भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 423

४०४ नारदीयपुराणम् ष्ट्येकानुमक्ता मयान् ज्ञात्वा मिश्रीदीत्सहजान्मुने । मत्‍कालोधिसुहृन्मित्रपूर्वकन्कल्पयेत्पुनः ॥२७॥ स्वोच्चत्रिकोणगेहा प्रनवांशेस्थानजं बलम् । दिक्षु सौम्येज्ययोः सूर्यारयोः सौरे सिताब्जयोः ॥२८॥ खादृतूद्गनेन्ये तु वक्रे च समागमे । उत्तरस्था दीप्तकराश्चेष्टा वीर्ययुता मताः ॥२९॥ निशींदुकुजसौराश्च सर्वदा ज्ञोहि चापरे । क्रूराः कृष्णे सिते सौम्याः मतं कालबलं बुधैः ॥३०॥ सौरारज्ञेज्यशुक्रं दुसूर्याधिक्यं परस्परम् । पापास्तु बलिनः सौम्या विवक्षाः कण्टकोपने ॥३१॥ क्लीबे तद्दशनाद्वापि चंद्रार्कांशसमं जनुः । स्वांशे पापाः परांशस्थाः सौम्यालग्नं वियोनिजम् ॥३२॥ निर्बलं च तदावेश्यं वियोनेर्जन्म पंडितैः । शीर्षं वक्त्रेगले पादावंसौ पृष्ठमुरस्तथा ॥३३॥ पार्श्वे कुक्षी त्वपानांघ्री मेढ्रमूष्कौ तथा स्फिजौ । पुच्छं चतुष्पदांगेषु मेषाद्या राशयः स्मृताः ॥३४॥ प्रकार स्वाभाविक मैत्री में (मूल त्रिकोण से जिन स्थानों के स्वामी को मित्र कहा गया है—उनमें) २ स्थानों के स्वामी को मित्र, एक स्थान के स्वामी को सम और अनुक्त स्थान के स्वामी को शत्रु समझे। तदनन्तर तात्कालिक मित्र और शत्रु का विचार करके दोनों के अनुसार अधिमित्र, मित्र, सम, शत्रु और अधिशत्रु का निश्चय करना चाहिए ॥२६-२७॥ (ग्रहों के बल का कथन--)अपने-अपने उच्च, मूल-त्रिकोण, गृह और नवमांश में ग्रहों के स्थान सम्बन्धी बल होते हैं। बुध और गुरु को पूर्व (उदय-लग्न) में, रवि और मंगल को दक्षिण (दशम भाव) में, शनि को पश्चिम (सप्तम भाव) में और चन्द्र तथा शुक्र को उत्तर (चतुर्थ भाव) में दिक्‌सम्बन्धी बल प्राप्त होता है। रवि और चन्द्रमा उत्तरायण (मकर से ६ राशि) में रहने पर तथा अन्य ग्रह वक्र और समागम में (चन्द्रमा के साथ) होने पर चेष्टाबल से युक्त समझे जाते हैं। तथा जिन दो ग्रहों में युति होती है, उनमें उत्तर दिशा में रहने वाला भी चेष्टाबल से सम्पन्न समझा जाता है ॥२८-२९॥ चन्द्रमा, मंगल और शनि रात्रि में, बुध दिन और रात्रि दोनों में तथा अन्य ग्रह (रवि, गुरु और शुक्र) दिन में बली होते हैं। कृष्णपक्ष में पापग्रह और शुक्लपक्ष में शुभग्रह बली होते हैं। इस प्रकार विद्वानों ने ग्रहों का कालसम्बन्धी बल माना है ॥३०॥ शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्रमा तथा रवि--ये उत्तरोत्तर बली होते हैं। इस प्रकार यह ग्रहों का नैसर्गिक बल है ॥३०॥ (वियोनि जन्मज्ञान-) (प्रश्न, आधान या जन्म-समय में) यदि पापग्रह निर्बल हों, शुभग्रह बलवान् हों नपुंसक (बुध, शनि) केन्द्र में हों तथा लग्न पर शनि या बुध की दृष्टि हो तो तात्कालिक चन्द्रमा जिस राशि के द्वादशांश में हो, उस राशि के सदृश वियोनि (मानवेतर प्राणी) का जन्म जानना चाहिए। अर्थात् चन्द्रमा यदि वियोनि राशि के द्वादशांश में हो तब वियोनि प्राणियों का जन्म समझना चाहिए। अथवा पापग्रह अपने नवमांश में और शुभग्रह अन्य ग्रहों के नवमांश में हो तथा निर्बल वियोनि राशि लग्न में हो तो भी विद्वान् पुरुष को वियोनि या मानवेतर जीव के हो जन्म का आदेश करना चाहिए ॥३१-३२॥ (वियोनि के अंगों में राशि-स्थान--)१ मस्तक २ मुख, गला, (गर्दन), ३ पैर, कंधा, ४ पीठ, ५ हृदय, ६ दोनों पार्श्व, ७ पेट, ८ गुदा-मार्ग, ९ पिछले पैर, १० लिंग, ११ अंडकोश, १२ चूतड़, तथा पुच्छ-इस प्रकार चतुष्पद आदि (पशु-पक्षी) के अंगों में मेषादि राशियों के स्थान हैं ॥३३-३४॥ (वियोनि वर्ण-ज्ञान-) लग्न में जिस ग्रह का योग हो उस ग्रह के समान और यदि किसी का योग न हो लग्न के नवमांश (राशि-राशिपति) के समान वियोनि का वर्ण (श्याम, गौर आदि रंग) कहना चाहिए। बहुत से ग्रहों के योग या दृष्टि हों तो उनमें जो बली हो या जितने बली हों, उनके सदृश वर्ण कहना चाहिए। लग्न के