बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०० नारदीयपुराणम् तयोर्भुक्त्यंतरेणाप्तं स्थित्यमर्द्धां नाडिकादिवत् । पातकालः स्फुटो मध्यः सोऽपि स्थित्यर्द्ध- ॥१७६॥ वर्जितः तस्य संभवकालः स्यात्तत्संयोगेक्तसंज्ञकः । आद्यंतकालयोर्मध्ये कालो ज्ञेयोऽतिदारुणः ॥१७७॥ प्रज्वलज्ज्वलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः । इत्येतद्गणिते किंचित्प्रोक्तं संक्षेपतो द्विज । ॥१७८॥ जातकं वच्मि समयाद्राशिसंज्ञापुरःसरम् इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे ज्योतिषवर्णनं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५४॥ अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच मूर्द्धास्यबाहुहृत्क्रोडांतर्बस्तिव्यंजनसोनखः । जानुजंघांघ्रियुगलं कालांगानि क्रियादयः ॥१॥ भौमास्फुजिबुधेंदुश्च रविसौम्यसिताः कुजः । गुरुमंदाकिगुरवो मेषादीनामधीश्वराः ॥२॥ होती है। इसको पात के स्पष्ट मध्यकाल में घटाने से पात का आरम्भकाल होता है और जोड़ने से अन्तकाल अन्तकाल होता है। पात के आरंभकाल से अन्तकाल तक जो मध्य का काल है, वह प्रज्वलित अग्नि के समान अत्यन्त भयानक होता है। जो सब कार्य में निषिद्ध है। ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने गणितस्कन्ध में संक्षेप से कुछ (उपयोगी) विषयों का प्रतिपादन किया है। अब (अगले अध्याय में) राशियों के संज्ञादि कथनपूर्वक जातक का वर्णन करूंगा ॥१७६-१७८॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग के द्वितीयपाद में ज्योतिषवर्णन नामक चौवनवां अध्याय समाप्त ॥५४॥ अध्याय ५५ त्रिस्कन्ध ज्योतिष का जातकस्कन्ध सनन्दन बोले-नारद ! मेष आदि राशियां कालपुरुष के क्रमशः मस्तक, मुख, बाहु, हृदय, उदर, कटि, बस्ति (पेड़ू), लिंग, ऊरु, जानु, जंघा और दोनों चरण हैं ॥१॥ मंगल, शुक्र, बुध, चन्द्रमा, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शनि तथा गुरु-ये क्रमशः मेष आदि राशियों के अधीश्वर (स्वामी) हैं ॥२॥ विषम राशियों