भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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४०२ नारदीयपुराणम् सिंहोक्षाविस्त्रघटतौलिकुंभाः सूर्यात्तिकोणभम् । चतुरस्रं तूर्यमृत्युकत्रिकोणं नवपंचमम् ॥११०॥ रिःफाष्टषट्कं त्रिकभं केंद्रं प्रावतूर्यसप्तखम् । नृपादः कीटपशवो बलाढ्याः केंद्रगाः क्रमात् ॥१११॥ केंद्रात्परं पणफरमापोक्लिममतः परम् । रक्तः श्वेतः शुकनिभः पाटलो धूम्रपांडुरौ ॥११२॥ चित्रः कृष्णः पीतपिंगौ बभ्रुः स्वच्छः प्रभाक्रियात् । साम्याशाद्यप्लवत्वं स्याद्वितीये वेशिरर्कभात् ॥११३॥ कालात्माकौ मनश्चंद्रः कुजः सत्वं वचो बुधः । जीवो ज्ञानं सुखं शुक्रः कामो दुःखं दिनेशजः ॥११४॥ नृपौ रवीन्दू नेत्तासृक् कुमारो ज्ञः कवीज्यकौ । सचिवो सूर्यजः प्रेष्यो मतो ज्योतिर्विदांवरैः ॥११५॥ ताम्रशुक्लरक्तहरित्पीतचित्रासिता रवेः । वर्णा वञ्न्वयहरींद्रा शचीकौधिपारवेः ॥११६॥ रविशुक्रारराहुकेंदुविद्बीज्या दिगीश्वराः । क्षीणेंद्वर्काररविजाः पापा पापयुतो बुधः ॥११७॥ क्लीबौ बुधार्की शुक्रेन्दू स्त्रियौ शेषा नराः स्मृताः । शिखिभूमिययोवारिवासिनो भूसुतादयः ॥११८॥ आदि बारह भाव हैं ॥६॥ सूर्य का सिंह, चन्द्रमा का वृष, मंगल का मेष, बुध का कन्या, गुरु का धन, शुक्र का तुला और शनि का कुम्भ मूल त्रिकोण कहा गया है। चतुर्थ और अष्टमभाव की चतुरस्र संज्ञा है। नवम और पञ्चम की त्रिकोणसंज्ञा है ॥११०॥ द्वादश, अष्टम और षष्ठ का नाम त्रिक है; लग्न चतुर्थ, सप्तम और दशम को केन्द्र कहा जाता है। द्विपद, जलचर, कीट और पशु—ये राशियां क्रमशः केन्द्र में बली होती हैं (अर्थात् द्विपद लग्न में, जलचर चतुर्थ में, कीट सातवें में और पशु दसवें में बली होता हैं) ॥१११॥ केन्द्र के बाद के स्थान (२, ५, ८, ११ ये) 'पणफर' कहे गये हैं। और पणफर के बाद के स्थान (३, ६, ९, १२—ये) आपो- क्लिम कहलाते हैं। मेष का स्वरूप रक्तवर्ण, वृष का श्वेत, मिथुन का शुक के समान हरित, कर्क का पाटल (गुलाबी), सिंह का धूम्रवर्ण, कन्या का पाण्डुवर्ण (गौर), तुला का चितकबरा, वृश्चिक का कृष्णवर्ण, धनु का पीत वर्ण, मकर का पिंग वर्ण, कुम्भ का बभ्रू (भूरा) और मीन का स्वच्छ वर्ण है। इस प्रकार मेष से लेकर सब राशियों की कान्ति का वर्णन किया गया है। सभी राशियां अपने स्वामी की दिशा की ओर झुकी रहती हैं। सूर्याधिष्ठित राशि से दूसरे का नाम 'वेशि' है ॥११२-१३॥ ग्रहों के शील, गुण आदि का निरूपण--सूर्यदेव कालपुरुष के आत्मा, चन्द्रमा मन, मंगल पराक्रम, बुध वाणी, गुरु ज्ञान एवं सुख, शुक्र काम और शनैश्चर दुःख हैं ॥११४॥ सूर्य चन्द्रमा राजा, मंगल सेनापति, बुध राजकुमार बृहस्पति तथा शुक्र मंत्री और शनैश्चर सेवक या दूत हैं। यह ज्योतिष शास्त्र के श्रेष्ठ विद्वानों का कथन है ॥११५॥ सूर्यादि ग्रहों के वर्ण इस प्रकार हैं। सूर्य का ताम्र, चन्द्रमा का शुक्ल, मंगल का रक्त, बुध का हरित, बृहस्पति का पीत, शुक्र का चित्र (चितकबरा) तथा शनैश्चर का काला है। अग्नि, जल, कार्तिकेय, हरि, इन्द्र, इन्द्राणी और ब्रह्मा—ये सूर्यादि ग्रहों के स्वामी हैं ॥११६॥ सूर्य, शुक्र, मंगल, राहु, शनि, चन्द्रमा, बुध तथा बृहस्पति—ये क्रमशः पूर्व, अग्निकोण, दक्षिण, नैर्ऋत्यकोण, पश्चिम, वायव्यकोण, उत्तर तथा ईशानकोण के स्वामी हैं। क्षीण चन्द्रमा, सूर्य, मंगल और शनि--ये पापग्रह हैं—पापग्रह से युक्त होने पर बुध भी पापग्रह हो जाता है ॥११७॥ बुध और शनि नपुंसक; शुक्र और चन्द्रमा स्त्री तथा शेष सभी (रवि, मंगल, गुरु) ग्रह पुरुष हैं। मंगल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि—ये क्रमशः अग्नि, भूमि, आकाश, जल तथा वायु—इन तत्त्वों के