बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१२ नारदीयपुराणम् स्नाय्वस्थिरक्तत्वक्शुक्रवसामज्जास्तु धातवः । मंदार्कचंद्रसौम्यासृग्जिज्जीवकुभुवः क्रमात् ॥१०१॥ चंद्रांगपापैर्भांत्यस्थैः सैंदुपापचतुष्टयैः । चक्रपूर्वापरे पापसौम्यैः कीटतनौ मृतिः ॥१०२॥ उदयास्तगते पापौ चंद्रः क्रूरयुतैः शुभैः । न चेद्दृष्टस्तदा मृत्युर्जातस्य भवति ध्रुवम् ॥१०३॥ क्षीणेऽब्जे व्ययगे पापैर्लग्नाष्टस्थैःशुभा न चेत् । केंद्रेषु वाब्जोसंयुक्तः स्मरांत्यमृतिलग्नगः ॥१०४॥ केंद्राद्या हस्त संख्यैतैरदृष्टो मृत्युदस्तथा । षष्ठेभैब्जेऽसंदृष्टेऽसद्यो मृत्युः शुभेक्षिते ॥१०५॥ समाष्टके मिश्रखेटैर्दृष्टेऽदृष्टे मृतिः शिशोः । क्षीणेऽब्जेंगे रन्ध्रकेन्द्रे पापे पापान्तरस्थिते ॥१०६॥ भृगूनूनिधने वाब्जे लग्नेऽप्येवं शिशोर्मृतिः । पापैश्चन्द्रास्तगैर्मात्रा सार्द्धं सद्दिष्टमंतरा ॥१०७॥ शुभादृष्टे भान्त्यगेब्जे त्रिकोणोपरतैः खलैः । लग्नस्थे वा विधौपापैरस्तस्थैर्मूतिमाप्नुयात् ॥१०८॥ ग्रस्तेऽब्जेऽसद्भिर्ध्रष्टस्थैः सूज्यवात्मजयोर्मृतिः । लग्ने रवौ तु शस्त्रेण सवीर्यांसद्भिभ्रष्टगैः ॥१०८॥ कर्केन्द्रीज्ययुते लग्ने केंद्रे सौम्ये च भार्गवे । शेषैस्त्र्यरीशोगैरायुर्मितं भवति ध्रुवम् ॥११०॥ वर्गोत्तमे मीनलग्ने वृषेऽन्जे तत्त्वलिप्तिके । स्वतुंगस्थेष्वशेषेषु परमायुः प्रकीर्तितम् ॥१११॥ (ग्रहों के धातु) - स्नायु (शिरा), हड्डी, शोणित, त्वचा, वीर्य, वसा और मज्जा ये क्रमशः शनि, सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, गुरु और मंगल के धातु हैं ॥१०१॥ (अरिष्टकथन) - चन्द्रमा, लग्न और पापग्रह- ये राशि के अन्तिमांश में हों अथवा चन्द्रमा और तीनों पापग्रह ये लग्नादि चारों केन्द्रों में हों तथा कर्क लग्न हो तो जातक की मृत्यु होती है। दो पापग्रह लग्न और सप्तम भाव में हों तथा चन्द्रमा एक पापग्रह से युक्त हो और शुभग्रह से दृष्ट न हो तो जातक का शीघ्र मरण होता है ॥१०२-१०३॥ क्षीण चन्द्रमा १२वें भाव में हों, पापग्रह लग्न और अष्टम भाव में हों तथा शुभग्रह केन्द्र में न हों तो जातक की मृत्यु होती है। अथवा पापयुक्त चन्द्रमा सप्तम द्वादश या लग्न में स्थित हो तथा उस पर केन्द्र से भिन्न स्थान में स्थित शुभग्रह की दृष्टिन हो तो जातक की मृत्यु होती है। यदि चन्द्रमा ६, ८ स्थान में रहकर पापग्रह से दृष्ट हो तो जातक का शीघ्र मरण होता है। शुभग्रह से दृष्ट हो तो ८ वर्ष में और शुभग्रह तथा पापग्रह दोनों से दृष्ट हो तो ४ वर्ष में जातक की मृत्यु हो जाती है। क्षीण चन्द्रमा लग्न में तथा पापग्रह ८, १, ४, ७, १० में स्थित हों तो जातक का मरण होता है। अथवा दो पाप- ग्रहों के बीच में होकर चन्द्रमा ४, ७, ८ स्थान में स्थित हो या लग्न ही दो पापग्रहों के बीच में हो तो जातक की मृत्यु हो जाती है ॥१०४-१०६॥ पापग्रह ७, ८ में हों और उन पर शुभग्रह की दृष्टि न हो तो माता सहित शिशु की मृत्यु हो जाती है ॥१०७॥ राशि के अन्तिमांश में चन्द्रमा पापग्रह से अदृष्ट हो तथा पापग्रह त्रिकोण (५, ९) में हो अथवा लग्न में चन्द्रमा ओर सप्तम में पापग्रह हो तो शिशु का मरण होता है ॥१०८॥ राहुग्रस्त चन्द्रमा पापग्रह से युक्त हो और मंगल अष्टम स्थान में स्थित हो तो माता और शिशु दोनों की मृत्यु होती है। इसी प्रकार राहुग्रस्त सूर्य यदि पापग्रह से युक्त हो तथा बली पापग्रह अष्टम भाव में स्थित हो तो माता और शिशु का शस्त्र से मरण होता है ॥१०८-१०९॥ आयुर्दाय कथन - चन्द्रमा और बृहस्पति से युक्त कर्क लग्न हो, बुध और शुक्र केन्द्र में हों और शेष ग्रह (रवि, मंगल एवं शनि) ३, ६, ११ स्थान में हों तो ऐसे योग में उत्पन्न जातक की आयु बहुत अधिक होती है ॥११०॥ मीन लग्न में मीन का नवमांश हो, बुध वृष में २५ कला पर हो तथा शेष सब ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में हो तो जातक परम आयु (१२० वर्ष ५ दिन की) प्राप्त करता है ॥१११॥ लग्नेश बली होकर केन्द्र