भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 430

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४११ लग्नांशयसमानांगो बलिखेटं समोपि वा । चन्द्रनंदांशवद्वर्णः शीर्षाद्यंगविभागयुक् ॥९१॥ शीर्षकं दृक्श्रवेनासा कपोलहनवो मुखम् । कंठांसपार्श्वहृद्दोषः क्रोडनाभिश्च बास्तिकः ॥९२॥ शिश्नापाते च वृषणौ जघने जानुनी तथा । जंघे पादौ चोभयत्र त्र्यंशैः समुदितैर्वदेत् ॥९३॥ पापयुक्ते व्रणस्तस्मिन्नंगे लक्ष्म च तद्युते । स्वक्षांशे स्थिरयुक्ते तु नैज आगंतुकोऽन्यथा ॥९४॥ मंदेऽनिलाश्मजो भौमे विष्शस्त्राग्निजो बुधे । कुजोऽर्के काष्ठपशुजो जेतुः शृंग्यजयोनिजः ॥९५॥ यस्मिन्सञ्जास्त्रयः खेटा अंगेस्युस्तत्र निश्चितम् । व्रणोशुभकृतःषष्ठे तनौ राशिसमाश्रिते ॥९६॥ तिलकुन्मसकृद्दष्टसौम्यैर्युक्तश्च लक्ष्मवान् । चतुरस्रः पिंगदृक् च पैत्तिकोऽल्पकचो रविः ॥९७॥ वृत्तो वातकफी प्राज्ञो मंदवाक् शुभदृक् शशी । क्रूरदृक्तरुणो भौमः पैत्तिकश्चपलस्तथा ॥९८॥ विधानुपवृत्तिर्हास्यरुचिज्ञः श्लिष्टवाक्तथा । पिंगके श्लक्षणो दीर्घः कफी धीमान्गुरुर्मतः ॥९९॥ सुवपुलौचनः कृष्णवक्रकेशो भृगुः सुखी । दीर्घः कपिलदृग्भंदो निलिखरकचोलसः ॥१००॥

लग्न में जो नवमांश हो, उसके स्वामी ग्रह के समान अथवा जन्मसमय में जो ग्रह सबसे बली हो, उसके समान जातक का शरीर होता है । इसी प्रकार चन्द्रमा जिस नवमांश में हो उस राशि के समान वर्ण (गौर आदि) समझना चाहिए। एवं द्रेष्काणवश लग्न आदि भावों से जातक के मस्तक आदि अंग विभाग जानना चाहिए । यथा--लग्न में प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्न मस्तक, २।१२ नेत्र, ३।११ कान, ४।१० नाक, ५।६ कपोल, ६।८ हनु (ठुड्डी) और ७ (सप्तम) भाव मुख। द्वितीय द्रेष्काण हो तो लग्न कण्ठ, २।१२ कंधा, ३।११ पसली, ४।१० हृदय, ५।९ भुज, ६।८ पेट और ७ नाभि । तृतीय द्रेष्काण हो तो लग्न वस्ति (नाभि और लिंग के मध्य का स्थान), २।१२ लिंग, गुदमार्ग, ३।१२ अंडकोश, ४।१० जांघ, ५।९ घुटना, ६।८ पिण्डली और सप्तम भाव पैर समझना चाहिए ॥९१-९३॥ जिस अंग की राशि में पापग्रह हो, उस अंग में व्रण और यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उस अंग में चिह्न (तिल मशक आदि) समझना चाहिए । पापग्रह अपनी राशि या नवमांश में, अथवा स्थिर राशि में हो तो जन्म के साथ ही व्रण होता है । शनि जिस अंग स्थान में हो उस अंग में वात या पत्थर के आघात से, मंगल के स्थान में विष, शस्त्र और अग्नि से, बुध के स्थान में पृथ्वी (मिट्टी) के आघात से, सूर्याश्रित अंग में काष्ठ और पशु से, क्षीण चन्द्राश्रित अंग में सींग वाले पशु और जलचर के आघात से व्रण होता है ॥९४-९५॥ जिस अंग की राशि में तीन पापग्रह हों, उस अंग में निश्चित रूप से व्रण होता है । षष्ठ भाव में पापग्रह हो तो उस राशि वाले अंग में व्रण होता है । यदि उस पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो उस अंग में तिल या मसा होता है । यदि शुभग्रह का योग हो तो उस अंग में चिह्न (दाग) मात्र होता है ९४-९६१/२॥ (ग्रहों के स्वरूप और गुण का वर्णन-)सूर्य की आकृति चतुरस्र है, शरीर की कान्ति और नेत्र पिंगल हैं। पित्तप्रधान प्रकृति है और उनके मस्तक पर थोड़े-से केश हैं। चन्द्रमा आकार में गोल वात और कफ प्रकृति वाला पंडित और मृदुभाषी तथा बड़े सुन्दर नेत्र वाला है। मंगल क्रूर दृष्टि वाला, युवा पित्तप्रधान प्रकृति वाला और चंचल स्वभाव का है। बुध की प्रकृति में कफ, पित्त और वात की प्रधानता है, वह हास्यप्रिय और अनेकार्थक शब्द बोलने वाला है। बृहस्पति पिंगल अंगकान्ति, केश और नेत्र वाला हैं। दीर्घ शरीर और तथा कफप्रधान प्रकृति वाला है और वे बड़े बुद्धिमान् हैं। शुक्र सुन्दर अंग और नेत्र वाले हैं, मस्तक पर काले घुंघराले केश हैं और नेत्र कपिश वर्ण के हैं, उनकी वातप्रधान प्रकृति है, कठोर केश वाले और बड़े बालसी हैं ९७-१००॥