बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०६ नारदीयपुराणम् अस्तेऽर्केन्दो कुजार्कौ चेत्पुंस्त्रियोरामयप्रदौ । व्ययखगो युतौ चैकदृष्ट्या मृत्युप्रदौ तयोः ॥४४॥ शुक्राक्र्कौ मातृपितरौ दिवा नक्तं शशीनजौ । मातृष्वसृपितृव्याख्यौ वा पद्मेजि समे शुभौ ॥४५॥ पापद्ष्टे शुभे क्षीणे तुंगे वा लग्नगे यमे । क्षीर्णेदुकुजसंदृष्टे मृत्युमेत्य गता ध्रुवम् ॥४६॥ युगपद्वा पृथक्संस्थौ लग्नेन्दू पापमध्यगौ । यदा तदा गर्भयुता नारी मृत्युमवाप्नुयात् ॥४७॥ लग्नाच्चन्द्राच्च तुर्यस्थैः पापैर्निधनगे कुजे । नष्टेन्दौ कुजखयोश्च बंधुरिष्फगयोमृतिः ॥४८॥ तन्वस्तसंस्थयोर्भौमर्क्योः शस्त्रभवः क्षयः । यन्मासाधिपतिर्नष्टस्तन्मासं संस्रवे त्यजेत् ॥४६॥ लग्नेन्दुगैः शुभैः खेटैस्त्रिकोणाथस्तभखगैः । पापैस्त्रिषष्ठलाभस्थैः सुखी गर्भो रवेक्षितः ॥५०॥ ओजभे पुरुषशोंऽकैर्ज्येंदुलग्नेर्बलान्वितैः । गुर्वर्कौ विषमस्थौ वा पुंजनन्म प्रवदेत्तदा ॥५१॥ युग्मभांशस्थितैस्तेस्तु वक्रेंदुभृगुभिस्तथा । यामस्थानगतैर्वाच्यं स्त्रियो जन्म मनीषिभिः ॥५२॥ द्व्यंगस्था बुधसंदृष्टाः स्वपक्षेयमलंकराः । लग्नं विन्नौजभावस्थः सौरः पुंजनम्कृत्तथा ॥५३॥
हो संतान होती है ॥४३॥ यदि सूर्य से सप्तम भाव में मंगल और शनि हों तो वे पुरुष के लिए और चन्द्रमा से १२, २ में ये दोनों हों तो स्त्री के लिए घातक होते हैं। अथवा उन (शनि मंगल) में एक से युत और अन्य से दृष्ट रवि हो तो वह पुरुष के लिए और चन्द्रमा यदि एक से युत तथा अन्य से दृष्ट हो तो वह स्त्री के लिए घातक होता है ॥४४॥ दिन में गर्भाधान हो तो शुक्र मातृग्रह और सूर्य पितृग्रह होते हैं। रात्रि में गर्भाधान हो तो चन्द्रमा मातृग्रह और शनि पितृग्रह होते हैं। पितृग्रह यदि विषम राशि में हो तो पिता के लिए और मातृग्रह सम राशि में हो तो माता के लिए शुभकारक होता है। यदि पापग्रह बारहवें भाव में स्थित होकर पापग्रह से देखा जाता और शुभग्रह से न देखा जाता हो, अथवा लग्न में शनि हो तथा उस पर क्षीण चन्द्रमा और मंगल की दृष्टि हो तो गर्भाधान होने से स्त्री का मरण होता है ॥४५-४६॥ लग्न और चन्द्रमा दोनों या इनमें से एक भी दो पाप- ग्रहों के बीच में हो तो गर्भाधान होने पर स्त्री गर्भ के सहित (साथ ही) या पृथक् मृत्यु को प्राप्त होती है ॥४७॥ लग्न अथवा चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान में पापग्रह हो, मंगल अष्टम भाव में हो अथवा लग्न से ४, १२वें स्थान में मंगल और शनि हों तथा चन्द्रमा क्षीण हो तो भी गर्भवती स्त्री का मरण होता है ॥४८॥ यदि लग्न में मंगल और सप्तम में रवि हों तो गर्भवती स्त्री का शस्त्र द्वारा मरण होता है। गर्भाधान काल में जिस मास का स्वामी अस्त हो, उस मास में गर्भ का स्राव होता है, इसलिए इस प्रकार के लग्न को गर्भाधान में त्याग देना चाहिए ॥४६॥ आधानकालिक लग्न या चन्द्रमा के साथ अथवा इन दोनों से ५, ९, ७, ४, १०वें स्थान में सब शुभग्रह हों और ३, ६, ११ भाव में सब पापग्रह हों तथा लग्न और चन्द्रमा पर सूर्य की दृष्टि हो तो गर्भ सुखी रहता है ॥५०॥ रवि, गुरु, चन्द्रमा और लग्न--ये विषम राशि एवं विषम नवमांश में हों अथवा रवि और गुरु विषम राशि में स्थित हों तो पुत्र का जन्म कहना चाहिए ॥५१॥ उक्त सभी ग्रह यदि सम राशि और सम नवमांश में हों अथवा मंगल, चन्द्रमा और शुक्र-ये सम राशि में हों तो विद्वानों को कन्या का जन्म कहना चाहिए ॥५२॥ अथवा ये सब द्विस्वभाव राशि में हों और बुध से देखे जाते हों तो अपने-अपने पक्ष के यमल (जुड़वी सन्तान) को जन्म देते हैं। अर्थात् पुरुषग्रह दो पुत्रों को और स्त्रीग्रह दो कन्याओं के जन्मदायक होते हैं। (यदि दोनों प्रकार के ग्रह हों तो एक पुत्र और एक कन्या का जन्म समझना चाहिए।) लग्न से विषम (३, ५ आदि) स्थानों में स्थित शनि भी पुत्र जन्म कारक होता है ॥५३॥