बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०७ मिथो रवीन्दूर्जार्कौ वा पश्यतः समगं रविः । वक्रो वांगविधू ओजे जज्ञौ युग्मौंजसंस्थितौ ॥५४॥ कुजेक्षितेपुमांशे दुहिता क्लीब जन्मदा । समे सितेन्दू ओजस्था ज्ञारांगेज्या नृवीक्षितौ ॥५५॥ लग्नेन्दुसमगौ युग्मस्थाने वा यमलं कराः । ग्रहोदयस्थान्यगंशांत्पश्यति ज्ञे स्वभागगे ॥५६॥ त्रितयं ज्ञांशकाद्युग्मममिश्रैः सममादिशेत् । लग्ने चापांत्यभागस्थे तदंशस्थबलिग्रहैः ॥५७॥ वीर्याढ्यज्ञाकिसंदृष्टैः कोशस्थावहवोगिनः । सितारेज्यार्कचंद्राक्जिांगेशोर्केदवोऽधिपाः ॥५८॥ मासानां तत्समं वाच्यं गर्भस्थस्य शुभाशुभम् । त्रिकोणे ज्ञे परैर्नष्टैर्द्विमुखाङ्घ्रिकपान्वितः ॥५९॥ अवागावाटावशभैर्भसंधिस्थैः प्रजायते । वीरान्सगोश्चदष्टेष्वष्टाकर्तिभसंहिताः ॥६०॥ आराकी चेज्यभांशस्थौ सदंतोगर्भकस्तदा । खभेजे भुवि मंदारदृष्टे कुब्जस्तु गर्भंगः । ॥६१॥ मयुर्मिंने यमेंद्वारैदृष्टेथागेभसंधिगे पापैर्जंडो विधौ गर्भः शुभदृष्टिविवर्जिते । क्रमशः विषम एवं सम राशि में स्थित रवि और चन्द्रमा (१) अथवा बुध और शनि (२) एक-दूसरे को देखते हो, अथवा समराशिस्य सूर्य को विषमराशिस्य मंगल देखता हो (३), अथवा चन्द्रमा सम राशि और लग्न विषम राशि में स्थित हों तथा उन पर मंगल की दृष्टि हो, अथवा लग्न, चन्द्रमा और शुक्र—ये तीनों पुरुष राशि के नवमांश में हों तो इन सब योगों में नपुंसक का जन्म होता है ॥५४३॥ शुक्र और चन्द्रमा सम राशि में स्थित हों तथा बुध, मंगल, लग्न बृहस्पति विषम राशि में स्थित होकर पुरुष ग्रह से दृष्ट हों अथवा लग्न एवं चन्द्रमा सम राशि में हों तो ये यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देते हैं॥५५३॥ यदि बुध अपने (मिथुन या कन्या के) नवमांश में स्थित होकर द्विश्वभाव राशिस्थ ग्रह और लग्न को देखता हो तो गर्भ में तीन सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिए । उनमें दो तो बुध-नवमांश के सदृश होंगे और एक लग्नांश के सदृश । यदि बुध और लग्न दोनों तुल्य नवमांश में हों तो तीनों सन्तानों को एक-सा ही समझना चाहिए॥५६३॥ यदि धनु राशि का अन्तिम नवांश लग्न में हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों और बलवान् बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) संतानों की स्थिति समझनी चाहिए ॥५७३॥ गर्भमासों के अधिपति—शुक्र, मंगल, बृहस्पति, सूर्य, चन्द्रमा, शनि, बुध, आधान-लग्नेश, सूर्य और चन्द्रमा—ये गर्भाधानकाल से लेकर प्रसवपर्यन्त १० मासों के क्रमशः स्वामी हैं। आधानसमय में जो ग्रह बलवान् या निर्बल होता है, उसके मास में उसी प्रकार शुभ या अशुभ फल होता है ॥५८३॥ बुध त्रिकोण (५, ६,) में हो और अन्य ग्रह निर्बल हों तो गर्भस्थ शिशु के दो मुख, चार पैर और चार हाथ होते हैं। चन्द्रमा वृष में हो और अन्य सब पापग्रह राशि-संधि में हो तो बालक गूँगा होता है। यदि उक्त ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो वह बालक अधिक दिनों में बोलता है ॥५९-६०॥ मंगल और शनि यदि बुध की राशि नवमांश में हो तो शिशु गर्भ में ही दाँत से युक्त होता है। चन्द्रमा कर्क राशि में होकर लग्न में हो तथा उस पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो गर्भस्थ शिशु कुबड़ा होता है। मीन राशि लग्न में हो और उस पर शनि, चन्द्रमा तथा मंगल की दृष्टि हो तो गर्भ का बालक पंगु होता है। पापग्रह और चन्द्रमा राशि-संधि में हों और उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो गर्भस्थ शिशु जड़ (मूर्ख) होता है। मकर का अन्तिम नवमांश लग्न में हो और उस पर