भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 428

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०६ चतुष्पदक्षंगे भानौ शेषैर्बलयुतैः खगैः । कोशादत्तौ तु यमलौ जायेते मुनिसत्तम ॥७१॥ सार्क्यार्रिसिंहोक्षाजांसे भांशतुल्यांगनालयुक् । लग्नमिंदुं च सार्केदुं न पश्यति यदा गुरुः ॥७२॥ सपापगोऽर्को जायो वा परवीर्यप्रसूतिकृत् । पापभस्थौ पापखेटैः सूर्यार्घानत्तिकोणगौ ॥७३॥ विदेशगः पितावृद्धः खेवा राशिवशात्यये । पूर्ण इंदौ स्वमेशेज्ञे शुभे भुव्यंबुजे तनौ ॥७४॥ द्यूनस्थे वा विधौ यातेंगना नारी प्रसूयते । अन्धांगसम्भशः पूर्णे ज्यो वा पश्यति नारद ॥७५॥ स्वबंधलग्नगः सूनिः सलिले नात्र संशयः । पापद्दष्टे यमे मुद्यां जन्मांगान्वव्ययस्थिते ॥७६॥ कर्कालिलग्नगेशौरैबटे जन्माब्जवीक्षिते । मंदे जन्मगते लग्ने बुधसूर्येन्दुवीक्षिते ॥७७॥ क्रीडास्थाने देवगेहे प्यषरे च क्रमाज्जनिः । श्मशाने लग्नदृग्स्तूप्राम्यस्थानेब्जभार्गवौ ॥७८॥ अग्निहोत्रगृहे जीवोऽर्को भूषाभरणो गृहे । शिल्प्यालये बुधो जन्म कुर्याद्बलसमन्वितः ॥७६॥ भासमाने सरे मार्गे स्थिरे स्वकर्शाङ्गे गृहे । त्रिकोणगेऽब्ज आराक्र्योरस्ते वा सृज्यतेऽम्बया ॥८०॥ गुरुदृष्टे तु दीर्घायुः परं च प्राप्यते पुनः । पापद्दष्टे विधौ लग्नेऽस्ते कुजे तु विनश्यति ॥८१॥ मुनिश्रेष्ठ ! यदि सूर्य चतुष्पद राशि में हो और शेष सब ग्रह बलयुक्त हों तो एक ही नाल से वेष्टित दो शिशुओं का जन्म होता है । शनि या मंगल से युक्त सिंह, वृष या मेष लग्न हो तो लग्न के नवमांश की राशि जिस अंग की हो, उस अंग में नाल से लिपटे हुए शिशु का जन्म होता है ॥७१॥ यदि लग्न और चन्द्रमापर गुरु की दृष्टि न हो अथवा चन्द्रमा पापग्रह और सूर्य से संयुक्त हो तो शिशु को पर-पुरुष के वीर्य से उत्पन्न समझना चाहिए । यदि दो पापग्रह पापराशि में स्थित होकर सूर्य से सप्तम भाव में हों तो सूर्य के चर, स्थिर व द्विस्रभाव राशि के अनुसार विदेश, स्वदेश या मार्ग में बालक का जन्म समझना चाहिए । पूर्ण चन्द्रमा अपनी राशि में हो, बुध लग्न में हो, शुभ ग्रह चतुर्थ भाव में हो अथवा जलचर राशि लग्न हो और उससे सप्तम स्थान में चन्द्रमा हो तो नौका पर शिशु का जन्म समझना चाहिए । नारद ! यदि जल- चर राशिस्थ पूर्ण चन्द्रमा देखता हो अथवा वह १०, ४ या लग्न में हो तो जल में प्रसव होता है, इसमें संशय नहीं ॥७२-७५॥ यदि लग्न और चन्द्रमा से शनि बारहवें भाव में हो, उस पर पापग्रह की दृष्टि हो तो बालक का कारागार में जन्म होता है ॥७६॥ तथा कर्क या वृश्चिक लग्न में शनि हो ओर उस पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो गड्ढे में बालक का जन्म होता है । जलचर राशिस्थ शनि लग्न में हो तथा उस पर बुध, सूर्य या चन्द्रमा की दृष्टि हो तो क्रमशः क्रीडास्थान, देवालय और ऊसर भूमि में बालक का प्रसव होता है । यदि मंगल बलवान् होकर लग्नगत शनि को देखता हो तो श्मशान भूमि में, चन्द्रमा और शुक्र देखता हो तो रम्य स्थान में, गुरु देखता हो तो अग्निहोत्रगृह में, सूर्य देखता हो तो राजगृह, देवालय या गोशाला में तथा बुध देखता हो तो शिल्पघर में बालक का जन्म जानना चाहिए ॥७७-७९॥ यदि लग्न में चरराशि हो तो मार्ग में लग्नराशि के कथित स्थान के समान स्थान में बालक का जन्म होता है । यदि लग्न में स्थिरराशि हो तो स्वदेश के ही उक्त स्थान में जन्म होता है तथा यदि लग्नराशि अपने नवमांश में हो तो अपने घर में ही (५, ६ भाव) में अथवा सप्तम भाव में चन्द्रमा हो तो माता जातक का त्याग कर देती है ॥८०॥ यदि चन्द्रमा पर रु की दृष्टि हो तो माता के त्याग देने पर भी जातक दीर्घायु होता है । पापग्रह से दृष्ट चन्द्रमा यदि लग्न में हो और और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो तो जातक माता से त्यक्त होता है और मर जाता है । अथवा पापद्दष्ट चन्द्रमा यदि शनि-मंगल से ११वें भाव में स्थित हो तो जातक ५२ ना० पु०