् ॥१७८॥ कर्मैतदसकृत्तावत्क्रांतो यावत्समेतयोः । क्रांत्योः समत्वे पातोऽथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधौ ॥१७६॥ हीनेऽर्द्धरात्रिकाद्घातो भावो तात्कालिकेऽधिका । स्थिरीकृतार्द्धरात्राद्वौ द्वयोविवरलिप्तकाः ॥१८०॥ षष्टिघ्नाचंद्रभुक्त्याप्ता पातकालस्य नाडिकाः । रवींन्द्वोर्मानयोगाद्धं षष्टचा संगुण्य भाजयेत् ॥१८१॥ जब सूर्य-चन्द्र का अन्तर चक्र शून्य या ६ राशि हो उस समय में तात्कालिक अयनांशादि से युक्त सूर्य और चन्द्रमा की अपनी-अपनी क्रान्ति का साधन करे । चन्द्रमा के विषम पद में होने पर यदि चन्द्रमा की क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अधिक हो तो पात को रात समझना चाहिए तथा यदि चन्द्रमा की क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अल्प हो तो पात को भावी समझना चाहिए। चन्द्रमा के समपद में स्थित होने पर विपरीत (चन्द्रमा की क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अधिक हो तो पात को भावी, यदि अल्प हो गत) समझना चाहिए । यदि क्रान्तिशर-संस्कार (स्पष्टक्रान्ति बनाने) में चन्द्र की मध्या क्रान्ति, शर में घटायी जाय तो चन्द्रमा के स्थानीय पद और बिम्बीय पद में भिन्नता होती ॥१७३-१७५३॥ दोनों की 'क्रान्तिज्या' को त्रिज्या से गुणा करके उसमें परम क्रान्तिज्या से भाग देकर जो लब्धियां हों, उन दोनों के चाप बनाकर उन दोनों चापों के अन्तर को सम्पूर्ण या अर्ध (कुछ न्यून) करके गम्य पात हो तो चन्द्रमा में जोड़े; गतपात हो तो घटाये। इस प्रकार पात मध्य कालासन्न चन्द्र होता है। पुनः उपर्युक्त चाप के अन्तर या उसके अर्ध को सूर्य की गति से गुणा करके गुणनफल में चन्द्रगति से भाग देकर जो लब्धि (कलादि) हो, उसको चन्द्रमा के समान हो सूर्य में संस्कार करे (गतपात में जोड़े, गम्य पात में घटाये) तो पातकालासन्र समय का सूर्य, होता है। चन्द्रपात का सूर्यफलसाधन के समान (पूर्वोक्त लब्ध चापान्तर या उसके आधे को चन्द्रपात गति से गुणा करके चन्द्रगति से भाग दे) प्राप्त फल को चन्द्रपात में विपर्यय (गम्यपात को चन्द्रपात से घटाये, गतपात में जोड़े) करने पर पातकालासन्र समय का चन्द्रपात होता है। फिर इन तीनों (रवि चन्द्र और चन्द्रपात) के द्वारा उपर्युक्त क्रिया को तब तक बार-बार करता रहे जब तक दोनों की क्रान्ति सम न हो जाय ॥१७६-१७८३॥ इस प्रकार क्रान्ति-साम्य होने पर पात समझना चाहिए। यदि उपर्युक्त क्रिया द्वारा प्राप्त अंशादि से युक्त या हीन किया हुआ चन्द्रमा अर्धरात्रिकालिक साधित चन्द्रमा से अल्प (पीछे) हो तो पातकाल को 'गत' समझे और यदि अधिक (आगे) हो तो पातकाल को भावी समझे ॥१७९३॥ (अर्धरात्रि से गत, गम्य पातकाल का ज्ञान)--उपर्युक्त क्रिया द्वारा स्थिरीकृत (पातकालिक) चन्द्रमा और अर्धरात्रिकालिक चन्द्रमा जो हों इन दोनों की अन्तरकला को ६० से गुणा करके गुणनफल में चन्द्र की गति-कला से भाग देने पर जो लब्धि हो, उतनी घटी अर्धरात्रि से पीछे या आगे (गत पात में पीछे, गम्य पात में आगे) तक पातकाल की घड़ी समझी जाती है ॥१८०३॥ (पात के स्थितिकाल, आरंभ तथा अन्तकाल का साधन) - सूर्य तथा चन्द्रमा के बिम्बयोगार्ध को ६० से गुणा करके गुणनफल में सूर्य-चन्द्र की गत्यन्तरकला से भाग देकर जो लब्धि हो, वह पात की स्थित्यर्ध घड़ी