बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०३ कवीज्यौकुजसूर्यो च वेदो ज्ञो वर्णपाःक्रमात् । सौरोंऽत्यजाधिपः प्रोक्तोराहुम्लेंच्छाधिपस्तथा ॥१९६॥ चंद्रार्कजीवाज्ञसितौ कुजार्की सात्त्विकादिकाः । देवतेंऽग्निखैलाभूकोसखायोपराधिपाः ॥२०॥ वस्त्रं स्थलं नवं वह्निकहतं मद्यदं तथा। स्फुटितं रवितस्ताम्रं तारं ताम्रपुनिस्तथा ॥२१॥ हेमकांस्यायसी व्यंशैः शिशिराद्याः प्रकीर्तिताः । सौरशुकारचंद्रज्ञगुरुष्वृत्सु च क्रमात् ॥२२॥ व्याशत्रिकोणतुर्याष्टसप्तमान्येन वृद्धितः । सौरेज्यारापरे पूर्ण क्रमात्पश्यंति नारद ॥२३॥ अयनक्षणघस्रतु मासाद्धंशरदो रवेः । कटुतिक्तक्षारमिश्रमधुराम्लकषायकाः ॥२४॥ त्रिकोणात्सांत्यधाधर्मायुः सुखखोप्यपः सुहृत् । जीवो जीवज्ञौ सितज्ञौ व्यर्का व्याराः क्रमादमी ॥२५॥ वींर्द्धर्का विकुजेंद्वर्काः सुहृदोऽन्येरवेधूंताः । मिथोधनव्ययात्त्रिबंधुव्यापारगः सुहृत् ॥२६॥ स्वामी हैं ॥१८॥ शुक्र और गुरुब्राह्मण वर्ण के स्वामी हैं। भौम तथा रवि क्षत्रिय वर्ण के स्वामी हैं। चन्द्रमा वैश्य वर्ण के तथा बुध शूद्र वर्ण के अधिपति हैं। शनि अन्त्यजों के तथा राहु म्लेच्छों के स्वामी हैं ॥१९६॥ चन्द्रमा, सूर्य और वृहस्पति सत्त्वगुण के, बुध और शुक्र रजोगुण के तथा मंगल और शनैश्चर तमोगुण के स्वामी हैं। सूर्य देवताओं के, चन्द्रमा जल के, मंगल अग्नि के, बुध क्रीडा-विहार के, वृहस्पति भूमि के, शुक्र कोष के, शनैश्चर शयन के तथा राहु ऊसर के स्वामी हैं ॥२०॥ स्थूल (मोटे सूत से बना हुआ), नवीन, अग्नि से जला हुआ, जल से भीगा हुआ, मध्यम (न नया न पुराना), सुदृढ़ (मजबूत) तथा फटा हुआ, इस प्रकार क्रम से सूर्य आदि ग्रहों के वस्त्र है। ताम्र (ताँबा), मणि, सुवर्ण, कांसा, चाँदी, मोती और लोहा-ये क्रमशः सूर्य आदि ग्रहों के धातु हैं। शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमन्त-ये क्रम से शनि, शुक्र, मंगल, चन्द्र, बुध तथा गुरु को ऋतु हैं। लग्न में जिस ग्रह का द्रेष्काण हो, उस ग्रह की ऋतु समझी जाती है ॥२१-२२॥ (ग्रहों की दृष्टि-) नारद ! सभी ग्रह अपने-अपने आश्रित स्थान से तीसरे व दसवें ३, १० स्थान को एक चरण से; ५वें, ९वें स्थान को दो चरण से ४थे, ८वें स्थान को तीन चरण से और सप्तम स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। किन्तु ३, १० स्थान को शनि; ५, ९ को गुरु तथा ४, ८ को मंगल पूर्ण दृष्टि से देखते हैं ॥२३॥ (ग्रहों के कालमान-) अयन (६ मास), मुहूर्त्त (२ घड़ी), अहोरात्र, ऋतु, (२ मास), मास, पक्ष तथा वर्ष-ये क्रम से सूर्य आदि ग्रहों के कालमान हैं। तथा कटु (मिर्च आदि), लवण, तिक्त (निम्बादि), मिश्र (सब रसों का मेल), मधुर, अम्ल (खट्टा) और कषाय (कसैला) ये क्रमशः सूर्य आदि ग्रहों के रस हैं ॥२४॥ (ग्रहों की स्वाभाविक बहुसम्मत मैत्री-) ग्रहों के जो अपने-अपने मूल त्रिकोण स्थान कहे गये हैं, उस (मूल त्रिकोण) स्थान से २, १२, ५, ९, ८, ४ इन स्थानों के तथा अपने उच्च स्थानों के स्वामी ग्रहमित्र होते हैं और इनसे भिन्न (मूल त्रिकोण से १, ३, ६, ७, १०, ११) स्थानों के स्वामी शत्रु होते हैं। (मतान्तर से ग्रह मैत्री-) अन्य विद्वानों के मत से सूर्य का बृहस्पति, चन्द्र के गुरु बुध, मंगल के शुक्र- बुध, बुध के रवि को छोड़कर शेष सब ग्रह, गुरु के मंगल को छोड़कर सब ग्रह, शुक्र के चन्द्र-रवि को छोड़कर अन्य सब ग्रह, और शनि के मंगलग्चन्द्र-रवि को छोड़कर शेष सभी ग्रह मित्र होते हैं ॥२५३॥ (ग्रहों की तात्कालिक मैत्री-) उस-उस समय जो-जो दो ग्रह २, १२ । ३, ११ । ४, १०-इन स्थानों में हों वे भी परस्पर तात्कालिक मित्र होते हैं। (इनसे भिन्न स्थान में स्थित ग्रह तात्कालिक शत्रु होते हैं) इस