बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१० नारदीयपुराणम् भवे कुजार्कयोः संदृष्टे परहस्तगतः सुखी । पापेगतायुर्भवेति मासः सार्थैः परैरपि ॥८२॥ पितृमातृगृहे जन्म तदधीशबलान्मुने । तरुगेहे शुभे नीचे नैकस्थदृष्टौ लग्नेन्दुः ॥८३॥ एतल्लक्षणसंपन्ना प्रसूतिर्विजने तदा । मंदर्क्षांशे विधौ [तुर्ये मंददृष्टेऽब्जगेऽपि वा ॥८४॥ मंदार्चने वा तमसि शयनं नीचगे भुवि । शीर्षे पृष्ठोदये जन्म तद्वदेव विनिदिशेत् ॥८५॥ चंद्रास्तसुखगैः [पापैर्मातुः पीडां समादिशेत् । जीर्णोद्धृतं गृहं मंदे सृजि दग्धं नवे विधौ ॥८६॥ काष्ठाढ्यमदृढं सूर्ये बहुशिल्पयुतं बुधे । चित्रयुक्तं नवं शुक्रे दृढं रम्यं गुरौ गृहम् ॥८७॥ घटाजकर्क्यलिघटे पूर्वं ज्ञेयगृहे ह्युदक् । वृषे पश्चान्मृगे सिंहे दक्षिणे वसतिर्भवेत् ॥८८॥ गृहप्राच्यादिगौ द्वौ द्वौ द्व्यंगाः कोणेष्वजादयः । पर्यके वास्तुवत्पादास्त्रिपदकांत्यराशयः ॥८९॥ चंद्रागांतरगैः खेटैः सूतिकाः समुदाहृताः । चक्रार्द्धबहिरांतश्च दृश्यादृश्योपरेऽन्यथा ॥९०॥
की मृत्यु होती है। यदि चन्द्रमा शुभग्रह से देखा जाता हो तो बालक दूसरे के हाथ में जाकर सुखी होता है। यदि चन्द्र पापग्रह दृष्ट हो तो दूसरे के हाथ में जाने पर भी होनायु होता है ॥८१-८२॥ पितृसंज्ञक ग्रह बली हो तो पिता के घर में और मातृ संज्ञक ग्रह बली हो तो माता (अर्थात् मामा) के घर में जन्म कहना चाहिए । मुने ! यदि शुभग्रह नीच स्थान में हो तो वृक्षादि के नीचे तृण-पत्रादि की कुटी में जन्म होता है । शुभग्रह नीचस्थान में हो और लग्न अथवा चन्द्रमा को एक स्थान स्थित शुभग्रह न देखते हों तो निर्जन स्थान में जन्म होता है। यदि चन्द्रमा शनि की राशि के नवमांश में स्थित होकर चतुर्थ भाव में विद्यमान हो तथा शनि से दृष्ट या युत हो तो प्रसवकाल में 'प्रसूतिका' का शयन पृथिवी पर समझना चाहिए । शीर्षोदय राशि लग्न हो तो शिर की ओर से तथा पृष्ठोदय राशि लग्न हो तो पृष्ठ (पैर) की ओर से शिशु का जन्म कहना चाहिए। चन्द्रमा से चतुर्थ और सप्तम स्थान में पापग्रह हों तो माता के लिए कष्ट समझना चाहिए ॥८३-८५१/२॥ जन्मसमय में सब ग्रहों की अपेक्षा शनि बलवान् हो तो सूतिकागृह पुराना, किन्तु संस्कार किया हुआ समझना चाहिए । मंगल बली हो तो जला हुआ, चन्द्रमा बली हो तो नया और सूर्य बली हो तो अधिक काष्ठ से युक्त किन्तु मजबूत नहीं होता । बुध बली हो तो प्रसवगृह बहुत शिल्पकला से युक्त, शुक्र बली हो तो चित्रों से युक्त नवीन और मनोहर तथा गुरु बली हो तो सूतिकागृह सुदृढ़ जानना चाहिए ॥८६-८७॥ लग्न में तुला, मेष, कर्क, वृश्चिक या कुम्भ हो तो गृह के पूर्वभाग में; मिथुन, कन्या, धनु या मीन हो तो उत्तरभाग में, वृष हो तो पश्चिम भाग में तथा मकर या सिंह हो तो दक्षिणभाग में सूतिका का घर समझना चाहिए ॥८८॥ गृहराशियों के स्थान--) घर की पूर्व आदि दिशाओं में मेष आदि दो-दो राशियों को और चारों कोणों में चारों द्विस्वभाव राशियों को समझे । सूतिकागृह के समान ही सूतिका के पलंग में भी लग्न आदि भावों को समझे । वहाँ ३, ६, ९ और १२वें भाव को क्रमशः चारों पायों में समझना चाहिए ॥८९॥ चन्द्रमा और लग्न के बीच में जितने ग्रह हों उतनी उपसूतिकाओं की प्रसवकाल में उपस्थिति समझनी चाहिए। दृश्य चक्रार्ध में (सप्तम भाव से लग्न तक) जितने ग्रह हों, उतनी उपसूतिकाओं की उपस्थिति घर के भीतर रहती है। बहुत से आचार्यों और मुनियों ने इससे भिन्न मत प्रकट किया है। (अर्थात् दृश्य चक्रार्ध में जितने ग्रह हों उतनी उपसूतिकाओं को घर के भीतर तथा अदृश्य चक्रार्ध में जितने ग्रह हों, उतनी को घर के बाहर कहा है) ॥८९-९०॥